Chapra Election 2025:खेसारी लाल यादव का सियासी दांव, छपरा में बढ़ी टक्कर!

On: November 5, 2025 12:33 PM
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जब भोजपुरी स्टार खेसारी लाल यादव ने घोषणा की कि वह राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के टिकट पर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए छपरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे, तो यह सिर्फ एक चुनावी कदम नहीं बल्कि एक बड़ा सियासी ‘शिफ्ट’ माना गया। उनके इस कदम ने छपरा के राजनीतिक परिदृश्य को हिला कर रख दिया है — एक पारंपरिक राजनीति वाले जिले में स्टार पावर, जातिगत समीकरण, युवा वोटरों की उम्मीदें और सामाजिक परिवर्तन की मांग, सभी मिलकर एक नया टकराव पट्टा बिछा रहे हैं।

“Chapra Election 2025:

स्टार से सियासत तक — खेसारी की कहानी

खेसारी लाल यादव को भोजपुरी सिनेमा और गानों में उनकी लोकप्रियता के लिए जाना जाता है। लेकिन इस चुनावी दांव के पीछे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सामाजिक संदेश भी है। उन्होंने खुद कहा है कि “मैं पारंपरिक नेता नहीं, जनता का बेटा हूँ”।

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति उनके लिए कुर्सी की दौड़ नहीं बल्कि जिम्मेदारी है।
उनका पैतृक परिवार बहुत मामूली था — एक वक्त वह भैंस चराते, दूध बेचते, दिल्ली में लिट्टी-चोखा बेचकर गुज़ारा करते रहे।

अब उन्होंने घोषित किया है कि उन्होंने अपनी हलफनामे में कुल संपत्ति करीब ₹24.81 करोड़ बताई है।

खेसारी लाल यादव

छपरा की राजनीति में नया समीकरण

छपरा विधानसभा क्षेत्र (सारण जिले में) उपेक्षित मुद्दों—बेरोज़गारी, युवा पलायन, विकास की धीमी रफ्तार—का सामना कर रहा था। उसी संदर्भ में खेसारी की एंट्री राजनीति में कई मायनों में ‘शॉक फेक्टर’ है।
ख़ासबात यह है कि RJD जातिगत समीकरण तोड़ने की उम्मीद कर रही है — खेसारी के स्टार पावर का लाभ निकल सके।

उनके पास “पुराने वोट बैंक + युवा-फॉलोअर + भोजपुरी भाषी जनता” का अनूठा मिश्रण है। यह रणनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली हो सकता है।

RJD ने उन्हें इस सीट पर इसलिए उतारा है कि बदलाव की हवा है — इसलिए पार्टी भी उनके पीछे बड़ी उम्मीदों से खड़ी है।

अगर खेसारी लाल यादव सफल हो जाते हैं, तो यह छपरा में राजनीति की दिशा ही बदल सकता है — सिर्फ वोट बैंक की राजनीति नहीं बल्कि विकास-आधारित राजनीति।

क्यों यह मुकाबला “दिलचस्प” है?

  • क्योंकि छपरा में अब दो बड़े ध्रुवों के बीच टक्कर तीन ध्रुवों में बदल गई है — पारंपरिक दल, नया स्टार उम्मीदवार, और शायद तीसरी ताकत का उदय।
  • मीडिया इसे बताते हैं कि छपरा का “जाति-कोड” टूटने की संभावना है, यानी सिर्फ यादव-मुसलिम वोट नहीं बल्कि युवा, अन्य पिछड़ी जाति-वर्ग और भोजपुरी-भाषी जनता भी अपनी पहचान की राजनीति चाहती है।
  • खेसारी ने जो मुद्दा उठाया है — “मंदिर नहीं, रोजगार” — वह पहले जितना नजर आता था, उतना अब नहीं रहा। यह संकेत है कि चुनाव में विकास-वोटिंग की भूमिका बढ़ सकती है।

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