पूछता है देश : क्या ‘प्रदर्शन का अधिकार’ या ‘असहमति का अधिकार’ संवैधानिक है?

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मैं कोई संविधान विशेषज्ञ नहीं हूं मगर फिर भी एक साधारण व्यक्ति की तरह तो संविधान में दिए हुए प्रावधानों का विश्लेषण तो कर ही सकता हूं —

1947 में देश के आज़ाद होने से पहले हमारे नेताओं ने रोज रोज अंग्रेज़ों के खिलाफ प्रदर्शन किये, उनके खिलाफ देश के लोगों को जगाने के लिए सत्याग्रह किये और भाषण दिए.
लेकिन संविधान सभा (Constituent Assembly) के करीब 390 सदस्यों ने स्पष्ट तौर पर संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों में “प्रदर्शन के अधिकार” और “असहमति के अधिकार” (Right to Dissent) को मौलिक अधिकार क्यों नहीं लिखा.
संविधान के प्रावधानों की व्याख्या आज के सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ऐसे कर दी हैं, जैसे कि संविधान के निर्माताओं में समझ की कमी थी.
संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के अनुसार – All citizens shall have the right to freedom of speech and expression- और इन दोनों का मतलब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से है –मगर “असहमति के अधिकार” को लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व बताना, आज की न्यायपालिका की खोज है.
संविधान लिखने वाले भी ये बात कह सकते थे और कह सकते थे कि यदि “असहमति” को दबाया गया तो प्रेशर कुकर फट जायेगा.
मगर संविधान के 26 जनवरी, 1950 को लागू होने के मात्र एक वर्ष बाद ही इस “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” में एक दोष पाया गया और 1951 में -अपराध के लिए प्रोत्साहन करना भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए आधार बनाया गया था.
आज इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हर तरह के अपराध किये जा रहे हैं और भारत का सुप्रीम कोर्ट उस पर केवल चुप ही नहीं है बल्कि प्रोत्साहन भी दे रहा है –तभी तो प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश करने वाले शहरी नक्सलों को भी ये अधिकार दे दिया .
ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की परिभाषा आज के जजों ने ऐसी कर दी कि लोग देश के टुकड़े टुकड़े करना भी अपना अधिकार समझने लगे – देश के एक हिस्से को चिकेन नैक बना कर देश से अलग करने की भी वकालत करने लगे.
देश के दुश्मनों के साथ (पकिस्तान और चीन) के साथ मिल कर कुछ नेता और दल देश को तोड़ने के प्रयास में लगे हैं और जब ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया गया तो अदालत उन्हें छोड़ने के लिए विचलित हो गई.
आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की परिभाषा संविधान के मर्म और मूल भावना को कुचलते हुए ऐसी कर दी गई कि देश विरोध के नारे लगाना, देश तोड़ने की बात करना, प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्द बोलना, उनकी हत्या के लिए साजिश करना या फतवे जारी करना और हिन्दू समाज की खिलाफत कर हिन्दू देवी देवताओं का
अपमान करना एक फैशन बन गया है.
मुझे नहीं लगता संविधान निर्माताओं की ऐसी मंशा रही होगी लेकिन जैसे आज संविधान को तोड़मरोड़ दिया गया है, उससे ये साबित करने की कोशिश की गई है कि जैसे संविधान लिखने वाले मूर्ख थे और उनमे कोई समझ नहीं थी –
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा प्रदर्शन को बार-बार मौलिक अधिकार बताने पर अगले लेख में विश्लेषण करूँगा क्यूंकि ऐसा अधिकार भी संविधान में कहीं नहीं दिया गया है.
–क्रमशः —
(सुभाष चन्द्र)
“मैं वंशज श्री राम का”
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