मुक्त गगन में आज़ाद परिंदे की तरह (कविता)

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तुम्हें तमाशा लगती हैं ना मेरी बातें 

मेरे शब्द , मेरे जज़्बात 

ठीक है , जो तुम्हें समझना है 

तुम समझ सकते हो 

कोई हक तो है नहीं मुझे 

तुम्हारी सोच को मेरे प्रति बदलने का 

वैसे भी जिसकी खुद की ज़िंदगी 

किसी तमाशे से कम नहीं 

वो क्या किसी दूसरे को 

तमाशा दिखाएगा 

शुक्रिया तुम्हारा 

तुम्हारे शब्दों के लिए 

मेरे जज़्बात ओं को 

अपने शब्दों से बांधने के लिए 

मेरी अंतिम सांस तक 

मेरी ज़िन्दगी का तमाशा चलेगा 

पर अब कभी तुम्हे 

मेरे जज्बातों का तमाशा नहीं सहना होगा 

तुम आज़ाद हो अपने जहां में 

मेरे तमाशे से बहुत दूर 

मुक्त गगन में आज़ाद परिंदे की तरह !!