एक सौ सोलह चाँद की रातें: A Story by Anju

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अपर्णा आज फिर से दर्पण के आगे खड़ी अपने आप को निहार रही थी. चेहरे की कसी हुई त्वचा पर आँखों की नोंक के पास कुछ सिलवटें उभर आई थी.  उसने अपनी ऊँगलियों से स्पर्श  करने के लिये ज्यूँ  ही हथेली उठाई. अपनी काँपती ऊँगलियों पर उसकी नज़र ठहर गई. अब वह और सतर्क हो कर अपने अंदर आए बदलाव को गौर से निहारने लगी.  अचानक माथे पर नज़र पड़ी जिसके ऊपर माँग में चाँदी साफ झलक रही थी.
अपर्णा समझ गई थी कि अब उसका रूप ढलने लगा है. उम्र  के कई पड़ाव वो पार कर आई थी एक ऐसी जगह जहाँ पर वो बिल्कुल  अकेली थी. अचानक वो मुड़ी और वॉर्डरोब खोला जहाँ एक से एक बेशकीमती सिल्क की साड़ियाँ टँगी हुई थीं. एक-एक कर वो सभी को सरकाती गई . साड़ियाँ देखते हुए उसकी नज़र लाल साड़ी पर ठहर गई. कुछ पल उसे निहारती रही फिर न जाने क्या सोचकर वही साड़ी बाहर निकाल ली.  वह स्वयं भी सोच रही थी कि उसके वॉर्डरोब  में इस लाल साड़ी से कहीं ज़्यादा  सुंदर और महंगी  साड़ियाँ  टँगी हैं.  फिर भी अपर्णा  ने वही साड़ी क्यूँ  निकाली. इस प्रश्न का उत्तर तो अपर्णा के पास भी नहीं था.
साड़ी पहन कर अपने सुंदर केशों  को घुमा कर जूड़ा बनाया. पास ही केले के पत्ते के दोने पर रखी मोगरे की लड़ी अपनी पतली-लंबी ऊँगलियों से उठाई और जूड़े में सजा लिया. अब बारी थी श्रृंगार की. मृगनयनी सी आँखों में काजल की धार, माथे पर लाल बिंदी और माँग में  में चुड़ियाँ पहनते-पहनते स्वयं को देखा तो बस देखती ही रह गई. आज भी अपर्णा उतनी ही खूबसूरत लग रही थी जैसे सोलहवें साल में.. हाँ फर्क था तो बस इतना कि चेहरे की मासूमियत ने  परिपक्वता की चादर ओढ़े ली थी.
कितनी शोख और चंचल हुआ करती थी अपर्णा. सारे घर की जान थी. बंगाल की सौंधी खुशबू से जुड़ा था उसका अस्तित्व. जहाँ जाती खुशियाँ बिखेर देती.  हर किसी के  लिये उतनी ही शुभ थी अपर्णा जितनी कि अपने माता-पिता  के लिए.  उसके पाँव पड़ते ही खुशियाँ उस द्वार पर दस्तक देने लगती थी इसलिए उसे लोग “शुभ्रा” कह कर पुकारते थे. एक ही साँस में कर जाती थी वो कितनी  ही बातें..  इतनी कि रात सवेरे की शक्ल  ले लेती मगर इस शैतान लड़की की बातें तौबा… तौबा…
अपर्णा की माँ सुहासिनी उसके इस अल्हड़पन पर  हैरान अक्सर कहीं…. ” कखनो  बड़ो होबे  ऐई  दुष्टो  मेय पर्णार बाबा. “(आखिर कब यह शैतान  लड़की बड़ी  होगी अपर्णा के पापा)
अपर्णा  के बाबा तपन मुखर्जी  परेशान सुहासिनी  को देखकर बस मुस्कुरा देते कहते “चिन्ता करो ना एखन  तो छोटो  मेय  ,आमार  दुर्गा  माँ “(अभी तो छोटी लड़की है मेरी दुर्गा  माँ)
“हैं तोमाय  जन्ने तो छोटो देखते पारो ना कि ताड़  मतोन लांबा होये गये गेछे. तुमि ना,,,,,बिगाड़ो और उसे.” तपन  पत्नी  की इस बात पर हंसने लगते.
