कैसे बने राक्षस राजा प्रतापभानु ?

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम के जन्म के कारण से सम्बंधित चार कल्पों की कथा का वर्णन है.
विभिन्न कल्पों में रावण और कुम्भकर्ण जन्म के अलग – अलग कारण है.
१:- एक कल्प में श्री हरि के द्वारपालों जय और विजय को सनकादिक ऋषियों के शाप के कारण एक जन्म में रावण और कुम्भकर्ण बनना पडा.
इसका प्रमुख कारण है जय और विजय का ” अहंकार ” कि हम तो श्री हरि के द्वारपाल है.श्री हरि के दर्शन के लिये हमारी अनुमति आवश्यक हैही.इस अहंकार के कारण उन्हें सद्गुण वृत्ति से च्युत होना पडा.इस प्रसंग मे राक्षसत्व का जन्म ” अहंकार ” के कारण हुआ.२:- दूसरेकिसी कल्प मे श्री शंकर भगवान के दो गण देवर्षि नारद केशाप के कारण राक्षस रावण बनते है.
दूसरे को पीडा देने की वृत्ति इसका प्रमुख कारण था.दूसरो के दु:ख में सुख की अनुभूति करना रासक्षी वृत्ति है.दोनो गण इस देवर्षि नारद के प्रति इतने अनुदार है कि वे विवेक रहित होकर नारद जी को सुनाकर (” करइ कूट नारदहिं सुनाई “)उनका उपहास करते हुए सुखी होते है.
ऐसा करना परपीड़न वृत्ति है.
” पर पीडा सम नहि अधमाई . ”
३: – एक कल्प मे जलन्धर राक्षस तीब्र प्रतिशोध भाव से युक्त है.बदले की भावना ने उसे राक्षस के रूप मे पुनः जन्म दिया.
४:-एक कल्प में राजा प्रताप भानु जी की कथा बताई गयी है.
यह धर्मात्मा था.
पर राक्षसत्व को प्राप्त हुआ.इसका कारण यह है
*** श्री गोस्वामी जी ने इस सृष्टि को गुण – दोष से युक्त माना है,
” जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ”
इसीलिए प्रारम्भिक पंक्तियाँ मे लिखा गया
” कहहि बेद इतिहास पुराना . बिधि प्रपंच गुन अवगुन साना.
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती
साधु असाधु सुजाति कुजाती
इस सृष्टि को जो गुण – दोष, युक्त है , ब्रह्मा जी ने बडी सावधानी और निपुणता से रची है.
मानव जीवन में गुण – अवगुण दोनो इस प्रकार एक दूसरे से मिले है कि इन्हें पृथक नही किया जा सकता
यही इस मृत्यु लोक की विशेषता है.
*** १:-राजा प्रताप भानु प्रत्येक दिन दान दिया करते थे.दान किसी विशेष अवसर पर न देकर प्रतिदिन करना और अनेक प्रकार के दान देना यह राजा प्रताप भानु का वैशिष्ट्य था .
“दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना
सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना ”
** प्रतिदिन वेद शास्ञो को सुनना.
२:-सार्वजनिक कल्याण के लिए तालाब, कूएं , सुन्दर उपवन और बागो की व्यवस्था करना,
*** ३:- वेद पुराण आदि में वर्णित यज्ञ को राजा ने सहस्त्र बार अनुराग सहित पूरा करना .
४:- अपने श्री गुरु जी,देवताओं , संत, ब्राह्मण एवं पितृ जन का सेवा करना राजा का नित्य का कार्य था.
*** ऐसा धर्मपालक, सच्चरित्र एवं नीति विराशद आदि अनेक सद्गगुणो से सुसज्जित राजा का भी पतन होना नितान्त गम्भीर विषय है.
*** राजा प्रताप भानु की यह कथा श्री शंकर जी ने मां पार्वती जी को सुनाया है.इस कारण यह प्रामाणिक है.
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी
जो गिरिजा प्रति संभु बखानी १/१५२/१
*** यह कथा पुरानी है और पुनीत भी .
श्री शंकर भगवान जी द्वारा कहे जाने के कारण यह कथा प्रामाणिक एवं प्राचीन है.
*** धर्मात्मा राजा प्रताप भानु के कारण श्री राम का जन्म होना है.इसलिए यह कथा ” पुनीत ” है.
*** श्री शिव जी ने इस कथा के माध्यम से एक ऐसे मनुष्य के चरित्र प्रस्तुत किया है जो सांसारिक जीव का प्रतिनिधित्व करता है.
*** एक सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति लोभ के कारण पथ भ्रष्ट हो जाता हैं.
उसकी परिणित अत्यंत भयावह होती है.
उसे राक्षसत्व की प्राप्ति होती है.
*** मानव के तीन प्रबल शत्रु है.
काम
क्रोध
लोभ
ये तीन विकार तीनो कालो से सम्बंधित है.मानव का समस्त जीवन इन तीनों कालों से बंधा हुआ है.
