अध्यात्म कथा -1: उपनिषदों में है सफल जीवन की प्रेरणा

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(महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती जी की एक अनुपलब्ध पुस्तक मुझे कहीं से मिल गई है, जिसमें छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से जीवन का मर्म समझने का प्रयास किया गय है। महात्मा जी ने अपने जीवन मे सन्यास  और वानप्रस्थ लेने के उपरांत जो देशाटन करके लोगो मे जागरूकता फैलाई है उसका स्थान शायद ही कोई ले पाए।
मैने इस पुस्तक को पढ़ा है किन्तु जैसे सागर अथाह है उसी प्रकार मुझे भी बून्द भर ही समझ आया होगा। कारण ये नहीं है मेरे लिखने का कि मैं आपको कहानी सुना रही हूं, कारण है पुस्तक की अनुपलब्धता। सोचा बेकार लिखने से उनकी पुस्तक के कुछ पृष्ठ ही लिख जाऊं। अदना से शरीर से कुछ कर्ज चुका जाऊं, जन्म लिया है तो बेकार न हो जाय। इस क्रम में आज पहली कहानी प्रस्तुत है। श्री गणेशाय नमः!)

                      विचार -शक्ति           

महाभारत का युद्ध होने को था, विपक्षी सेनाएँ एक-दूसरे के समक्ष खड़ी थीं। पांडवों का सबसे बड़ा योद्धा था —,अर्जुन। स्वंय भगवान कृष्ण उसके सारथी थे। अर्जुन ने कहा — महाराज ! मेरे रथ को दोनोँ सेनाओं के बीच में ले चलिए, जिससे मैं दोनों और की शक्तियों को देख सकूँ।
श्री कृष्ण ने ऐसा ही किया। अर्जुन ने दोनोँ ओर के योद्धाओं को देखा तो एक विचार उसके मन मे उत्पन्न हुआ। दोनों ओर उसके भाई थे, सम्बन्धी थे, मित्र और परिजन थे। तुरन्त विचार आया कि इनको मार कर राज्य मिल भी गया तो क्या करूँगा?  उसी समय कवच आदि उतार दिए। तीर और तलवार फेंक दी। रथ से उतरकर पर जाकर खड़ा हो गया। भगवान ने पीछे देखा तो अर्जुन नहीं। आश्चर्य से इधर-उधर देखा, तो अर्जुन रथ से  दूर खड़ा था। भगवान कृष्ण ने उसके पास जाकर कहा—“अर्जुन, तुझे क्या हुआ ?”
अर्जुन ने अपने  हृदय का भाव बताया तो कृष्ण ने कहा — “अरे कायर!  क्षत्रिय होकर यह कायरों जैसा विचार तेरे हृदय में क्यों आया?”
परन्तु अर्जुन मन नहीं , बोला — ” मित्र, मैने सोच लिया है, मैं लड़ूंगा नहीं। जिस राज्य के लिएअपने भाइयों वृद्धओं और संबंधियों की हत्या करनी पड़े, वह मुझे नहीं  चहिये।”
तब भगवान श्री कृष्ण ने क्या किया? क्या पिस्तौल लेकर  अर्जुन की छाती पर चढ़ बैठे? नहीं! शान्ति से, गंभीरता से उन्होंने बताया कि तू क्या है? यह संसार क्या है? तेरे आस-पास खड़े लोग क्या है? बताया कि मोह ने तुझे कर्तव्यच्युत कर दिया है। वे लाखों बार उत्पन्न हुए हैं,लाखों बार उत्पन्न होंगे। बहुत महान, बहुत सुंदर ज्ञान है, जिसे भगवद्गीता कहते हैं। उस ज्ञान के द्वारा भगवान कृष्ण ने उसे दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा का भी हाल सुनाया।
सबकुछ सुनकर अर्जुन की आँखे खुल गई। फिर वह रथ में लौट आया, उसने फिर से कवच धारण किया, फिर से गाण्डीव हाथ में लिया और तीर चढ़ा दिया उसके ऊपर। पूरे उत्साह से अर्जुन ने कहा —  मैं लड़ूँगा, भगवान !”
यह है विचार-शक्ति! एक विचार ने इस महान योद्धा को उसके रथ से नीचे उतार दिया तो दूसरे विचार ने उसे फिर रथ पर चढ़ा कर युद्ध हेतु प्रेरित किया। यह प्रेरणा जीवन के संग्राम के लिये थी जिसमें महाभारत में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाया था।
उपनिषदों का यह संदेश अध्यात्म कथा के रूप में आचरण-प्रेरणा के उद्देश्य से आप सुधिजनों के सम्मुख प्रस्तुत किया गया।
(सुनीता मेहता)