“ऐई  मेय एखाने  बश, आज के तुई कथाओ बाइरे जाबे  ना,,” (यहाँ बैठो,आज तुम कहीं बाहर  नही जाएगी ?)
“उफ्फ  माँ ” (पैर पटकते हुए अपर्णा ने कहा)
“ना आर  किच्छू  बोलबे  ना,,बश  एइखाने. “
अपर्णा  चुप लगा कर बैठ  गई पर दिमाग़  में कुछ शैतानी  चल रही थी.  आज सुनन्दा के यहाँ गुड्डे-गुड़िया की शादी  का प्रोग्राम  था उसे तो जाना ही था वहाँ दुल्हन की माँ जो थी अपर्णा.
जब माँ  पिशी माँ के पैरों में तेल लगाने चली गई तो अपर्णा  चुपके से भाग निकली.  अपनी गुड़िया के दुल्हन बना कर पाँच-छह सखियों  के साथ पहुँच गई सुन्नदा के घर जहाँ उसकी दुल्हन की प्रतीक्षा  हो  रही थी.  अपर्णा  के आते ही शंख की मंगल ध्वनि और बंगला तरीके से लड़कियाँ  (जीभ  हिलाकर) मंगलगान  करने लगी.  सारा वातावरण  इस शुभ ध्वनि  से गूँज उठा. दोनों पक्ष दुल्हा-दुल्हन को गोद में उठाकर चारों ओर घुमाने लगे. दोनों के बीच एक परदे की आड़ थी जब परदा हटा तो अपर्णा ने गुड़ियाा का चेहरा पान-पत्तों  से ढक दिया और कहने पर भी हटाने के लिए  नहीं  मानी.  इधर दूल्हा पक्ष में सुनन्दा के दादा (बड़े भाई)  कोलकाता से आए हुए थे पीयूष बाबू …जैसा नाम वैसा ही व्यवहार और वैसी ही सूरत.. आहा,,,हा बिल्कुल नारायण-सा रूप.
बड़ी देर से वे अपर्णा  की ओर देख रहे थे. अपर्णा इस बात से बेखबर अपनी ज़िद पर अड़ी थी कि पहले दूल्हा से कहो कि दुल्हन की हर माँग पूरी करेगा तब ही दुल्हन  का चेहरा देखने को मिलेगा.  समय  बीता जा रहा था… पीयूष अचानक मुड़ा और अगले ही पल अपर्णा  के बिल्कुल सामने था. उसने बिना कुछ कहे बस  अपर्णा  की ओर देखा, अपर्णा उसे इस प्रकार  अपनी  ओर देखते हुए थोड़ा सकपका  गई. पीयूष का उसे इस करह  घूरना  उसे अजीब  लगा.
वैसे तो अपर्णा  सिर्फ पन्द्रह  साल की थी और पीयूष इक्कीस. परन्तु न जाने क्यूँ आज अपर्णा को प्रथम बार ये भान हुआ कि वो  एक लड़की है और पीयूष  की  नज़रो का सामना वो न कर सकी और पीछे हट गई.  वो बिना मुड़े पीयूष की ओर देखती हुई चलती रही और पीयूष भी अपलक  उसे निहारता रहा. उन दोनों के बीच जो नैनों  का वार्तालाप हुआ उसे बस वे दोनों ही समझ पाए बाकी किसी को इसकी थाह न हुई.
इधर अपर्णा  उल्टे पैर घर वापस लौट  आई.  रात भर पीयूष की आँखें उसका पीछा करती रही. करवटों  में बीती रात.  सवेरे चिड़ियों  के कलरव,  गाय के रंभाने  का शोर, सूरज की चमक, नीला आकाश, पिताजी का गायत्री मंत्र, दादी का गीता पाठ ,माँ की पूजा की घण्टी…. .   सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज़ होता है सिर्फ अपर्णा  को छोड़कर.  आज न वो खिलखिला रही थी, न मुस्कुरा रही थी बस चुपचाप बैठी थी अनमनी सी कि जैसे उसका कुछ गुम  गया  हो.  सब हैरान थे कि उसे क्या हुआ है.
