Ganesh Chaturthi: क्या हैं गोबर गणेश? जानिये कुछ गणेश विसर्जन के विषय में

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गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें सभी पाठकों को. गणेश जी के आगमन पर हमें जितना उनके स्वागत तथा पूजन पर ध्यान देना चाहिये उतना ही आवश्यक यह बात जानना भी है कि गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है और इसकी क्या पद्धित है.
हम हिन्दुओं में प्रायः देखा-देखी में एक परंपरा चल पड़ती है जिसके पीछे का मर्म लोग नहीं जानते लेकिन अंधानुकरण से वह चलती रहती है। वैसे धर्म को लेकर मर्म तो दूसरे धर्मों में भी लोग नहीं जानते और वहां अंधानुकरण तो हिन्दुओं से अधिक होता है.
आज जिस तरह गणेश जी की प्रतिमा के साथ अनुचित व्यवहार होता है, उसको देख कर अपने दुःख होता है।
शास्त्रों में गाय के गोबर से बने हुए गणेश जी या मिट्टी से बने हुए गणेश जी की मूर्ति के विसर्जन के बारे में भी बताया गया है।
गोबर से गणेश एकमात्र प्रतीकात्मक संकेत है जो माता पार्वती द्वारा अपने शरीर के उबटन से गणेश जी को उत्पन्न करने के दृष्टांत से जुड़ता है.
चूंकि गाय का गोबर हमारे शास्त्रों में पवित्र माना गया है इसीलिए गणेश जी का आह्वाहन गोबर की प्रतिमा बनाकर ही किया जाता है। इसीलिए एक शब्द प्रचलन में चल पड़ा :- “गोबर गणेश”
इसिलिए पूजा, यज्ञ , हवन इत्यादि करते समय गोबर के गणेश का ही विधान है। जिसको बाद में नदी या पवित्र सरोवर या जलाशय में प्रवाहित करने का विधान बनाया गया ।
अब आईये समझते हैं कि गणेश जी के विसर्जन का क्या कारण है ?
भगवान वेदव्यास ने जब शास्त्रों की रचना प्रारम्भ की तो भगवान ने प्रेरणा कर प्रथम पूज्य बुद्धि निधान श्री गणेश जी को वेदव्यास जी की सहायता के लिए गणेश चतुर्थी के दिन भेजा।
वेदव्यास जी ने गणेश जी का आदर सत्कार किया और उन्हें एक आसन पर स्थापित एवं विराजमान किया ।
(जैसा कि आज लोग गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की प्रतिमा को अपने घर लाते हैं)
वेदव्यास जी ने इसी दिन महाभारत की रचना प्रारम्भ की या “श्री गणेश” किया ।
वेदव्यास जी बोलते जाते थे और गणेश जी उसको लिपिबद्ध करते जाते थे । लगातार दस दिन तक लिखने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन इसका उपसंहार हुआ ।
भगवान की लीलाओं और गीता के रस पान करते करते गणेश जी को अष्टसात्विक भाव का आवेग हो चला था जिससे उनका पूरा शरीर गर्म हो गया था और गणेश जी अपनी स्थिति में नहीं थे ।
गणेश जी के शरीर की ऊष्मा का निष्कीलन या उनके शरीर की गर्मी को शांत करने के लिए वेदव्यास जी ने उनके शरीर पर गीली मिट्टी का लेप किया । इसके बाद उन्होंने गणेश जी को जलाशय में स्नान करवाया , जिसे विसर्जन का नाम दिया गया ।
बाल गंगाधर तिलक जी ने अच्छे उद्देश्य से यह शुरू करवाया पर उन्हें यह नहीं पता था कि इसका भविष्य बिगड़ जाएगा ।
गणेश जी को घर में लाने तक तो बहुत अच्छा है , परंतु विसर्जन के दिन उनकी प्रतिमा के साथ जो दुर्गति होती है वह असहनीय बन जाती है ।
सबसे ज्यादा दुःख तब होता है जब भीड़ बढ़ाने के लिए लोग DJ पर फिल्मी अश्लील गाने और नचनियाँ को नचवाते हैं ।
आप विचार करके हृदय पर हाथ रखकर बतायें कि क्या यही उद्देश्य है गणेश चतुर्थी या अनंत चतुर्दशी का ?? क्या गणेश जी का यह सम्मान है ?
इसके बाद विसर्जन के दिन बड़े जिस तरह से बिना जल में डुबाये ही हम मूर्तियों को पानी पर छोड़ कर आ जाते हैं, वह ठीक नहीं है. यह अपूर्ण विसर्जन है. मूर्ति बिना डूबे तैरती रहती है और जब किनारे पर आ जाती है तो उसकी दुर्गति हो जाती है ।
वेदव्यास जी का तो एक कारण था विसर्जन करने का लेकिन हम लोग क्यों करते हैं यह बुद्धि से परे है ।
क्या हम भी वेदव्यास जी के समकक्ष हो गए ? क्या हमने भी गणेश जी से कुछ लिखवाया ? क्या हम गणेश जी के अष्टसात्विक भाव को शांत करने की हैसियत रखते हैं ?
गोबर गणेश मात्र अंगुष्ठ के बराबर बनाया जाता है और होना चाहिए , इससे बड़ी प्रतिमा या अन्य पदार्थ से बनी प्रतिमा के विसर्जन का शास्त्रों में निषेध है।
एकमात्र हवन , यज्ञ , अग्निहोत्र के समय बनने वाले गोबर गणेश का ही विसर्जन शास्त्रीय विधान के अंतर्गत आता है ।
प्लास्टर ऑफ पेरिस से बने , चॉकलेट से बने या केमिकल पेन्ट से बने गणेश प्रतिमा का विसर्जन एकमात्र अपने भविष्य और उन्नति के विसर्जन का मार्ग है ।
इससे प्रकृति के वातावरण , जलाशय , जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र , भूमि , हवा , मृदा इत्यादि को भारी नुकसान पहुँचता है।
इसीलिए गणेश विसर्जन को रोकना ही एकमात्र शास्त्र अनुरूप है ।
चलिए माना कि आप अज्ञानतावश डर रहे हैं कि इतनी प्रख्यात परंपरा हम कैसे तोड़ दें तो करिए विसर्जन । लेकिन तब या तो मिट्टी की गणेश मूर्ति लाइये या गोबर के गणेश को बनाकर विसर्जन करिए और गोबर वाली विसर्जन की दृष्टि से उनकी प्रतिमा छोटी ही रहे तो ठीक है. पर यह आपकी श्रद्धा पर निर्भर करता है आप चाहे जिस आकार की प्रतिमा लायें. परंतु स्मरण रहे विसर्जन उचित ढंग से करें. जय श्री गणेश।

(श्री धाम वृन्दावन)