OUR INDIA : सुन लो भारत के लाल !

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शेष विशेष है खोल कर्ण सुन लो भारत के लाल
अब भी है यह स्वर्ण विहग अंतर्दृष्टि तू डाल
खिले जहाँ पर सुमन वही पर मरघट-शमशान
भेड़िये की खाल में छुपकर बैठे इंसान !
बर्बरता के मंच पर चल रहा है नरसंहार 
राजनीति कठपुतली भ्रष्टाचार की शिकार 
प्रत्यंचा चढ़ाओ ढीली करो शरासन डोर
तुणीर बंधन खोल वह्नी-शर शत्रु की ओर !
बज रहा चहुँ ओर धर्म कट्टरता का बखान
भूल गई जनगंगा जन-गण-मन शक्ति-गान
वर्षों जिस सत्तादल ने किया रक्त का पान
चाटुरिकता छोड़ बोल हर गंगे देश महान !
आलोकित उस शेष-विशेष को न अवशेष बना तू
 सावधान हो हर हर बोल विजय-ध्वजा फहरा तू
सम्मानीय है पंथ सभी धर्म की लाज तू रखना
पाहुन दो दिन के अरि को देहरी के पार ही रखना !

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