Hindu Dharma: प्राचीन भारतीय दण्ड विधान   

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प्रचीनकाल में भारतीय दण्ड विधान स्मृति ग्रन्थों में मिलता है। स्मृतियाँ इक्कीस मानी जाती हैं। मनुस्मृति इनमें प्रमुख है। इन ग्रंथों में कई विषयों पर चर्चा मिलती है, जिन्हें बड़ी सरलता से समझाने का प्रयास किया गया है। यद्यपि कुछ लोग मनुस्मृति की आलोचना करते हैं, परन्तु यदि गहराई से इसका अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि इसमें जो भी ज्ञान दिया गया है, वह सारगर्भित, जीवनोपयोगी और महत्वपूर्ण है।
          देश कुमार जी ने जनवरी 2018 में इस विषय पर अपने विचार विस्तार से रखे थे। उनका कथन था कि शूद्र को दण्ड विधान में इस तरह का आरक्षण सम्बन्धी अद्भुत उल्लेख विश्व में दूसरे किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता है। वे मनुस्मृति में आरक्षण की चर्चा करते हैं। मैं उनकी तरह तो नहीं पर सार रूप में भारतीय दण्ड विधान का एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने विचार रख रही हूँ।
        हमारे भारत में अभी तक दण्डविधान अंग्रेजों द्वारा बनाई गई दण्ड व्यवस्था पर आधारित है। हालांकि कुछ-कुछ परिवर्तन उसमें किए गए हैं, पर अभी भी बहुत सुधार की आवश्यकता है। उसके अनुसार एक अपराध के लिए एक ही प्रकार के दण्ड की व्यवस्था है। यानी उस अपराध की प्रकृति को चाहे कोई जानता है अथवा नहीं जानता, सबके लिए उतना ही दण्ड निश्चित है। ऐसा माना जाता है कि कानून के प्रति अज्ञानता का होना क्षमा के योग्य नहीं होता।
          मनुस्मृति के आठवें अध्याय में उल्लिखित दण्डविधान का एक उदाहरण देखते हैं जहाँ एक ही प्रकार की चोरी जैसे निकृष्ट कर्म के लिए चारों वर्गों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को क्या दण्ड मिलना चाहिए, बड़ी ही स्पष्टता से बताया गया है-
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।।
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्।द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः।।
अर्थात् चोरी जैसा कर्म करने पर राजा को चाहिए कि वह शूद्र को उस वस्तु के मूल्य का आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना, क्षत्रिय को बत्तीस गुना अर्थदण्ड दे। ब्राह्मण को चौसठ गुना या पूरा सौ गुना दण्ड दे।
          मनु महाराज का यह कथन स्पष्ट है कि चोरी जैसे दुष्कृत्य के लिए सजा तो मिलनी चाहिए पर व्यक्ति की योग्यता के अनुसार। सबसे अधिक दण्ड ब्राह्मण के लिए निर्धारित किया है। इसका कारण है उसका ज्ञानवान होना। उसका कार्य पठन-पाठन का है। इसलिए वह कानून का जानकार है। यदि वह अपराध करता है तो उसे अधिकतम दण्ड मिलना चाहिए। क्षत्रिय का कार्य सुरक्षा करने का होता है। यदि सुरक्षा करने के स्थान पर चोरी जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है तो उसे वस्तु के मूल्य का बत्तीस गुणा आर्थिक दण्ड मिलना चाहिए।
          वैश्य का कार्य व्यापार करना होता है। यदि वह ऐसा दुष्कर्म करता है तो उसे वस्तु का मूल्य का सोलह गुणा आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए। शुद्र क्योंकि सेवा कार्य करता है और वह पढ़ा न होने के कारण कानून का जानकार नहीं होता, इसलिए उसे वस्तु के मूल्य का आठ गुणा आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए। बहुत आसान-सा फार्मूला है।
        यहाँ मैं एक बार फिर स्पष्ट करना चाहती हूँ कि शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था कर्म के अनुसार मानी जाती है, जन्म के अनुसार नहीं। किसी कुल में जन्म लेने से वह उसी कुल का नहीं हो जाता अपितु जिस व्यवसाय में वह जाता है, वही उसका वर्ण होता है। यानी ब्राह्मण का बेटा शुद्र भी हो सकता है और क्षत्रिय या वैश्य भी। क्षत्रिय का पुत्र ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र कुछ भी हो सकता है। वैश्य का पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय या शूद्र कुछ भी कहला सकता है। इसी प्रकार शुद्र का पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कोर्ई भी व्यवसाय अपना सकता है। उसका वर्ण तदनुसार ही कहलाता था। कालान्तर में न जाने कब ये वर्ण अन्य बुराइयों की तरह रूढ़ हो गए।
        वास्तव में ऐसी बढ़िया न्याय व्यवस्था औऱ कोई हो ही नहीं सकती। अपने मनीषियों की सराहना किए बिना रह नहीं जाता जिन्होंने अपराध रोकने के लिए इतने कड़े कानून बनाए थे। धन्य हैं ऐसे मनीषी।
(चन्द्रप्रभा सूद)