क्रान्ति के माध्यम से ही दुष्ट ब्रिटेन से भारत को मिली स्वतंत्रता

यदि आप ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के भारत विरोधी बयान पढ़े तो ऐसा बिल्कुल नही लगता कि वो हमसे डरा हुआ हो।
1947 में मिली हमारी आज़ादी का हर आधिकारिक कागज पर नाम सिर्फ सत्ता हस्तांतरण है। इसमें कोई संदेह नही कि क्रांतिकारियों ने अपना खून पसीना बहाया मगर यह भी कटुसत्य है कि देश की जनता ने उन क्रान्तिकारियो की पीठ पर सदा ही ख़ंजर घोंपा और हर क्रांति को असफल किया।
सत्ता हस्तातंरण की ओर हमारा पहला कदम तब बढा जब 14 जून 1940 को पेरिस के एफिल टॉवर पर जर्मनी का नाजी झंडा लहरा रहा था। फ्रांस के गिरते ही ब्रिटेन की नींद उड़ गई, नाजियों ने लंदन शहर में भयानक बम गिराए और पूरा शहर तबाह कर दिया।
ब्रिटेन अकेला लड़ रहा था भाग्य ने अंत मे रेंगते हुए ब्रिटेन का साथ दिया और हिटलर की बुद्धि भ्रष्ट की, हिटलर ने ब्रिटेन को छोड़कर सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।
सोवियत संघ के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन हिटलर से ज्यादा क्रूर थे। नाजियों पर रूस और मौसम दोनो ही की मार पड़ी, वही अमेरिका भी युद्ध मे आ गया। अमेरिका और सोवियत के आने से ब्रिटेन को सैन्य स्तर से ज्यादा आर्थिक स्तर पर मदद मिली।
ब्रिटेन की पूरी इंडस्ट्री प्रथम विश्वयुद्ध में ही अमेरिका चली गयी थी दूसरे विश्वयुद्ध में उसके अवशेष भी विसर्जित हो गए और ब्रिटेन पूरा कंगाल हो गया। अमेरिका एक नई सुपरपॉवर बनकर उभरा था इसलिए वो चाहता था कि विश्व मे हर जगह उसका दबदबा बना रहे।
अंततः अमेरिका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को आर्थिक संकट से बाहर निकलने का प्लान समझाया। इस प्लान के अनुसार ब्रिटेन को अपनी अर्थव्यवस्था के लिये काम करना था और कॉलोनीज को आज़ाद करना था।
1945 में ही क्रिप्स मिशन लाया गया और कांग्रेस को सत्ता हस्तांतरण करने की बात तय हो गयी।
निःसंदेह 1947 कोई क्रांति नही थी यह बस दो महाशक्तियों के बीच एक डील थी, ब्रिटेन के जाते ही अमेरिका को फायदा हुआ। दक्षिण एशिया में अब अमेरिका के पास पाकिस्तान था जिसकी मदद से उसने लंबे समय तक सोवियत संघ को चुनौती दी।
अमेरिका ने तालिबान, अल कायदा और ISIS खड़े किये। आज ये सब अमेरिका के दुश्मन है मगर एक ज़माने में अमेरिका ने खुद को मजबूत करने के लिए इनका पूरा प्रयोग किया था।
1947 विंस्टन चर्चिल की एक मजबूरी मात्र थी यदि भारत को आज़ाद नही करता तो अमेरिका से सहयोग मिलना असंभव हो जाता। उसी दौरान विंस्टन चर्चिल ने भारतीयों को भर-भर कर गालियां दी थी और कहा था कि भारतीय कीड़े-मकोड़े है इन्हें सत्ता दे दी तो ये खुद अपने ही देश को खा जाएंगे।
विंस्टन चर्चिल की बाते हमने गलत सिद्ध की आज भारत ब्रिटेन को कई मोर्चों पर मात दे चुका है। पाकिस्तान के विषय मे ये बातें सही सिद्ध होती है क्योंकि वे आज भी बहुत पीछे है। पर आज़ादी 1947 में नही मिली ऐसी बातें प्रमोट होने से हमे रोकना चाहिए।
हमने आज़ादी छीनकर हासिल की इसमे कोई संदेह नही, विंस्टन चर्चिल चाहते तो भारत मे जनमत करवा लेते कि हमे स्वराज चाहिए या ब्रिटिश राज। मगर विंस्टन चर्चिल जानते थे कि भारत सिर्फ स्वराज चाहता है इसलिए उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की बात स्वीकार की।
भारतीयों की क्रांति युद्ध भूमि में भले ही असफल थी लेकिन लंदन के तख्त पर बैठे इंग्लैंड के राजा के कानों तक पहुँचने में सफल थी।