Donald Trump बच गए लेकिन…

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डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के ऐसे अकेले राष्ट्रपति बन गए, जिन पर अमेरिकी संसद ने दो बार महाभियोग का मुकदमा चलाया और वे दोनों बार बरी हो गए। वे ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन पर पद छोड़ने के बाद भी महाभियोग चलाया गया।

यदि यह महाभियोग सफल हो जाता तो वे दुबारा चुनाव नहीं लड़ पाते, उनकी पेंशन तथा अन्य सुविधाएं भी बंद हो जातीं लेकिन वे जीत गए अर्थात अमेरिकी संसद में उनके विरोधी डेमोक्रेटस उन्हें हराने लायक वोट नहीं खींच पाए। यदि अमेरिकन सीनेट के 100 सदस्यों में से दो-तिहाई याने 67 सदस्य उनके विरुद्ध वोट दे देते तो वे हार जाते लेकिन 67 की बजाय 57 वोट ही उनके विरुद्ध पड़े। 10 वोट कम पड़ गए। सीनेट में डेमोक्रेटिक और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के 50-50 सदस्य हैं।
उनकी पार्टी के सिर्फ 7 सदस्यों ने ही उनके खिलाफ वोट दिए। सीनेट में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के नेता मेककाॅनेल ने भी ट्रंप के पक्ष में वोट दिया लेकिन अपना भाषण उन्होंने ट्रंप के विरुद्ध दिया। वे शुरु से ही ट्रंप के विरुद्ध बोलते रहे हैं। मेककाॅनेल ने 6 जनवरी को अमेरिकी संसद पर हुए भीड़ के हमले के लिए ट्रंप को ही जिम्मेदार ठहराया।
उन्होंने कहा कि ट्रंप ने ही उस भीड़ को भड़काया था, जो संसद भवन में घुसकर तोड़-फोड़ कर रही थी और जिसने उप-राष्ट्रपति पर जानलेवा हमला कर दिया था। यह सब हारे हुए ट्रंप के खिसियाने पर ही हुआ था। मेककाॅनेल के इस पैंतरे की खास वजह यह हो सकती है कि वे ट्रंप की जगह लेना चाहते हों।
वे ट्रंप के विरुद्ध जरूर बोले लेकिन वे पार्टी की बहुसंख्या का साथ देते रहे। अब ट्रंप ने दुबारा सक्रिय होने की घोषणा कर दी है। ‘अमेरिका महान’ का नारा बुलंद करके वे फिर से राष्ट्रपति बनने की कोशिश करेंगे। यों भी उन्हें साढ़े सात करोड़ वोट मिले थे। दुनिया भर में उनके चरित्र, उनके वाणी-विलास और उनके निजी उन्मुक्त आचरण आदि की चाहे भर्त्सना होती रही हो लेकिन अमेरिका के करोड़ों लोग उन्हें राष्ट्रवाद का प्रबल प्रवक्ता मानते हैं।
वे रिपब्लिकन पार्टी को अपने कब्जे में फिर से लेने की पूरी कोशिश करेंगे। अगर रिपब्लिकन पार्टी उनके नेतृत्व को रद्द कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे इसे तोड़ दें या एकदम नई पार्टी खड़ी कर लें। इसके लिए उनके पास पर्याप्त धन भी है और उनके पर्याप्त अंधभक्त भी हैं। ट्रंप की जीत पर राष्ट्रपति जोजफ बाइडन ने काफी संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि इस महाभियोग से ट्रंप जरूर बच गए हैं लेकिन इस मुकदमे ने हमें यह चेतावनी दी है कि लोकतंत्र की रक्षा का मामला बहुत नाजुक है।
लापरवाही और असंयम के कारण लोकतंत्र का भीड़तंत्र में बदलना आसान हो जाता है। जो बीत गया सो बीत गया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के सामने असली और तात्कालिक चुनौती है—— कोरोना-कोविड महामारी। इससे पैदा हुई बेरोजगारी, मृत्युएं और सामाजिक तनाव ! लेकिन बाइडन-प्रशासन को डोनाल्ड ट्रंप का सामना करने की भी पूरी तैयारी करनी पड़ेगी।

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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