साहित्य

नहीं रोकूंगी तुम्हें ! – NIG Poetry

  नहीं रोकूंगी तुम्हें नहीं बांधूंगी तुम्हें किसी बंधन में न अपने शब्दों से न अपने प्रेम से प्रेम बंधन नहीं एहसास बोझ नहीं खुले

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बूढ़े वृक्ष की मौन गाथा

वृक्ष तुम कितने बड़े हो हृष्ट-पुष्ट और शक्तिशाली  तुमने तो एक ही स्थान पर बना लिया अपना बसेरा  और बिता दिये बरसों बरस  बापू ने

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