Independence is a must: आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है

कभी-कभी हम किसी के लिये उतने भी ज़रूरी नहीं होते जितना हम समझते हैं |ऐसा क्यूँ होता है?क्या साईकोलॉजी है इसके पीछे?
हमें तो बस इतना पता है कि हम औरतें सात फेरों के बंधन में बँध कर जिसके पीछे अपना बचपन,वो यादें,माँ-बाप,सखियाँ,बहन-भाई,रिश्तेदार सारे रिश्ते छोड़ कर एक पल में उस अजनबी से जुड़ जाती हैं|कैसा रिश्ता है ना….जिसे ठीक से जानते भी नहीं उसके लिये इतना प्रेम,इतना समर्पण और त्याग कहाँ से आ जाता है ?खुद को मन की थाह नहीं होती क्यूँकि ये आपे आप ही होता है पर क्यूँ होता है?
कैसे हम स्त्रियाँ अचानक ही इतनी मच्यौर हो जाती हैंं, अपना बचपना भूल कर|कभी दुलारती हैं तो कभी मनाती,कभी मनुहार और हमेशा प्यार देना|ताने भी अमृत का घूँट पीकर सह जाती हैं|क्यूँकि वो प्रेम जो इतना करती हैं उनसे|उनको क्या पसंद-नापसंद वैसे ही सजना-सँवरना,वही बनाना जो उनको भाता,करवा-चौथ के दिन उनकी लम्बी आयु और अपने सुहागन रहने की मन्नत से व्रत रखना,शनिवार को पीपल का पेड़ सींचना कि शनि की दशा न लगे|
होली,दीवाली में घर को सजाना-सँवारना,ढेरों मिठाईयाँ,नमकीन,पकवान बनाना अपने हाथों से ताकि घर में बरकत बनी रहे|अपने इष्ट देवता को प्रसन्न रखने की भरपूर कोशिश करना ताकि उसका ये परिवार हमेशा सुख की छाँव में फलता-फूलता रहे|सबकी इतनी परवाह,इतना ख्याल आखिर क्यूँ करती हैं हम स्त्रियाँ?इसका जवाब सिर्फ ये है कि ईश्वर ने स्त्री को ऐसे ढाँचे में डाला है जिसमें दिल के साथ अपार संवेदना और ममता के भावों से उसे सुसज्जित किया है|
थोड़ी अलग ही और बेमिसाल,बेजोड़ संरचना है स्त्री की जिसे ऊपर वाले ने बड़े ही संयम से गढ़ा है|मेरी इस बात से आप सब भी सहमत होंगें|क्यूँकि उसके ये दोनों गुण उसके एक सशक्त नारी और ममतामयी माँ होने का प्रतीक है|नारियाँ पुरूषों से ज़्यादा संवेदनशील इसीलिये होती हैं|मगर इसका अर्थ ये कतई नहीं कि पुरूष संवेदनशील नहीं होते|वे भी होते हैं तभी उस एक रिश्ते को जीवन-पर्यन्त निष्ठा और भाव से निभाते हैं|परन्तु पुरूषों को ईश्वर ने थोड़ा प्रैक्टिल ज़्यादा बनाया है शायद वे इसीलिये उतना गहराई से नहीं सोच पाते जितना कि स्त्रियाँ|वो क्या कहते हैं ना अँग्रेज़ी में थोड़ा “कूल” बनाया है पुरूषों को जो कहीं-कहीं पर ठीक भी है और कहीं अजीब भी|वहीं बात हम महिलाओं के लिये भी लागू होती हैं हर बात पर इमोशनल होकर निर्णय लेना भी उचित नहीं वरना सामने वाला आपका फायदा उठा लेता है|
कहने का अर्थ बस इतना है कि जीवन की गाड़ी तो दोनों यानि स्त्री और पुरूष के आपसी विचारों और समझ के तालमेल से ही बैठती है|मगर हम स्त्रियाँ थोड़ा ज़्यादा सोचती हैं,परवाह करती हैं इतना कि अपना अस्तित्व ही भुला देती हैं|जो कि मेरे हिसाब से नहीं होना चाहिये|अपने सारे कर्तव्य प्रेम पूर्वक निभाते हुए खुद की पहचान बरकरार रखना बहुत ही आवश्यक है|अगर ऐसा नहीं है तो एक समय के बाद न आपका कोई अस्तित्व रहेगा,न ही आत्म निर्भरता और मान-सम्मान भी धूप-छाँव जैसा हो जाता है|
मैं ये कहना चाहूँगी कि आत्म-निर्भरता और स्वयं की पहचान अपनी ज़रूर होनी चाहिये |परिवार के साथ कदम से कदम मिलाकर अवश्य चलें पर खुद को खो कर नहीं|उसमें ही कुछ वक्त अपने एहसासों,अपनी इच्छाओं और महत्वकांक्षाओं को भी दें|आपके अपने भी ज़रूर इस बात को समझेंगें और आपकी खुशी में खुश होगें|
कुछ वक्त दीजीये एहसासों को ये काम भी ज़रूरी है
जीवन की आपाधापी में आत्म-सम्मान भी बहुत ज़रूरी है!