मनकही – दिल से दिल की बात

हे भगवन,
जब होंगे मेरे जीवन के अंतिम क्षण 
क्या आप आओगे मुझको लेने 
क्या दोगे मुझे अपने दर्शन
मृत्यु यदि है आपसे मिलन  
तो उत्सव है 
फिर भय कैसा कैसा चिन्तन 
पहले न्यायधीश बन
करोगे मेरे कर्मों का लेखा-जोखा
संभव है करो दंडित मुझे 
अथवा माँ की भांति
डांट कर अपने बच्चे को
फिर अपने अंक में भर
दुलार करोगे मुझे  
और फिर प्यार से
सही गलत का ज्ञान कराओगे
परिचय  मुझको
और इस तरह
समझाओगे मुझको
मेरी नादानियों पर,
वो जो भी हैं,
मुझे अपने गले लगाओगे
सही हूं या गलत  
मेरा साथ निभाओगे
माना कि अज्ञानी हूं मैं 
किए होंगे अनगिनत पाप
मैने जाने-अन्जाने
पर मुझे सही राह दिखाना
भी तो है तुम्हारा ही काम  
आई हूं तुम्हारे श्री चरणों में 
समर्पण सहित चिर-विश्राम
फिर मिल जाउंगी तुममें ही 
अच्छाई और बुराई का संगम
तेरी ही माया है मेरा जीवन 
स्वीकारो करो मुझको
तारो मेरा जीवन 
मनकही है मेरे प्रभु
मेरे मन के वासी
कही दिल से दिल की बात 
और की अनंत से अनंत की 
एक मुलाकात !!