कार्ल मार्क्स आपको नहीं समझा पायेगा सनातन वैदिक हिन्दू दर्शन

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

तुम सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म का दर्शन समझना चाहते हो । *कार्ल मार्क्स तुमको बराबरी नही दिला पाएगा .

हमारे गरूण पुराण की एकदम अंतिम पंक्ति भी तुम्हें बराबरी और सम्मान दिलाएगी । पर तुम्हें धर्म के पथ पर चलना होगा ( चंपक वाले दूर रहें ) ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,  सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत। ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः ।

पूरा वामपंथ पढ़ कर इससे अच्छा वाक्य ढूँढ कर ले आओ , अगर दम है तो ।

वामपंथी इतिहासकार ऋग्वेद के एक सूक्त , #पुरुष_सूक्त के सोलह श्लोकों में से एक श्लोक को उठाकर और उसके गलत विश्लेषण के आधार पर पूरे वैदिक साहित्य को कलंकित करते हैं और उसे गाली देते हुए कहते हैं कि ..
” कि वेदों में ही जातिवादी और शोषक व्यवस्था को स्थापित किया गया है ” ..

लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई भी वामपंथी पूरा ऋग्वेद तो छोड़िए, पूरा पुरूष सूक्त भी नहीं बताता है और जनसामान्य वेद पढ़ते नही हैं …. वामपंथी इसी का लाभ उठाकर अपना प्रोपोगंडा करने में सफल हो जाते हैं …
जबकि वास्तविकता यह है कि पूरा पुरुष सूक्त पढ़ने पर आप पाएंगे कि वह ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करता है … और इसके साथ ही आप पुरुष सूक्त को अकेले पढ़ने से नही समझ सकते हैं …. उसके लिए आपको कम से कम तीन सूक्त पढने पड़ेंगे …जैसे नासदीय सूक्त और प्रजापति सूक्त …. और यह भी महत्वपूर्ण है कि ये पुरूष सूक्त दसवें मंडल का हिस्सा है जो सबसे बाद में ऋषियों द्वारा रचा गया है ….

#नासदीय_सूक्त निराकार ब्रह्म के बारे मे बताता है …
जैसे …… ” इस जगत की उत्पत्ति के पहले ना तो सत था औऱ ना ही असत …ना मृत्यु थी, ना अमरता … ना जल था , ना जीवन ..
सब कुछ एकमात्र अकेला ब्रह्म ही था … जो अंधकार से लिपटा हुआ था …
सृष्टि के निर्माण के पहले देवता भी नहीं थे और उन्हें भी नहीं पता कि यह सृस्टि कैसे बनी …
फिर ब्रह्म के मन में इच्छा हुई कि मैं एक से अनेक होऊ … “…आदि ….
नासदीय सूक्त पूर्णतया वैज्ञानिक है …. जिसकी अनेक विद्वानों ने प्रशंसा की है ….नासदीय सूक्त ही आगे चलकर उपनिषद चिंतन का आधार बना और कबीर आदि की निराकार भक्ति जन्मी ….

आधुनिक क्वांटम भौतिकी भी इस सिद्धान्त को मानती है। कि सब कुछ एक मात्र अनन्त ऊर्जा से निकला है … .. ब्रह्मण्ड की उत्पत्ति के समय भौतिक विज्ञान के कई महत्वपूर्ण नियम जैसे स्पेस-टाइम क्वांटिनम आदि को तोड़ा गया था .. जिसे आज तक समझा नहीं जा सका है ….

वर्तमान ब्रह्मण्ड की उत्पत्ति की व्याख्या “बिग बैंग थ्योरी” के आधार पर की जाती है … लेकिन इसकी व्याख्या में भी कई समस्याएं हैं.. इसीलिए महान वैज्ञानिक एलन गूथ ने ” #इनफ्लेशन_सिद्धांत दिया है ….. जिसे कभी बाद में लिखूंगा …
यहाँ मेरा केवल इतना कहना है कि नासदीय सूक्त एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला सूक्त है …..

अब यदि #प्रजापति_सूक्त की बात करें तो वह नासदीय सूक्त का विस्तार है …
जिसके अनुसार …. ” ब्रह्म से सबसे पहले प्रजापति उत्पन्न हुए ,उत्पन्न होते ही उन्होंने अंतरिक्ष को धारण किया .. वे सभी घौ अर्थात देवताओं के स्वामी है ….

