मौत के बाद क्यों होते हैं चौथा, दसवीं, तेहरवीं और बरसी

महर्षि दयानंद की पुस्तकत ” संस्कार प्रकाश” में उन्होंने ” सोलह संस्कारों “के विषय में संपूर्ण व्याख्या दी है । एक मनुष्य के जीवन में 16 संस्कार अनिवार्य है । बचपन से लेकर मृत्यु पर्यंत यह संस्कार समय-समय पर किए जाते हैं, जिनका अपना अलग महत्व होता है आज के युग में इन संस्कारों में कटौती देखना आम बात हो गई है। इन संस्कारों के ना होने के कारण मनुष्य के जीवन पर प्रभाव पड़ता है और उसे कष्ट सहना पड़ता है।
प्रत्येक संस्कार में परिवार वाले साथ होते हैं किंतु अंतिम और 16 वां संस्कार मृत्यु पर्यंत किया जाता है जोकि मृतक उसमें शामिल नहीं होता इसलिए इस महत्वपूर्ण संस्कार को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना जरूरी हो जाता है किंतु मैंने महसूस किया जीवन पथ पर हम बहुत कुछ छोड़कर चले आ रहे हैं जिसकी वजह से विभिन्न प्रकार के कष्टों से दो- चार होना पड़ता है ।
जब किसी की मृत्यु होती है तो आत्मा तीन सेकंड में अपने परमधाम पहुंच जाती हैं । और जीवात्मा को यमदूत लेकर जाते हैं ,उनके कर्मों का हिसाब किताब करने के लिए ताकि जीवात्मा को पता चल सके कि उसे आगे कहां भेजा जाना है। इस न्याय व्यवस्था के बाद यमदूत जीवात्मा को वापस उस शरीर के पास छोड़ देते हैं ताकि मृतक का मन यह जान सके की उस का प्रस्थान किस रूप में उसके परिवार वाले कर रहे हैं ( हम जानते हैं प्रत्येक मनुष्य का अपना एक ओरा होता है , यह उसी के विषय में है )। उसके बाद बचता है जीवात्मा जिसकी यात्रा इस लोक से अपने धाम के लिए शुरू होती है। जो विभिन्न चरणों में पूरी की जाती है ।
इस क्रम में प्रथम चरण चौथा होता है अर्थात तीन दिन के भीतर मृतक अपने धाम पहुंच जाता है । किंतु यह वही जीव पहुंचता है जिसके कर्म उच्चतरतम होते हैं ।
दूसरे चरण में जीव नवें दिन अपने धाम के लिए प्रस्थान करता है इस क्रम में दशमी तिथि को जो भी साधन परिवार या समाज में किया जाता है उसे दसवां कहते हैं । माना जाता है इस दिन जीव को शरीर मिलता है इस लिये पिण्ड दान करके प्रेतात्मा की उदर पूर्ति की जाती है।
इस यात्रा का अगला चरण तेहरवीं तिथि को लिया जाता है जिसमें जीव जो प्रेतात्मा रूप में है उसके भोजन की व्यवस्था की जाती हैं और अगले धाम को प्रस्थान कराया जाता है।
अगला कार्य सत्रवें दिन होता है इस समय गरुण पुराण के आधार पर माना जाता है की जीव वैतरणी पार करके आगे की यात्रा को बढ़ता है। परिवार वाले इस समय उसकी यात्रा में कोई व्यवधान ना हो इसलिए चारपाई बिस्तर भोजन आदि दान करते हैं।
अगले सत्ताईस दिनों में वह जीवात्मा और आगे बढ़ता है , जहां वह स्वर्ग और के बीच की नदी में उतरता चढ़ता रहता है। इस समय भी जीवात्मा अपने धाम को पहुंच सकता है अपने कर्मानुसार।जिस जीवात्मा की मुक्ति इतने दिनों में नहीं होती और वो फिर भी विचरती रहती है, देवलोक और भूलोक बीच और कष्ट सहते हुए देव लोक का एक दिन व्यतीत करती है।
देव लोक का एक दिन भू लोक के 1वर्ष के बराबर होता है।
यह अंतिम चरण है जब जीवात्मा को मुक्ति मिलनी ही है किंतु यदि परिवार वह समाज द्वारा सभी उपरोक्त कार्य विधि पूर्वक न किए जाएं तो जीवात्मा प्रेत आत्मा बन कष्ट पाती है।इस लिए बरसी की जाती है और परिवार में शुभ काम एक वर्ष तक नहीं किये जाते।
गरुड़ पुराण के अनुसार एक वर्ष तक श्राद्ध करना भी वर्जित है क्योंकि मृतक को कब तक मुक्ति मिलेगी निश्चित नहीं है। दूसरे वर्ष श्राद्ध कर्म किया जाता है।
(सुनीता मेहता)