माँ ने जलपान करने को कहा तो अपर्णा  ने मना कर दिया.  वो चुपचाप अपने घर के आँगन के झूले  में बैठी रही और सोचते रही पीयूष के बारे में कि अचानक सुनंदा चली आई. “ओ अपर्णा किस सोच में डूबी  है,  चल ना  28 खेलने.”
अपर्णा ने सुना  ही नही.  सुनन्दा ने बिल्कुल  झझोंड़ते हुए कहा… “ऐई मेय कथाए दाड़िए आछो.  कि भापछि.? चल ना
“ओ सुन्नदा, तू कब आई”?
“तू जब ख्यालों मे खोई थी तभी. “
” चल रही है ना तू,  नुपुर और दादा  प्रतीक्षा  कर रहे हैं,  चल. “
पीयूष का नाम सुनते ही जैसे करेंट लग  गया  हो अपर्णा को
“ना बाबा आमि जाबो ना,आमार पाए बैथा होच्छे. “(मैं नहीं  जाऊँगी  मेरे  पैरों  में  दर्द  हो रहा  है)
“आहाहाहा….  बड़ी आई,  कोई बहाना नही चलेगा कोई दर्द-वर्द नही हो रहे तेरे पैर.  तुझे चलना  ही ….चल ना.. चल ना..  “
सुनंद  तब तक कहती रही जब तक अपर्णा  ने हाँ नही की.
“अच्छा बाबा रूक  माँ से कह  कर  आती  हूँ. “
सुनंदा  के घर पहुँचने ही सब ताश खेलने बैठ गए. पीयूष  का इंतजार हो रहा था.  अपर्णा  मन ही मन सोच रही थी कि काश पीयूष न आए और उसे उसकी दिल में उतर जाने वाली नजरों का सामना न करना पड़े. तभी पीयूष आ गया. बंगाली धोती-कुर्ते में किसी राजकुमार से कम नही दिख रहा था.
” कि दादा,,, खूब दारून लाग्छो.” सुनंदा  ने कहा
(बहुत ज़बरदस्त लग रहे हो)
“किसी का कत्ल  करने का इरादा है?”
कह कर सुनंदा हँसने लगी.
पीयूष  हौले-से मुस्कुराया और मुस्कराते हुए अपर्णा की ओर देखा जो निगाहें झुकाए बैठी थी.
“देख तो अपर्णा क्या मैं सच नही कह रही दादा के लिए…. बोल ना. “
अपर्णा  का नजरें उठाना दुश्वार  हो रहा था. उसने नजरें उठाई तो देखती ही रह गई ठगी- सी पीयूष के.
गोरे मुखड़े पर दो सुंदर गहरी आँखें, चौड़ा ललाट, गुलाबी होंठ.. जैसे नारायण स्वयं धरती पर उतर  आए हों.  पीयूष  से  नजरें  मिली, पीयूष भी अपर्णा  की ओर ऐसे देख रहा था मानो कुछ कह रहा हो. अपर्णा का दिल धड़कने लगा.  तभी पीयूष पास आ कर बैठ गया. सर्दी  के मौसम  में अपर्णा पसीने-पसीने हो गई.
पीयूष उसकी घबराहट  भाँप गया और माहौल को सामान्य बनाते हुए कहा कि
“चलो पत्ते बाँटो नुपुर  भी आ चुकी है.”
खेल शुरू हुआ.. अपर्णा  और पीयूष  बिल्कुल  आमने-सामने बैठे थे. एक-दूसरे के प्रतिद्वन्दी
सुनंदा और अपर्णा  पार्टनर  थे, पीयूष और नुपुर भी.
दो-तीन राऊंड  हो गए. अब अपर्णा  भी थोड़ी सहज हो गई थी.