जो प्रजापति आत्माओ को बल देने वाले हैं ,जन्म और मृत्यु उनके अधीन है … वे अपनी इच्छा से ही साँस लेने वाले हैं … सभी देवताओं ,मानव व पशु उनके अधीन है …

उन्होंने ही अंतरिक्ष देवताओं और पृथ्वी को धारण किया है …” …

आगे इस प्रजापति सूक्त का पूर्ण विस्तार #पुरुष_सूक्त में मिलता है .. पुरुष सूक्त सनातन धर्म में साकार ब्रह्म की उपासना का आधार बना और इसी से त्रिदेव व अवतारवाद की संकल्पना जन्मी ….. गीता में भगवान श्रीकृष्ण का विराट रूप इसी सूक्त का विस्तार है ।।।

इस सूक्त के अनुसार … “विराट पुरुष की हजार आंखे ,हजार पैर हैं .. वह ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में फैला हुआ है और इसके साथ ही वह उससे दस अंगुल ज्यादा है …

यह ब्रह्मांड उस विराट पुरुष की महिमा है … उसी पुरुष के नेत्रों से सूर्य ,मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुए …कानों से दिशाओं का जन्म हुआ ….

उसी पुरुष के अंगों से देवताओं ,वेद और छन्दों का जन्म हुआ ….

उसकी नाभि से अंतरिक्ष , सर से धूलोक .. पैरों से भूमि पैदा हुई …. उसी पुरुष के चार अंगों … सर से ब्राह्मण ,भुजाओं से राजन्य ,जंघाओं से वैश्य और चरणों से शुद्र जन्मे …”

अब इस सूक्त के अनुसार यदि शुद्र पैरों से जन्मे तो पृथ्वी भी पैरों से जन्मी है … तो इस प्रकार तो पृथ्वी भी अछूत हो गई ?? लेकिन वास्तविकता यह है कि … ऋग्वेद में कही भी जन्म आधारित व्यवस्था नही है … कई स्थानों पर इसकी पुष्टि होती हैं कि एक ही परिवार में ब्राह्मण ,राजन्य ,शुद्र होते थे ….

आगे इसी तरह की व्याख्या ऐतरेय उपनिषद में की गई है.. जहाँ पर भी ब्रह्मण्ड की उत्पत्ति बताई गई है … यहाँ एक बात और कही गई है कि ” मानव शरीर में ब्रह्म के प्रवेश करने और निकलने के दो स्थान है …एक सर से और दूसरा पैरों से .. इसीलिए हमारी संस्कृति में चरण स्पर्श करने की व्यवस्था की गई है … तब आप स्वयं सोच सकते हैं कि शुद्र अछूत कैसे हो गया … वह भी अत्यंत पवित्र है …

पुरुष-पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।

पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-

पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त ११/१७२-१७४)

त्रिदण्डी स्वामी की पुरुष सूक्त व्याख्या में पद्म पुराण की परिभाषा उद्धृत है जो अभी उपलब्ध पुराण में नहीं मिलती-

पुं संज्ञे तु शरीरेऽस्मिन् शयनात् पुरुषो हरिः। शकारस्य षकारोऽयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते॥
यद्वा पुरे शरीरेऽस्मिन्नास्ते स पुरुषो हरिः। यदि वा पुरवासीति पुरुषः प्रोच्यते हरिः॥
यदि वा पूर्वमेवासमिहेति पुरुषं विदुः। यदि वा बहुदानाद्वै विष्णुः पुरुष उच्यते॥
पूर्णत्वात् पुरुषो विष्णुः पुराणत्वाच्च शार्ङ्गिणः। पुराणभजनाच्चापि विष्णुः पुरुष ईर्यते॥
यद्वा पुरुष शब्दोऽयं रूढ्या वक्ति जनार्दनम्।

