कलम उठाई जब भी हमने 

कलम उठाई जब भी हमने
सफहों पर अफ़साने लिक्खे
यादों के गलियारों से
किस्से नये पुराने लिक्खे !

अल्हड़पन, नादानी और
भूले हुए ज़माने लिक्खे
अनछुए अहसासों में
सपनीले अफ़साने लिक्खे !

कुछ गुजर गए हैं हँसते-गाते,
कुछ नये दर्द अनजाने लिक्खे
कुछ रिसते जखम थे दशकों से
उनके घाव ठिकाने लिक्खे !

उम्मीद, आरजू, तन्हाई ,
महफ़िल और वीराने लिखे
जिया ज़िन्दगी को जैसे भी
पल-पल सब तराने लिक्खे !

कभी प्रणय गीत और पीड़ा भी
कभी मौसमी गाने लिखे
लिक्खा जो भी दिल से लिक्खा
जज़्बात बड़े दीवाने लिक्खे !

क्या खोया, क्या पाया अब तक
ज़ीस्त के हर पैमाने लिक्खे
जहाँ गिरे जब सम्हले वो भी
हर रस्ते अनजाने लिखे !

नहीं शिकायत शिकवा कोई
जैसी मिली बसर वो हुई
कुछ लम्हे गीले मौसम के
और लम्हे कुछ मस्ताने लिक्खे !

 

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