भक्ति, कर्म और ज्ञान – परम-प्राप्ति के तीन राजमार्ग

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

सभी जिज्ञासुओं और आध्यात्मिक दृष्टि वाले पाठकों हेतु एक पठनीय, ज्ञानवर्धक एवं अनुसरण करने योग्य प्रस्तुति

“ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म विचार प्रचारा।।”
विधि निषेध मय कलिमल हरनी। करम कथारविनंदिनि बरनी।।”

सरस्वती नदी ब्रह्म- विचार का प्रतीक है।तीर्थराज प्रयाग में गंगाऔर यमुना का प्रत्यक्ष दर्शन होता है किन्तु पौराणिक श्रद्धा एक तृतीय नदी का भी वर्णन करती है, वह है सरस्वती । जो दृष्टिगोचर है उसकी सत्ता को मान लेना ही आस्तिकता नहीं है प्रत्यक्ष के प्रति आग्रह का अतिरेक ही नास्तिकता का मूल आधार है।

दृष्टिगोचर न होने वाला ईश्वर नास्तिक के लिए कोई अर्थ नहीं रखता , किन्तु आस्तिक के लिए सर्वाधिक महत्त्व उसका ही है जो नहीं दिखाई देता ,किन्तु जिसके प्रकाश में समस्त विश्व- प्रपंच दिखाई देता है । ज्ञान का प्रतिपाद्य भी निर्गुण- निराकार ब्रह्म है । अमूर्त ब्रह्म के निरूपण का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक सरस्वतीजी ही हैं जो स्वयं अमूर्त हैं।

संत समाज में जहाँ भक्ति और कर्म का खुला निरूपण होता है ,वहाँ ज्ञान के निरूपण में गोप्यता का आश्रय लिया जाता है।ज्ञान का अधिकार कठिनाई से प्राप्त होता है। अशुद्ध बुद्धि में ज्ञान अभिमान की सृष्टि करता है । भक्ति का प्रतिपाद्य ईश्वर और उसका गौरव है।

ईश्वर की महत्ता और स्वयं की लघुता के मान से भक्ति का उदय होता है । कर्म का उद्देश्य विराट् का परिचय देते हुए व्यक्ति को कर्तव्य का भाव कराना है । व्यक्ति विराट विश्व और समाज का एक अंग है। अंग का कर्तव्य है कि वह सारे शरीर की सेवा के लिए कार्य करे । अत: भक्ति और कर्म का निरूपण प्रत्येक के लिए उपादेय हैं किन्तु ज्ञान तो जीव और ब्रह्म के एकत्व का दर्शन है—

“ ‘ सोऽहमस्मि’इति वृत्ति अखंडा।
दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।”

ब्रह्मात्मैक्य- बोध के रूप में जो सच्चा ज्ञान है , वह व्यक्ति को बाह रूप में परिवर्तित नहीं करता; किन्तु ज्ञानाभिमान का उदय होते ही वह स्वयं को महान और अन्य लोगों को अज्ञानी एवं तुच्छ मानने लग जाता है।अत: ज्ञान और अभिमान के पार्थक्य के लिए तुलसी बाबा का प्रतीक सर्वश्रेष्ठ माध्यम से जैसे सरस्वती होते हुए भी गुप्त हैं , इसी तरह सच्चा ज्ञान साधारणतया स्वयं को प्रकट की चेष्टा नहीं करता।

जहॉं ज्ञान के प्रदर्शन की प्रवृत्ति है वहॉं ज्ञान के रूप में अभिमान ही सक्रिय है।यमुनाजी का स्मरण रवि- नंदिनि के रूप में करना कर्म में निष्कामता की ओर संकेत करता है।

पिता और पुत्री का संबंध निष्कामता का परिचायक है। पिता और पुत्र का नाता कामना और स्वार्थ की पृष्ठभूमि पर आधारित है । पुत्र के प्रति पिता जो कुछ भी करता है , उसमें यह प्रत्याशा तो छिपी ही रहती है कि पुत्र योग्य होकर इसका प्रतिदान देगा ; किन्तु पुत्री को तो देना ही देना है। यमुना रवि- नंदिनि के रूप में क्रम मे निष्कामता के तत्त्व की स्मृति दिलाती है।

निरंतर प्रवाहमान कर्म की अखंडता का साक्षात्कार कराती रहती हैं। यमुनोत्री से निकलकर धरित्री को धन्य बनाती हुई यमुना कहीं भी आसक्त होकर रुक नहीं जाती।अर्थात् प्रकृति , वैभव और पूजा के बीच भी अनासक्त भाव से चलते जाना वह महामंत्र है जो किसी भी कर्मयोगी का आदर्श हो सकता है।यमराज यमुना के भाई हैं ।