चौथा गेम चल रहा था… अपर्णा  ने शो किया
जिसे देखकर पीयूष ने उसे हाथ मिलाते हुए बधाई दी कोलकाता में अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़े पीयूष  आज़ाद और आधुनिक  विचार धारा के हैं. आदतन  हाथ पकड़ कर बधाई दे डाली. अपर्णा  को काटो तो खून नहीं.  पीयूष के स्पर्श  से वो बर्फ-सी ठंडी पड़ गई.
पीयूष उसकी बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखों में झाँक रहा था. अपर्णा सुंदर तो थी  पर उससे भी अधिक उसके रूप में एक सम्मोहन था. पीयूष जैसे खो गया  था उसकी आँखों  में.
तभी अपर्णा  ने अपना हाथ छुड़ाया और उठकर खड़ी हो गई. सुनंदा  से कहा कि उसकी तबीयत  ठीक  नही लग  रही वो घर जा रही है और उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना  बाहर निकल गई.
पूरी रात अपर्णा  फिर से सो नही पाई. पीयूष का चेहरा उसके ख्यालों में था. उसका अबोध मन से नही समझ पा रहा था कि आखिर ऐसा उसे क्यूँ लग रहा था.
दो दिन यूँ ही बीत गए.  सुनंदा ने फोन करके कहा कि “आज देवी पूजा है घर पर, तुझे आना है. “
अपर्णा सुनंदा  के घर गई.  पूरे वक्त  पीयूष  उसके साथ बैठा था. आज अपर्णा  भी थोड़ी सहज थी. पीयूष का बार-बार  देखना उसे भला लग रहा था.  उसके गुलाबी गालों पर पड़े डिम्पल पीयूष को उसकी ओर आकर्षित कर रहे थे.  आज अपर्णा  और दिन से भी अधिक खूबसूरत  लग रही थी.  शायद ये पीयूष की नज़र का असर था और कच्ची उम्र का आकर्षण कुछ अलग ही होता है.
तभी सुनंदा की माँ ने अपर्णा को भण्डार घर से पूजा की थाली और बाकी सामान लाने को कहा. बाकि सामान लेकर अपर्णा पूजा की थाली खोजने लगी.  पूरे कमरे का निरीक्षण  कर लिया पर कहीं नही दिखी.  अचानक कमरे की दुछत्ती  पर नज़र गई.. “
आ हा.. मिल गई थाली.”
अपर्णा  मन ही मन प्रसन्न हुई और स्टूल पर चढ़ कर थाली उतारने लगी. इधर सुनंदा  की माँ ने पीयूष को अपर्णा  की सामान लाने में मदद के लिये भेज दिया.
अपर्णा  थाली उतार रही थी कि उसका संतुलन  बिगड़ गया और वो गिरने लगी. डर से अपर्णा  की आँखें बंद हो गई. तभी दो मज़बूत हाथों ने उसे थाम लिया. आँखें खुली तो पीयूष को देखकर अपर्णा घबरा गई और शर्म से लाल हो गई.
पीयूष उसकी घबराहट समझ गया. उसे सहारा दे कर जमीन पर उतारा. इस चक्कर में थाली में रखा सिंदूर थाली में फैल गया जिसे दोनों ने मिलकर अच्छी तरह से साफ कर दिया. अपर्णा के लम्बे काले केश इन सब में खुल कर बिखर कर उसके चेहरे पर आ गए. हाथों में थाली देखकर पीयूष ने उसके बाल उसके सुंदर माथे से हटाकर कानों के पीछे टिका दिए. इतने क़रीब  से अपर्णा  को देखकर पीयूष  मंत्रमुग्ध हो गया. अपर्णा  की नजरें झुक गई. पीयूष ने कहा
“बहुत सुंदर लग रही हो आज तुम अपर्णा. “
अपर्णा शरमा  गई.
“चलिए पीयूष पूजा में देर  हो रही है. “
“हाँ चलो अपर्णा. “
जैसे ही अपर्णा चलने को हुई सामने रखे दर्पण पर उसकी नज़र  पड़ी.  उसकी माँग में लाल-लाल कुछ झलक रहा था. पास जा कर देखा तो सन्न  रह गई.  पीयूष की ऊँगलियों से उसकी माँग में सिंदूर लग गया था. पीयूष ने भी देख लिया. हड़बड़ाकर  अपर्णा  सिंदूर  पोंछने लगी तो पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया.
