मुहब्बत क्या हुई जैसे इबादत होती जाती है!

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मुहब्बत क्या हुई  जैसे  इबादत होती जाती है
कि सजदे में झुकने की आदत होती जाती है !
चलाओ तीर कितने भी सितम चाहे करो जितने
जो उल्फत हो गई इक बार तो बस होती जाती है !
वृहद सरिता  प्रेम मेरा लहर सा इश्क़ है तेरा
जो उतरोगे तले इसके कयामत होती जाती है !
मैं मुजरिम हूँ करो पेशी मेरी इश्क़ ए अयानत  में
किया है जुर्म उल्फत का ये तोहमत होती जाती है !
है गर एहसां मुहब्बत जो नही लेना,नही  देना
मिले दिलबर कोई सच्चा ये नेमत्त होती जाती है!
किसी के वास्ते जीना सबब हो  इश्क़ का “अँजू”
चले जो इस डगर मरने की चाहत होती जाती है !

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