पुराण गाथा के अनुकूल यमराज भ्रातृ – द्वितीया को अपनी भगिनी यमुना के घर गये था परम्परा के अनुकूल उन्हें वरदान दिया कि भ्रातृ- द्वितीया को जो व्यक्ति यमुना में स्नान करेगा उसे यमगण कष्ट नहीं देंगे ।इस कथा का व्यवहार और भावना के संदर्भ में विशिष्ट महत्त्व तो है ही , पर विचार की दृष्टि से भी यह कथा प्रेरक है । यमराज कर्मफल दाता हैं।

मृत्यु के पश्चात् न्याय के सिंहासन पर आरूढ़ होकर व्यक्ति को उसके कर्म का दण्ड अथवा पुरस्कार प्रदान करते हैं। यम की सत्ता व्यक्ति को सतत सावधान रहने की प्रेरणा देती है। जीवन में किये गये कर्म यहीं समाप्त नहीं हो जाते ।

लोक में भले ही हम दुष्कर्मों के दण्ड से बच जाएँ, पर उसके पश्चात् भी सूर्य- पुत्र यम की दृष्टि से बच पाना असंभव है पर सतत जागरूक रहता हुआ भी क्या कोई व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि उसके कर्म में कोई त्रुटि नहीं होगी? त्रिगुण की सीमा में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह सर्वथा असंभव है। ऐसी परिस्थिति में यमुना की कथा कर्म की निर्ममता को समाप्त कर देती है। यमराज भी भावशून्य नहीं हैं।

यमुना से कर्म की प्रेरणा प्राप्त करने वाला व्यक्ति यह आशा कर सकता है कि कर्म- जन्य त्रुटि का परिणाम उसे नहीं भोगना पड़ेगा ।इसका तात्पर्य यह भी है कि जिसने यमुना से अनासक्ति , निष्कामता और अकर्तृत्व का पाठ ग्रहण कर लिया उसे यमराज से भय कैसे हो सकता है—

“ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिरयस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते।।”

यमुना का तीर्थराज प्रयाग में पहुँचकर गंगा में विलीन हो जाना कर्म के उद्देश्य की ओर संकेत करता है। सत्कर्मों का अंतिम उद्देश्य भक्ति की उपलब्धि है।

*मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥
तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥

भावार्थ:-जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थ यात्रा आदि बहुत से साधन, योग, वैराग्य और ज्ञान में निपुणता,॥

  • नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥
    भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥

भावार्थ:-अनेकों प्रकार के कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेकों संयम दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवा, विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई (आदि)-॥

  • जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥
    सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥

भावार्थ:-जहाँ तक वेदों ने साधन बतलाए हैं, हे भवानी! उन सबका फल श्री हरि की भक्ति ही है, किंतु श्रुतियों में गाई हुई वह श्री रघुनाथजी की भक्ति श्री रामजी की कृपा से किसी एक (विरले) ने ही पाई है॥

  • मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास।
    जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥

भावार्थ:-किंतु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरंतर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस मुनि दुर्लभ हरि भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं॥

  • सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
    धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥

भावार्थ:-जिसका मन श्री रामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है॥

*नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥

भावार्थ:-जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम्‌ बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान्‌ तथा वही रणधीर है॥

  • धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
    धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥

भावार्थ:-वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥

  • सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
    धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥

भावार्थ:-वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥

(धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है।)

  • सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
    श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥

भावार्थ:-हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥

इसी तरह सरस्वती जहॉं अपनी उपस्थिति से त्रिवेणी को पूर्णता प्रदान करती है , वहीं गंगा में विलीन होकर पृथक्ता भी समाप्त कर देती है । प्रयाग के पश्चात् गंगा ही समुद्र की ओर अभिमुख होती है।

साधना के प्रारंभ में ज्ञान , कर्म और भक्ति पृथक – पृथक प्रतीत होते हैं। जैसे गंगा- यमुना का प्राकट्यअलग- अलग स्थानों से होता है , किन्तु एक ऐसी स्थिति आती है जब ज्ञान , कर्म और भक्ति में कोई पार्थक्य शेष नहीं रह जाता। प्रारंभ में व्यक्ति को कर्म करते हुए विधि और निषेध का ध्यान रखना पडता है। स्वभावत: उस समय साधक को मन की वासनाओं पर नियंत्रण करने के लिए विवेक का आश्रय लेना पडता है।

अधर्म की वृत्तियॉं अंत: करण से पूरी तरह समाप्त नहीं हो जातीं, पर ज्योंही साधक स्वयं को भक्ति के प्रति अर्पित कर देता है , त्यों ही उसके कर्म विवेक के स्थान पर ईश्वर से संचालित होने लगते हैं।भक्तों के चार भेद बताए गए हैं, उनमें ज्ञानी को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

(प्रस्तुति: पंडित अनिल वत्स)