बूढ़े वृक्ष की मौन गाथा

वृक्ष तुम कितने बड़े हो
हृष्ट-पुष्ट और शक्तिशाली 
तुमने तो एक ही स्थान पर
बना लिया अपना बसेरा 
और बिता दिये बरसों बरस 
बापू ने सुनाई थी एक दिन
जब मै इस रास्ते से गुज़र रही थी
कि तुम्हारे जड़ों की तुम्हारे पत्तों की
तुम्हारी घनी छाया की कहानी अपनी जुबानी
वे कहते थे कि किस तरह तुम्हारी जड़ों को 
 सिरहाना बनाते थे राहगीर
किस तरह तुम्हारे चारों ओर
घूम-घूमकर खेला करती थी बालाएँ
कई झूले लगे होगें सावन के
तुम्हारी टहनियों मे
कई पक्षियों ने जमाया होगा डेरा
तुम्हारी डालियों मे
लगाई होगीं  कई बालाओं ने
मेहंदी तुम्हारी छांव मे
कितने ही प्रेमियों ने तुम्हें बाहों मे भरकर
गाया होगा आल्हा 
तुम्हारी लंबी-लंबी डालियों ने
अंबर को छूना चाहा होगा
पर आज तुम मौन खड़े हो
आज न तुम्हारी शाखाएँ हरी-भरी हैं
न ही चिड़ियों की चहचहाहट
आज न आल्हा गीत है न ही कोई मुसाफिर
पर हे वृक्ष ! यही तो है नियति का नियम
पर मै जब भी गुजरूंगी यहाँ से
कराऊंगी तुम्हारी महानता का परिचय सबसे
तब भी तुम्हें इसी तरह गंभीर और मौन पाऊंगी!