मैं और मेरी अमृता

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मैं और मेरी अमृता एक ही राह की दो मुसाफ़िर हैं। वो तो चली गई जैसे अपनी रूह का कोई अंश मुझमें छोड़ गई। यूं तो उसके पांव की धूल का एक कण मात्र भी नहीं मैं, मगर वो कहती थी ना, मेरे अंदर एक सोलह साल की लड़की रही हमेशा…तो क्या ग़लत कहती थी वो। सही तो थी वो।
मैं भी यह महसूस कर पाती हूं, जब भी मैं इश्क़ लिखती हूं। यू्ं महसूस कर पाती हूं कि जैसे आज भी मैं सोलह वर्ष की युवती की तरह इश्क़ में डूबी हूं, तो क्या ग़लत है। जब इश्क़ महसूस नहीं करूंगी तो इश्क़ लिखूंगी कैसे?
मेरी तो ज़िंदगी ही जैसे इश्क़ लिखते आशिक़ाना हो जाती है।
महसूस कर पाती हूं जैसे हज़ारों लाखों तरंगों को ख़ुद के भीतर। फिर सोचती हूं कि मैं अमृता की रूह तो नहीं…जो कहीं अभी अभी कुछ और इश्क़ करना चाहती थी।
हां अब मैं कहूंगी, वो इश्क़ जो मेरी प्रिय अमृता कहीं अधूरा छोड़ गई…या अमृता जैसी और बहुत सी अमृता अभी ज़िंदा हैं। जिनकी भावनाएं उमड़ती हैं, मगर समाज की कुंठित सोच से डरकर दबकर रह जाती हैं। मेरे इस लेख को पढ़कर…वो जो कहना चाहती हैं खुलकर कह नहीं पातीं। मगर शायद वो दबी भावनाएं …वो इश्क़ की तरंगों का कोई सैलाब उमड़ आए बहुत सी क़लमें जो सूखी हैं, इश्क़ की सियाही में डूब जाएं… हिम्मत कर पाएं इश्क़ कहने की।
हां….. अमृता तुम ज़िंदा हो अभी, बहुत से दिलों और रूहों में। जिन क़लमों में अभी इश्क़ ज़िंदा है बोल उठेंगी।
बहुत से दिलों को बहुत से चेहरे भा जाते हैं….जो ना उम्र देखते ना वक़्त ना ज़माने की परवाह होती। कुछ ग़लत नहीं… ना इश्क़ लिखना … ना इश्क़ करना। तुम लिखो जो तुम्हारा दिल कहता और जो तुम्हारी क़लम को रास आए ।
दुनिया ने तो ना कृष्ण को बख़्शा ना मीरां को। जो अवतारों की ना हुई यह दुनिया तुम्हारी क्या होगी। तुम्हारे मर जाने के बाद सभी तुमको भला ही कहेंगे। दुःख मत करना, ज़िंदा होने पर कोई भला नहीं होता।
हर शायरा, कवयित्री, लेखिका में अमृता है…लिखो तुम, अपनी क़लम के साथ इन्साफ़ करो। ख़ुदा आज नहीं तो कल तुम्हारी क़लम के साथ इन्साफ़ ज़रूर करेगा।
हां, मैं भी अमृता हूं और मेरे अंदर भी एक युवा लड़की है अभी।
कौशल बंधना पंजाबी
(नंगल डैम पंजाब)

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