“इसे तो पोंछ लोगी अपर्णा, पर तुम्हारे  हृदय पर जो मेरे प्रेम का सिंदूर  लग गया है उसे कैसे हटाओगे.? “
“ओ पीयूष…. “कुछ न बोल पाई अपर्णा.
उसके हाथों से थाली लेकर टेबल पर रखते हुए पीयूष ने अपर्णा  का हाथ अपने हाथों में ले लिया.
अपर्णा  ने भी इसका विरोध  नही किया.  वो अब समझ चुकी थी कि वो अब पीयूष  से प्रेम करना लगी है.
पीयूष ने उसे आलिंगनबद्ध करते हुए कहा अब तुम मेरी अर्धांगिनी  बन गई हो “पर्णा”
परसों जा रहा हूँ आर्मी  ट्रेनिंग  में. क्या कुछ वृक्षों तक मेरी प्रतिक्षा  कर सकोगी.
मासूम अपर्णा  को कुछ न सूधा बस पीयूष  के सीने पे पर सर रख दिया. उसकी कम उम्र  उस वक्त इन सब बातों को समझने में असमर्थ  थी. दोनों भण्डार  घर से बाहर आ गए. अपर्णा अब एक नये रूप में थी. दोनों एक-दूजे के लिए समर्पित थे.
पीयूष की विदाई  वाले दिन पीयूष उससे मिला और एक पैकेट उसके हाथों में दिया.
“ये मेरे प्रेम की निशानी है अपर्णा. मेरी प्रतिक्षा  कर सको तो करना परन्तु कोई बाध्यता नही है. ये साड़ी मैं अपनी  अर्धांगिनी  को दे रहा हूँ  और चाहता  हूँ कि जब वो करवा-चौथ का चाँद देखे तो मेरा चाँद उस आसमान  के चाँद से भी ज़्यादा  हसीन लगे कि उसे भी मेरे चाँद पर रश्क हो.”
अपर्णा  ने वो पैकेट पीयूष से ले लिया.  कुछ कह न पाई. उसकी आँखों में आँसू थे.
“पीयूष ,,  ” कहकर वो उससे लिपट  गई.
पीयूष ने उसके सर पर अपना हाथ रखा और उसके माथे को चूम लिया.
“जाते-जाते एक राजा बताना चाहता  हूूँ  अपर्णा.  जैसे तुम्हें  देखा.. मैं पहली नज़र में ही तुमसे प्रेम करने लगा था. अपना ख्याल रखना… मेरे लिए. “
पीयूष चला गया… अपर्णा उसे देखता रह गई.
दिन महीने बने, महीने साल.  दोनों फोन पर बातें करते. अपर्णा  का ग्रेजुएशन हो गया. सुहासिनी उसके विवाह की चिंता करने लगी परन्तु  अपर्णा तो पीयूष  से प्रेम करती थी उसने अपना फैसला सुना  दिया कि वो अपनी आगे की पढ़ाई  पूरी करेगी और एवजी से जुड़ कर गरीब बच्चों और बेसहारा महिलाओं  की मदद करना चाहती है. विवाह की अभी कोई इच्छा  नही तो उससे ज़बरदस्ती  न की जाए.
अपर्णा  के ऐसे कठोर निर्णय के आगे उसके पिता तपन झुक गए परन्तु सुहासिनी कुछ महीनों तक नाराज़  रही.  पर एक बेटी से माँ कब तक पीछा रहती.  धीरे-धीरे वे समझने लगी अपर्णा को और जो लगातार  विवाह का दबाव जो वे अपर्णा पर समय-समय पर डाल रही थी,   बंद कर दिया.
इधर नौकरी के सिलसिले में अपर्णा  का तबादला मुंबई हो गया था.  माँ-पिताजी चिंता में थे कि जिस बेटी को एक क्षण के लिये भी आँखों से ओझल नही किया उसे इतनी दूर कैसे भेजेगें.
