परख की कलम से: Gautam Buddha सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं

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विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम |न उच्चावच्चं गच्छति भूरिपज्जो ||
उपरोक्त श्लोक का अर्थ है – जो व्यक्ति वेदों से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है वह विचलित नही होता है।
यह सुत्तनिपात का 292वाँ श्लोक है जो स्वयं भगवान बुद्ध ने कहा था।
गौतम बुद्ध के विरुद्ध फैल रही भ्रांतियों के लिये यह लेख आवश्यक हो गया है। आज के समय बौद्ध धम्म को अम्बेडकरवाद से जोड़कर देखा जाता है लेकिन बौद्ध धम्म का आधार अहिंसा और प्रेम है जबकि अम्बेडकरवाद को ब्राह्मण विरोध के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है.
यदि आप थाईलैंड और जापान जैसे बौद्ध देशों में जायें तो पता चलेगा कि वहाँ हिन्दू देवी देवताओं की पूजा भारत से भी अधिक भव्यता से होती है। थाईलैंड एक बौद्ध राष्ट्र है मगर उसका राष्ट्रीय ग्रंथ रामायण है।
बात 5000 वर्ष पहले की है जब भारत ने अपनी सबसे बड़ी त्रासदी महाभारत को देखा था। इस युद्ध ने कई विद्वानों का संहार कर दिया था, गुरुकुल खाली हो गए थे अंततः वैदिक विज्ञान का पतन हुआ। ब्राह्मण दो गुटों में बंट गए एक ब्राह्मण वर्ग वैदिक ज्ञान को बचाना चाहता था तो दूसरा ब्राह्मण वर्ग टूट चुके समाज को अपने अनुरूप ढालना चाहता था।
दूसरे वाले ब्राह्मणों का पलड़ा बहुत भारी था और अंततः भारत का पतन आरंभ हुआ। पशु बलि, जन्म आधारित जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी बुराइयां घर करने लगी। ऐसे दौर में बुद्ध हुए, बुद्ध ने स्वयं कोई अध्ययन नही किया था अपितु उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति योग और ध्यान से हुई थी। बुद्ध ने हमेशा सामाजिक समरसता की बात की और अधिकांश लोग जो कि युद्धों से परेशान हो चुके थे उन्होंने बौद्ध धम्म अपनाना शुरू कर दिया।
गौतम बुद्ध के उपदेश यदि देखे तो पता चलेगा कि वे वेदों के विरोधी तब रहे जब उन्हें बिना किसी विवेक के पढ़ा जाए। यह तो तथ्यात्मक बात है क्योकि वेदों की एक एक ऋचा बड़ी पवित्र है और कई तरह का ज्ञान देती है अब यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह वेदों में पशु बलि ढूंढेगा अथवा जीव दया।
बौद्ध देशों पर भी ना जाने कितने ही विदेशी हमले हुए मगर वहाँ बौद्ध विजयी हुए क्योकि उन्होंने शस्त्र नही त्यागे जबकि भारत मे इस्लामिक आंधी ने बौद्ध धम्म को हवा में उड़ा दिया था। इसका एक कारण यह भी था कि बौद्ध धम्म पूर्वी देशों में अलग-अलग लोगो के मुख से गया जिसके कारण लोग पूर्ण रूप से बौद्ध धम्म अपना नही सके उन्होंने बौद्ध धम्म की वही बात मानी जो उन्हें ठीक लगी।
यह तो था बुद्ध का बौद्ध धम्म जो प्रज्ञा, करुणा और समता की बात करता है, इसके बाद आता है अंबेडकर का बौद्ध धम्म। अंबेडकर हिन्दू धर्म छोड़ना चाहते थे कारण था हिन्दू कोड बिल का विरोध, इससे अंबेडकर यह समझ गए थे कि हिन्दुओ की सोच में परिवर्तन करना असंभव है।
बहरहाल मैं अंबेडकर सै सहमत नहीं हूं, पर इस बात से सहमत हूं कि हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग अपनी सोच को लेकर इतना ज्यादा कट्टर है कि वो कभी सकारात्मक परिवर्तन भी स्वीकार नही करेगा।
यही अंबेडकर की दुविधा थी इस्लाम और ईसाई धर्म से वे असहमत थे जबकि उन्होंने सिख धर्म मे जातिगत भेदभाव देखा था। जैन तो स्वयं को हिन्दू धर्म की एक जाति ही मानते थे. अब रह गया तो सिर्फ बौद्ध धम्म जिसका कोई प्रतिनिधित्व नही था और इसका सिंहासन अंबेडकर के लिये खाली था। बस उसके बाद उस दिशा में ही इतिहास बढ़ता चला गया.
अतः बौद्ध धर्म और अंबेडकरवाद को अलग-अलग चश्मे से देखने की आवश्यकता है। यदि हम चंद अंबेडकरवादियों के लिये बुद्ध की निंदा करे तो यह अन्याय होगा। बुद्ध हमारे है और बुद्ध सारे विश्व के हैं. कोई ताकत उनको भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से अलग नही कर सकती।
(परख सक्सेना)
https://t.me/aryabhumi
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