साल 2019 का लोकसभा चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव, अमरीकी चुनाव विशेषज्ञों के दावे में कितना दम?

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यह समाचार भारत के बाहर के लोगों को आश्चर्यचकित कर सकता है लेकिन भारतीयों के लिये कदाचित यह आश्चर्य का विषय़ नहीं है. यह अनुमान तथ्यों पर आधारित है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के विशेषज्ञों द्वारा पेश किया गया है और इसके परिदृश्य में हैं भारत का लोकसभा चुनाव 2019.

इन विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत आँकड़े बता रहे हैं कि इस बार के चुनावी खर्चे ने पिछले चुनावों को आसानी से पार कर लिया है. जितनी गंभीर बात ये है कि यह दुनिया का सबसे महंगा चुनाव है, भारत के लिये उससे अधिक गंभीर बात ये है कि ये एक बढ़ता हुआ सिलसिला है और 2019 के इस बार के ये आम चुनाव में होने वाला खर्चा 2014 के चुनावी खर्चे का दुगुना है.

चुनाव लोकतांत्रिक देशों में ही होते हैं. लोकतांत्रिक देशों के चुनावों में इतना बड़ा खर्चा किसी का नहीं है जितना भारत के आम चुनावों का है. भारतीय चुनाव के इतिहास के पन्नों में सबसे महंगे आम चुनाव हैं इस वर्ष के चुनाव.

अगले महीने अप्रैल 2019 में देश चुनाव प्रक्रिया से गुजरने वाला है. 11 अप्रैल से 19 मई 2019 तक सात सात चरणों में होने वाले मतदान लोकसभा के 543 सदस्यों का चुनाव करेंगे, जो मिलकर भारत की नई सरकार का चेहरा तय करेंगे. मतों की गिनती 23 मई को की जाएगी और उसी दिन परिणाम घोषित किए जाएंगे. 17वीं लोकसभा का गठन करने वाले ये चुनाव शायद वास्तव में भारत के भाग्य-विधाता होंगे.

विशेषज्ञों ने जो आंकड़े पेश किये उनके अनुसार 2014 के भारतीय चुनावों का खर्चा 5 बिलियन अमरीकी डालर था जो इस वर्ष बढ़ कर दुगुना हो सकता है. इन अमरीकी चुनाव विशेषज्ञों के लिए यह जानना आश्चर्यजनक रहा कि भारत के चुनावों अनुदानों की व्यावहारिक पारदर्शित शून्य के बराबर है.

इन विशेषज्ञों की हैरानी का विषय भारतीय लोकतंत्र का अभिशाप है. चुनावों में अनाप-शनाप पैसा बहाने वाली राजनीतिक पार्टियाँ अपने धन का स्रोत अनुदानों को बताती हैं. चलिये मान लेते हैं कि सारा पैसा अनुदान से ही आता है तो भी अनुदानकर्ता अपना नाम सामने लाने से डरते क्यों हैं?

बीसवीं सदी की लोकतांत्रिक वास्तविकता का दुखद पक्ष है कि ऐसे व्यक्ति की पहचान हो ही नहीं सकती जिसने किसी राजनेता या पार्टी को धन-दान किया हो. देने वाले भी कौन सा सफेद पैसा देते हैं. डर ये भी हो सकता है और डर ये भी हो सकता है कि उनकी सरकार नहीं आई, तो विरोधी सरकार आने के बाद उन पर मुसीबत टूट पड़ेगी. न पैसा ईमानदारी का है, न पैसे के दान की नीयत ईमानदारी की है. न देने वाला ईमानदार न लेने वाला. तो फिर हम और आप सवाल खड़े करने वाले कौन होते हैं?

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