पर अपर्णा  उन्हें समझा-बुझाकर मुंबई गई.  बीच-बीच में सुहासिनी और तपन उसके पास रहने जाते रहते थे. कब दस वर्ष  बीत गए पता ही नही चला.
इधर पीयूष की ट्रेनिंग के बाद उसे अमेरिका  भेज दिया गया जहाँ उसे कुछ वर्षों तक सिंगल स्टेट्स  में ही रहना अनिवार्य था.  अपर्णा  ने उसकी मजबूरी को समझा.
हर वर्ष की तरह  करवा-चौथ पर वह आज भी नवनविवाहिता  की तरह सज-धज कर तैयार हुई जैसे पीयूष से विवाह के पश्चात  होती रही है.
उसके वॉर्डरोब  में एक से एक मंहगी सीड़ियाँ  थी पर न जाने आज उसने पीयूष की दी हुई साड़ी ही पहली.
चाँद उगता ही छत पर पहुँची हाथों में पूजा की थाली लिए. कुछ पल चाँद को निहारती  रही, न जाने क्या बातें करती रही उससे अपने और पीयूष  के बारे में. फिर चाँद को अर्घ दिया और चलनी पर जलते दिए को रखकर चाँद को देखा फिर आदतन घुम कर पीयूष की तस्वीर  देखने ज्यूस ही मुड़ी… उसकी आँखें आश्चर्य  से फैल गई.  पीयूष बिल्कुल  उसके  सामने खड़ी था.
अपर्णा  अपनी आँखों पर विश्वास  नही कर पा रही थी पर ये पीयूष ही तो थे जिनका उसने पलकें बिछाकर बरसों इंतज़ार  किया.  कितनी रातों काटी प्रतीक्षा में उनके, गीत-गज़ल-नज़्म सब कुछ लिख डाले थे.
सपनों में अक्सर  बातें किया करती थी पीयूष से और अपने ख्यालों में भी.  आज पीयूष को सामने देखकर कुछ बोल न पाई.  पीयूष खड़ा मुसुकुराता रहा. अपर्णा ने उसकी आरती उतारी.  माथे पर टीका लगाकर जैसे ही गुड़ खिलाना लगी पीयूष ने उसका हाथ थाम लिया.  पीयूष  के स्पर्श  से अपर्णा सिहर उठा. उसकी आँखें भींग गई. अब उसके सब्र  की इंतेहा  हो चुकी थी पीयूष ने उसे अपनी तरफ खींच लिया.  अपर्णा  पीयूष से लिपट  कर रोने लगी.
पीयूष ने उसे शांत किया.  इतने वृक्षों का कठोर तप आज रंग ले आया था.  पीयूष ने अपर्णा  को नज़र भर कर देखा. फिर आसमान पर चमकता चाँद को देखकर कहा….
” पता है मेरा चाँद तुमसे कहीं अधिक खूबसूरत  है.  यकीन नही होता तो खुद देख लो. “
कह कर अपर्णा की ओर मुड़ा और उसका चेहरा अपने हाथों में थाम कर उसके माथे को चूम लिया.
अपर्णा  का चेहरा जो इन कुछ वर्षों में हर करवा-चौथ पर मद्धिम रहा वो आज पूरी तरह  खिल  गया  था पीयूष  का साथ पा कर.
दूरी ने उनके इस अटूट, प्रेम को बनाए रखा
आज पूरा था चाँद और एक सौ सोलह चाँद की रातों का इंतज़ार भी पूर्णता पर था.
दोनों साथ भोजन कर रहे थे.  पीयूष अपर्णा  को अपने हाथों से खिला रहे थे और अपर्णा  पीयूष को देख-देखकर ही निहाल हुई जा रही थी.
खिड़की से चमकता वो चाँद उन दोनों की खुशी देखकर अपनी रोशनी की छटा बिखेर रहा था.
आखिर इस बार “एक सौ सोलह चाँद  की रातों का चाँद” जो था आसमान पर..

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