**काम का सम्बन्ध वर्तमान समय से होता है.यह वर्तमान का पोषक होता है.काम को न तो भविष्य की चिन्ता रहती है न तो भूत की.
काम मानव को वर्तमान के सुख की ओर आकर्षित करता है.काम का सम्बन्ध भविष्य से भी होता है.वर्तमान में किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आकर्षण हुआ, तो उसे प्राप्ति की कामना उत्पन्न हो ही जाती है.अन्त: करण मे काम का संचरण होता है जिसकी पूर्ति भविष्य मे ही सम्भव है.
***क्रोध का सम्बन्ध भूत काल में घटित घटना से होता है.क्रोध मानव को उस घटना पर आता है जो भूतकाल में होती है.क्रोध एक भूत कालीन व्यवस्था है, जो मानव के वर्तमान को प्रभावित करती है.वर्तमान क्रोध के अधीन होने पर मानव को कष्ट देता है. इस कारण उसका जीवन नरक के समान हो जाता है.
***लोभ का सम्बन्ध भविष्य से होता है.हम सब यह सोचते है कि वर्तमान ठीक चल रहा है, भविष्य कैसे बीतेगा? यही लोभ का जन्म होता है.लोभी व्यक्ति को वर्तमान से अधिक भविष्य की चिन्ता रहती है
**काम और क्रोध की वृत्ति हर समय नही बनी रहती है.कोई व्यक्ति अहर्निश न तो कामी बना रहता है न तो क्रोधी.
*** लोभ की प्रकृति सदैव बने रहना है.रात – दिन, सोते – जागते, हर पल लोभ मानव के साथ लगा ही रहता है.काम के पीछे मन और क्रोध के पीछे अहंकार होता है, जब कि लोभ के पीछे बुद्धि.
काम और क्रोध ससीम है जब कि लोभ की कोई सीमा नही.
पीढी दर पीढी की चिन्ता लोभी व्यक्ति करता है, इसलिए वह ” प्रति लाभ लोभ अधिकाई ” का शिकार बन जाता है.लोभ कभी समाप्त होने वाला नही है.लोभ मे कामनाएं निहित होती है.एक कामना के पूरा होती है दूसरी कामना आ जाती है.न तो कामना का अंत है न तो तो लोभ का.
संतोष वृत्ति का अभाव हो जाता है.संतोष नही, तो सुखानुभूति नही.
**** राजा प्रताप भानु भी लोभी हो गये.वह सोचते है कि सीमित समय के लिए राज्य मिला तो क्या मिला? वह अनन्त काल के लिये राज्य सुख की कामना करते है.वर्तमान की प्राप्ति से असन्तुष्ट राजा प्रताप भानु लोभ वश एक साथ कई बाते सामने रखते है.
“”” जरा मरन दुख रहित तनु
समर जीतै जनि कोउ
एक छत्र रिपु हीन महि
राज कलपु सत होउ.१/१६४
१ :- वृद्धावस्था न आये|वह सदा निरोगी बना रहे.
२:- मृत्यु भी न हो |इस नाशवान शरीर के लिए न तो वृद्धावस्था ,आवे न तो इस संसार मे मृत्यु ही हो.
इस प्रकार उसने इस प्राप्त शरीर को अनन्त काल तक सुरक्षित करने के लिए पूरी व्यवस्था कर लिया.
३:- दु:ख रहित तन हो
अर्थात यह इतना बलवान हो कि वह अविजित रहे.
४:- युद्ध में अपराजित रहें
५:- एक छत्र राजा बने रहे
छत्र राज सिंहासन के ऊपर लगाया जाता है.छत्र चक्रवर्ती सम्राट के ऊपर ही लगाया जाता है.
६:-पूरी पृथ्वी पर कोई रिपु न हो
७:- पूरे सौ कल्प तक राज्य करते रहे.ब्रह्मा का एक दिन एक कल्प के बराबर माना जाता है.प्रलय काल मे भी विनाश न हो.
ब्रह्मा के १०० सौ दिन तक राजा प्रताप भानु का राज्य चलता रहे.वह भी ब्रह्मा के समान अमर होने का अभिलाषी है.
*** कपट मुनि का नाम ” एक तनु ” . जब ये सृष्टि के उत्तपत्ति के साथ अभी तक जीवित है, तो उसी प्रकार मै भी जीवन जीते हुए राज्य भोग कर सकता हूँ.इस कारण राजा भी १०० कल्पों तक इसी शरीर से राजभोग प्राप्त करने की कामना करते है.यह शरीर गत सबसे बडा लोभ है.
भविष्य में राज्य भोग में कोई कमी न रहे.यही सबसे बडा शरीर गत मोह है.
