एक कहानी: पंचायत का फैसला

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पंचायत नाम से ही एक सम्मान उभर आता है मन में। कोई समय था जब सरपंच जी गांव के झगड़े गांव में ही निपटा दिया करते थे। पुलिस थाने तक जाने की नौबत ही  नहीं आती थी। गांव की बात गांव में ही निपट जाया करती थी। पुलिस का गांव में आना या किसी का थाने कचहरी जाना भी अच्छा नहीं समझा जाता था।
दादी के मुंह से अक्सर सुनती थी कि हमारे गांव का सरपंच बहुत शांत स्वभाव का शांति से हर मसला हल कर देता है,आज तक हमारे गांव की बात पुलिस में नहीं पहुंची कभी।
खैर, तब मैं तो बहुत छोटी सी थी , बातों की समझ तो नहीं थी मेरे भीतर मगर कभी कोई किस्सा दिमाग के किसी कोने में रह जाता है। मैं बहुत छोटी थी दादी मां की लाड़ली थी बहुत और उन्हीं के साथ सोती थी।
हुआ ये कि एक बार घर में चोर आया, मुझे कुछ पता नहीं चला । सुबह उठी, पापा को ढूंढने लगी. पापा नहीं मिले तो अपने कमरे में वापस आई और पूछा- पापा कहां हैं बीबी जी? – सब लोग दादी मां को बीबी जी बोलते थे।
दादी ने गोदी में बिठा कर प्यार से सहलाया फिर पर हाथ फेरते कहा -पापा सरपंच के घर गए हैं। तुमको पता है, घर में चोर आ गया था रात को?
फिर क्या‌ हुआ, जैसे बच्चे पूछते हैं मैंने भी पूछा। -कुछ नहीं पकड़ा गया बस। हैरानी से पूछा मैने- कैसे? पापा ने पकड़ा क्या?
हां,दादी बोली,तेरी मां को पता चला सबसे पहले। मां ने पापा को बोला देखो ,उठो ऊपर छत पर आवाज़ आ रही है।
तब पापा और मां हाथ में छड़ी लेकर ऊपर छत पर गए, चोर घबरा कर छत से कूद गया।उसके पांव में चोट आई।
लोग इकट्ठे हो गए।वह शराब के नशे में भी था।और आसपास के लोगों ने पकड़ लिया उसको,और रात को ही सरपंच गुरमीत सिंह जी के घर छोड़ आए।
अगले दिन पापा की ड्यूटी थी और रात को सब सरपंच के घर जमा हुए।
पापा मुझे बोले चल मेरा बेटा तू भी साथ, चोर दिखाते आज तुमको। उंगली पकड़ मैं भी गई पापा के साथ,जाते जाते जो
छवि चोर की मन में उभर रही थी, बड़ी बड़ी मूंछ, बड़ी-बड़ी लाल आंखें‌।
खैर वहां पहुंचे ऐसा कुछ तो नहीं पर गांव पूरा जमा हुआ था।फैसला सुनने।
और मेरे पापा दादा को लोग तब भी बहुत मानते थे आज भी,तो एक गुस्सा सा था लोगों में कि उनके घर कयों,,,,पापा को कुछ लोग बोल रहे थे एक बार भनोट साहब हमारे हवाले कर दो इसे।
सरपंच जी आए बहुत समझदार और शांत थे तै जानते थे कि चोर को लोग छोड़ेंगे नहीं तो पहले चोर को सामने नहीं लाया गया।
पहले लोगों को शांत किया , फिर बुलाया दीप सिंह जाटों का लड़का था, शादीशुदा तीन छोटी बच्चियों का बाप। शराब का नशा ही था तब पंजाब में वो भी जाट लोगों में ही थी। शादियों में ही होती थी आम लोग नहीं पीते थे ।
खैर बात शुरू हुई, चोर से पूछा क्या करने गए थे वहां,क्या चोरी के इरादे से गए थे।
चोर ने गलती स्वीकार करते हुए कहा जी मैं नशे में था और मुझे नहीं पता था कि यह घर बाऊ सुरेन्द्र मोहन जी का है, मुझे माफ़ कीजिए आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा।
सरपंच जी ने पापा से पूछा भनोट साहब बताइए क्या आप कोई कार्यवाही करना चाहते हैं तो।
पापा बोले सरपंच जी आज तक हमारे गांव में पुलिस नहीं आई और मैं कोई कार्यवाही नहीं करूंगा, गांव का आदमी है, बच्चियों का बाप है,पर पापा ने दीप सिंह को कहा ये शराब तुमको यहां तक लेकर आई है संभल जाना दीप सिंह आगे चलकर पछताओगे नहीं तो।
उसने भी माफ़ी मांगी और आश्वासन दिया आगे से गलती नहीं दोहराने का।
मैं भी पापा की उंगली पकड़ घर आ गई।दादी को सब बताया पापा ने,दादी बोली अच्छा किया, गांव की इज्जत रह गई, पुलिस का आना ठीक नहीं होता गांव में और आजतक हमारे गांव में पुलिस आई भी नहीं।
यही कारण है कि  तो यह बात बड़ी बार मेरे सामने हुई भी जब सभी इकट्ठे बैठे होते, मुझे भी याद रहा यह किस्सा।
उसके बाद समय बदला सरपंच जी भी बदले और लोग भी बदल गये।आज गांव तो वहीं है मगर फैसले गुरमीत सिंह की पंचायत जैसे नहीं होते,आज पुलिस भी गांव में आने लगी और लोग भी थाने जाने लगे हैं।
(कौशल बंधना)

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