Uttrakhand Flood: 55 साल पहले नंदा देवी में खोया था रेडियोएक्टिव डिवाइस, उस वजह से फटा ग्लेशियर और मची तबाही?

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Uttrakhand Glacier: उत्तराखंड में क्या रेडियोएक्टिव डिवाइस की वजह से ग्लेशियर फटा ? ये सवाल इसलिए क्योंकि उत्तराखंड में ग्लेशियर के टूटने से मची तबाही की वजह को लेकर अब तक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा नहीं जा सका है. डीआरडीओ जैसी संस्थाएं अनुसंधान में जुटी हुई हैं. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले चमोली के लोगों की मानें तो इस आपदा का राज़ 55 साल से हिमालय में कहीं छुपा हुआ है.  चमोली के लोगों के मुताबिक ग्लैशियर फटने की वजह मौसम नहीं  बल्कि वो रेडियोएक्टिव डिवाइस है जिसके दोबारा एक्टिव होने या फिर फटने की वजह से ग्लेशियर टूटा और तबाही का सैलाब हिमालय से फूट पड़ा.
बाढ़ से पहले इलाके में क्यों फैली ज़ोरदार बदबू?
चमोली जिले के रैनी गांव में सबसे ज्यादा कुदरत का कहर टूटा. रैनी गांव के लोगों के मुताबिक सैलाब आने के पहले हवा में बहुत तीव्र तीखी बदबू फैली. उस बदबू में सांस लेना भी दूभर हो चला था. जिसके बाद भयंकर बाढ़ आई. इतना ही नहीं, नदी में मछलियों का बर्ताव एकदम बदल गया था. मछलियां ऊपर की तरफ आ गई थीं और उन्हें हाथों से पकड़ा जा सकता था. लेकिन गांव वाले इस तरह के संकेतों को समझ नहीं सके. गांववालों का कहना है कि ये बदबू उस रेडियोएक्टिव उपकरण की हो सकती है जो कि 55 साल पहले एक सीक्रेट अभियान के तहत 1965 में नंदा देवी की सतह में कहीं गुम हो गया था.
क्या है ग्लेशियर की तबाही का 55 साल पुराना कनेक्शन?
1965 में भारत और अमेरिका ने मिशन नंदा देवी के रूप में एक खुफिया अभियान चलाया था. चीन की परमाणु गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए ये सीक्रेट मिशन शुरू हुआ था. दरअसल, 1964 में चीन ने शिनजियान प्रांत में न्यूक्लियर टेस्ट किया था. जिसके बाद अमेरिका की मदद से चीन पर निगरानी रखने के लिए भारत ने सीक्रेट मिशन चलाया था. उस सीक्रेट मिशन में अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए और भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी शामिल थी. मिशन के तहत नंदा देवी का चोटी पर सर्विलांस के लिए प्लूटोनियम से संचालित उपकरण लगाना तय हुआ था.
मिशन के कैप्टन कोहली ने जताई थी खतरे की आशंका
हालांकि, 1965 में मिशन नंदा देवी के टीम लीडर कैप्टन मनमोहन सिंह कोहली अभियान से सहमत नहीं थे. उन्होंने 25 हज़ार फीट की ऊंचाई पर मौजूद नंदा देवी चोटी पर खतरनाक रेडियोऐक्टिव सामान ले जाने के खतरे के बारे में सबको आगाह किया था. लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी के दबाव में उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
1965 में क्यों अधूरा छोड़ना पड़ा मिशन ?
अमेरिकी प्लूटोनियम डिवाइस लेकर मिशन की टीम नंदा देवी पर्वत के करीब 24 हजार फीट ऊंचाई पर पहुंच चुकी थी. लेकिन अचानक मौसम खराब होने लगा. ऐसे में मिशन के सदस्यों और रेडियोएक्टिव डिवाइस में किसी एक को चुनने की नौबत आ गई. जिसके बाद कैप्टन कोहली अपनी टीम के साथ वापस आ गए. परमाणु सहायक शक्ति जनरेटर मशीन और प्लूटोनियम कैप्सूल को कैंप-4 पर ही छोड़ना पड़ गया.
1966 में डिवाइस को ढूंढने की दूसरी कोशिश रही नाकाम
1966 में एक बार फिर मिशन को पूरा करने की कोशिश की गई. मिशन की पुरानी टीम के कुछ सदस्य और एक अमेरिकी न्यूक्लियर एक्सपर्ट डिवाइस की तलाश में नंदा देवी पर्वत की तरफ निकले. लेकिन खुफिया डिवाइस नहीं मिली. नंदा देवी पर न तो प्लूटोनियम की छड़ों का कुछ पता चला और न ही खुफिया रेडियोऐक्टिव डिवाइस मिली. माना जाता है कि प्लूटोनियम का ये कैप्सूल 100 साल तक एक्टिव रह सकता है और ये रेडियोऐक्टिव डिवाइस अब भी उसी इलाके में बर्फ में कहीं दबी हुई है.
ऐसे में ये आशंका जताई जा रही है कि कहीं वो रेडियोएक्टिव उपकरण सक्रिय तो नहीं हो गया जिसकी वजह से ग्लेशियर टूटा और बाढ़ आ गई. रैनी गांव के लोगों की मांग है कि सरकार उस रेडियोएक्टिव उपकरण का पता लगाए नहीं तो एक दिन सभी लोग जलप्रलय का शिकार हो जाएंगे.
हालांकि, माउंटेनियर कैप्टन मनमोहन सिंह कोहली का मानना है कि रेडियोएक्टिव डिवाइस के गर्मी पैदा करने या खुद से फटने की संभावना नहीं है. उनका कहना है कि अगर डिवाइस टूट भी जाए तो भी वह उपकरण खुद से सक्रिय नहीं हो सकता.

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