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला . तिन्ह ते पुनि उपजइ बहु सूला.७/१२०/३०
*** मोह चित्त को अधीन कर लेता है.
मोह के अधीन चित्त विवेक खो बैठता है.यही राजा प्रताप भानु के साथ भी हुआ.
***क्या राजा प्रताप भानु नही जानता कि मृत्यु इस संसार का अटल ईश्वरीय विधान है, तथापि वह चाहता है कि उसकी मृत्यु न हो.
यह राजा ज्ञानी होता तो ऐसा वरदान न माॅगता . राजा भगवद्भक्त होने पर उस कपटी मुनि से भगवान की भक्ति की चर्चा करता.
पर राजा का व्यवहार यहाँ सामान्य मानव के रूप मे दिखाई देता है.
** उसने उस कपटी मुनि के चमत्कारों को देखा.
** “चक्रवर्ति के लच्छन तोरे ” सुनते ही उस कपटी मुनि पर विश्वास हो गया.
** उस कपटी मुनि का परिचय भी ” चमत्कार ” पूर्ण था.
**** “नाम हमार एक तनु भाई ”
” कहहु नाम कर अरथ बखानी ”
उत्तर :-” आदि सृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि.
नाम एकतनु हेतु तेहि
देहिं न धरी बहोरि.”
१/१६२
इस उत्तर से प्रताप भानु को यह पूरा विश्वास हो जाता है कि यह अजर अमर है, तो इसकी सिद्धि से मैं भी अजर अमर हो सकता हूँ.
** उस कपटी मुनि ने राजा प्रताप भानु के नाम के साथ उनके पिता का नाम सत्यकेतु भी बता कर उसे आश्चर्य चकित कर दिया.
** इन सब चमत्कारों से प्रभावित होकर असम्भव को सम्भव मान कर विवेक खोकर राजा ऐसे वरदान की कामना किया जो हमेशा राक्षस को ही प्रिय रहा है:-
* अजर अमर होने की कामना *
*** सदैव राक्षस वृत्ति के लोगों ने श्री ब्रह्म देव या श्री शिव जी से ऐसे उपाय वरदान मे मऻगे है ताकि वे मृत्यु से बचे रहे.
ऐसा ही वरदान राजा प्रताप भानु ने मांगा , जो उसे जरा – मरण के दुख से मुक्त कर दे.( अर्थात मृत्यु न हो).
यह लोभ ही राजा प्रताप भानु के विनाश का कारण है.
इस प्रामाणिक एवं पुरानी कथा के माध्यम से श्री भोलेनाथ जी यह बताना चाहते हैं कि एक सच्चरित्र राजा भी मोह ग्रस्त होने पर विनाश को प्राप्त हो जाता है.
*** लोभ की पराकाष्ठा तब दिखाई देती है , जब कपटी मुनि यह प्रस्ताव रखता है कि मै पुरोहित गुरु का अपहरण कर उनका वेश बना कर तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा.
राज्य के सात प्रधान अंगों मे पुरोहित का भी स्थान आता है.उसी के संरक्षण मे अब तक सभी कार्य करते हुए प्रताप भानु चक्रवर्ती सम्राट बन सका है.जिस गुरु के आचार्यत्व में नित्य धर्म – कर्म,यज्ञ – दानादि करता रहा है, उसी के अपहरण की स्वीकृति देना लोभ की चरम परिणित थी.
*** राजा विवेक हीन हो गया.इस कपटी मुनि ने असम्भव कार्य- १०० कल्प तक का राज्य सुखभोग आदि -के लिए एक असम्भव युक्ति मंत्र प्रस्तुत किया.
१:- केवल मै रसोई बनाऊॅ.
२ :- केवल अकेले आप परोसिये .
३ कितने जन को? १ लाख ब्राह्मण परिवार को.
४:- कितने दिन? केवल ” संवत भरि संकलप करेहू “१/१६७/८
*** कपट मुनि ने समय सीमा तय कर दिया कि एक वर्ष के भीतर ही विप्र शाप से इसका विनाश होगा.
** लोभ के वशीभूत राजा ने जरा भी विवेक नही दिखाया कि कैसे ये असम्भव दिखने वाले कार्य हो सम्भव हो सकते है.
और तो और ,उसे अपनी शारीरिक क्षमता पर तो विचार करना चाहिए था कि वह अकेले एक लाख ब्राह्मण
परिवार को भोजन कैसे परोस सकेगा.
** कपट मुनि की सटीक योजना के शिकार हो गये राजा प्रताप भानु.
** उसकी योजना
के अनुसार जैसे ही राजा ने ब्राह्मणों के पैर धोकर भोजन के लिए बैठाया, और राजा भोजन परोसने के लिये तैयार हुए ( भोजन परसा नही) उसी समय कृतिम आकाशवाणी करा कर राजा को अभिशाप दिला दिया.
अभिशप्त राजा को राक्षस होकर जन्म लेना पडा.
(प्रस्तुति – पंडित अनिल वत्स)