मेरी एक प्रार्थना सबके लिये: किसी को मार के खाना छोड़ दो !!

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हे ईश्वर हम तेरे बनाए इन्सान हैं, दया करो, सद्कर्म, दो स्वच्छ मन दो, किसी का बुरा न करें ऐसा धर्म दो।
हम तेरे हैं केवल दया धर्म दो।अपनी भक्ति दो।जीव हत्या कभी न हो हमसे।तेरे बनाए जीव जन्तु कीड़े मकौड़ों अथवा पशु पक्षियों को भी कभी हमारे कारण हानि ना हो।हे ईश्वर हम पर ऐसी कृपा करो जो हम तेरे बनाए विधि विधान का पालन कर सकें।
जीव जन्तु,पशु पक्षी, ईश्वर की बनाई सुंदर रचना है। सृष्टि का श्रृंगार हैं। ईश्वर ने एक रचना इन्सान की बनाई इनकी रक्षा हेतु। परंतु जब रक्षक ही भक्षक बन जाता तो यह बेजुबान कहां जाएं।
खाने के लिए ईश्वर ने सृष्टि में बहुत कुछ उत्पन किया। परन्तु इन्सान ईश्वर की बनाई खाने पीने की वस्तुओं को छोड़कर उसके बनाए जीव जन्तु पशु पक्षी मारकर खाने लगा। कहां का इंसाफ है यह।
क्या इन्सान का अपनी जीभ पर काबू नहीं रहा। क्या वह अपना जीव रक्षा का धर्म भूल गया। क्या जीभ का स्वाद इतना बढ़ गया कि जीवन मूल्यों का कोई महत्व ही ना रहा।
कभी सोचा है क्या?आपके एक छोटा सा घाव हो जाए तो आप चिल्लाते फिरते हैं और अपनी जीभ के स्वाद हेतु आप जीवों की हत्या करते हैं तो उनको कितना दर्द होता होगा।
मेरे ख्याल से हमें कोई धर्म यह आज्ञा नहीं देता या किसी धर्म ग्रंथ में जीव हत्या को सही नहीं माना गया होगा।
क्या कोई मां अपने बच्चे को मरने के लिए छोड़ती है तो ईश्वर की औलाद है सभी उसकी सुंदर रचना तो कैसे ईश्वर स्वयं बोल सकता कि मारो काटो खाओ।
हमारे धर्म ग्रंथ ईश्वर वाणी माने जाते हैं।तो ईश्वर शायद कभी नहीं कहेगा मीट मांस खाओ।
यदि ऐसा होता तो सृष्टि में कुछ खाने को पैदा ना करता ईश्वर।
मेरा कहना बस इतना ही है, ईश्वर ने हमें स्वाद के लिए जीभ दी और स्वाद पूर्ती हेतु बहुत कुछ दिया सृष्टि में। कृपया जीव हत्या से परहेज़ करें। बचाएं ईश्वर की सुंदर देन जीव जन्तु पशु पक्षियों को।
(कौशल वंदना भारतीय)

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