पुरुष (विश्व या व्यक्ति या वस्तु) के ४ रूप कहे गये हैं-बाहरी स्थूल रूप क्षर है जो दीखता है पर सदा क्षरण होता रहता है। इसका कूटस्थ परिचय प्रायः स्थायी है पर वह दीखता नहीं है-यह अक्षर पुरुष है। सामान्यतः क्षर-अक्षर दो ही विभाग किये जाते हैं। अक्षर का ही जो रूप कभी नष्ट नहीं होता वह अव्यय है। इसे निर्माण क्रम या वृक्ष भी कहा गया है। यह क्षर तथा अक्षर दोनों से श्रेष्ठ होने के कारण पुरुषोत्तम कहा गया है। पुरुषोत्तम रूप में प्रथित होने के कारण १ का विशेषण प्रथम होता है। जगन्नाथ का पुरुषोत्तम रूप राम है जो प्रथित है। अतः धान आदि तौलने के लिये प्रथम के बदले राम कहते हैं। कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे, उन्होंने जन्म से ही ऐसे चमत्कार आरम्भ दिखाये जो मनुष्य के लिये अकल्पनीय है।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥ (गीता, अध्याय १५)
अजोऽपि अन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। (गीता ४/६)

हजारो हजार वर्ष पुराने हजारो शास्त्रों में कहीं भी नहीं, एक स्थान पर भी नहीं, कि भारत में वे लोग बाहर से आक्रान्ता के रूप में आये और यहाँ बस गये।

इस देश की मिट्टी, वायु, पर्जन्य, ऋतुओं, चर, अचर, स्थावर, जंगम, नदियाँ, पर्वत, पुष्कर, द्रुम, लताओं, पशु, पक्षी, वर्ण, वस्त्र, खाद्य, गिरि, कानन, गुहा, आकाश, समुद्र, नागर, ग्रामीण, गिरिजन आदि इत्यादि के प्रति ऋग्वेद से ही निरन्तर, सतत जो अतिशय लगाव, समर्पण व श्रद्धा मिलते हैं, वे आक्रान्ताओं में हो ही नहीं सकते।

अन्तर इतना ही है कि तब आप के भारत के सीमान्त उत्तरमद्र व उत्तरकुरु आज के चिन, यूरोप तक थे।
आप की पश्चिमी सीमा बेबीलोन तक थी, विग्रह होने पर आज के ईरान व अफगान की सीमा हो गई।

आप का मानक देशान्तर उस उज्जयिनी से जाता था जो आज के बन्दर अब्बास व तब के कामरूप के मध्य, कर्क रेखा पर स्थित थी। एक सागर से दूसरे सागर तक, हिमालय पर्वत से दक्षिणी सागर तक आप भारत मानते थे।

और यह भी कि आप के यहाँ से लोग बाहर गये, विश्वामित्र गये, ययाति की सन्तानें गयीं, तुर्की में आपके व्यापारिक स्कन्धावार थे। मिस्री राजघराने से भी सम्बन्ध थे। अश्वक अवगण अफगान में आपके वेदों के मन्त्र गूँजते थे।

बात इतनी है कि आप सिमटते गये, सीमान्त जन महाभारत काल में ही व्रात्य हो गये थे। कभी इक्ष्वाकुओं की अयोध्या रही, कभी भरतों का केन्द्र कुरुप्रदेश केन्द्र रहा, कभी मगध रहा तो कभी उज्जैन, कभी भोज परमार रहे तो कभी दक्षिणी चोल।
इस निरन्तर प्रवाहमान सनातन भारत को भूगोल, इतिहास या जन में काट कर देखने की प्रवृत्ति वैसी ही है जैसे गङ्गा को ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी व गङ्गासागर में बाँट कर कहा जाय कि यह अमुक है, वह अमुक।

इस देश की कोई भी जाति अपनी रक्तशुद्धता का ढिंढोरा नहीं पीट सकती। आपके यहाँ वह धारणा ही नहीं थी। राम साँवरा, कृष्ण, कृष्णा, फाल्गुनी साँवले, द्रोण काले, दुश्शासन काला, द्वैपायन भी काले। आप मिश्रण हैं, आपस में ही। बात वही है कि पश्चिम व उत्तर वालों में गौर अधिक थे, पुरबिये पाण्डुर गेंहुये और दक्षिणी कृष्ण। प्रवजन हुआ। हजारो हजार वर्षों से आप जीवित हैं, जाने कितना कुछ घटित हुआ होगा।

यूरोपीय इतिहास पढ़ें कि उनके यहाँ कितने मिश्रण व नृजातीय संहार हुये। वे अपने यहाँ की वैसी बातों पर बात तक नहीं करते और भारत विग्रह में लगे रहते हैं! क्यों भला? षड्यन्त्र समझो प्यारे।

 

(प्रस्तुति: पंडित अनिल वत्स)