”मी गोडसे बोलतोये”: नाथूराम गोडसे की कहानी

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The triale of persons accused of participation and complicity in Mahatma Gandhi's assassination opened in the Special Court in Red Fort Delhi on May 27, 1948. A Close up of the accused persons. Left to right front row: Nathuram Vinayak Godse, Narayan Dattatraya Apte and Vishnu Ramkrishna Karkar. Seated behind are (from left to right) Diganber Ram Chandra Badge, Shankar s/o Kistayya, Vinayak Damodar Savarkar, Gopal Vinayak Godse and Dattatrays Sadashiv Parachure.

अविस्मरणीय नाम – नाथूराम विनायक गोडसे और अविश्वसनीय काम – महात्मा गाँधी की हत्या..

नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए जिम्मेदार माना जाता है. और यह सच भी है कि उन्होंने गाँधी के जीवन का अंत किया था. किन्तु गोडसे की विचारधारा और उस कारण को कभी समझा या समझाया नहीं गया जिसके कारण उनको इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा था.

दरअसल 1948 से 2014 तक कांग्रेस शासन ने षड्यंत्र के अंतर्गत नाथूराम को इस प्रकार प्रचारित किया जैसे कि वे देशद्रोही हों. पर वास्तविकता यह थी कि वे बहुत बड़े देशभक्त थे. हाँ, वे इतने ही बड़े हिंदूवादी भी थे.

नाथूराम गोडसे का पूरा नाम नाथूराम विनायक गोडसे था. 19 मई 1910 को पुणे ज़िले में स्थित बारामती में नाथूराम गोडसे का जन्म हुआ. चित्तपावन मराठी परिवार में जन्मे नाथूराम के पिता विनायक गोडसे स्थानीय पोस्टऑफिस में एक साधारण कर्मचारी थे. नाथूराम की माता लक्ष्मी गोडसे ने एक सद्गृहस्थ गृहणी के तौर पर नाथूराम का पालन पोषण किया.

बचपन में उन्हें रामचंद्र के नाम से घर में पुकारा जाता था. नाथूराम के जन्म लेने के पूर्व उनके माता-पिता की तीन संताने अल्पकाल में ही काल-कलवित हो गईं थीं. उनकी भगिनी के रूप में उनके माता-पिता की एक ही पुत्री जीवित रही. अतएव माता-पिता ने बालक के जन्म को कोई श्राप समझ कर ईश्वर से प्रार्थना की थी कि यदि अब कोई पुत्र हुआ तो उसका पालन-पोषण पुत्री की तरह करेंगे. बस इसी कारण जब बालक रामचंद्र का जन्म हुआ तो बचपन से ही उसकी नाक छिदवा दी गई थी. और लड़की की भांति लालन-पालन करने के अपने वचन की पालना के लिए बालक रामचंद्र की नाक में एक नथ भी पहना दी गई थी. लोगों ने उसे नथराम कह कर पुकारना शुरू कर दिया जो आगे चल कर नाथूराम के रूप में सामने आया.

ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण नाथूराम बचपन से ही धार्मिक कार्यों में रुचि लेते थे. उनके छोटे भाई गोपाल गोडसे के अनुसार वे बचपन में ध्यान करते समय प्रायः कई ऐसे विचित्र श्लोक बोलते थे जो उन्होंने कभी भी पढ़े ही नहीं थे.

परिवारजनों के अनुसार वे ध्यान की अवस्था अपने परिवार वालों और परिवार की कुलदेवी के मध्य एक सूत्र का कार्य किया करते थे. किन्तु 16 वर्ष की आयु के पहुँचने तक नाथूराम के जीवन से समाज के बाह्य तत्व इतने जुड़ गए थे कि यह आध्यात्मिक गतिविधि क्रमशः समाप्त हो गई.

नाथूराम की शुरुआती पढ़ाई लिखाई पूना में हुई. हाईस्कूल तक पहुँच कर नाथूराम ने महसूस किया कि अध्ययन में उन्हें आनंद नहीं आ रहा है, तब उन्होंने अपने साथ जबरदस्ती न कर पढ़ाई छोड़ना ही श्रेयस्कर समझा. किन्तु घर में उनका स्वाध्याय निरंतर चलता रहा. धार्मिक पुस्तकों से गहरा लगाव होने के कारण उन्होंने रामायण, महाभारत, गीता, पुराणों के अतिरिक्त स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, बाल गंगाधर तिलक  तथा महात्मा गान्धी के साहित्य का भी गहरा अध्ययन किया.

स्कूली जीवन के अनन्तर प्रारम्भ हुआ नाथूराम का राजनैतिक जीवन. नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बन गए. किन्तु कुछ वर्षों के उपरान्त उन्होंने संघ छोड़ दिया. वह वर्ष था १९३० और इसी समय वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में शामिल हो गए.

वैचारिक परिपक्वता और रचनाधर्मी व्यक्तित्व के स्वामी नाथूराम ने अग्रणी तथा हिन्दू राष्ट्र नामक दो समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया. उनका मुहम्मद अली जिन्ना की अलगाववादी विचार-धारा से सख्त विरोध था. प्रारम्भ में तो उन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी के द्वारा संचालित कार्यक्रमों को अपना समर्थन दिया किन्तु कुछ समय बाद उन्हें महसूस हुआ कि गान्धी लगातार और बार-बार हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव पूर्ण नीति अपनाते हैं और मुस्लिम तुष्टीकरण करने से बाज नहीं आते. तब उनका गांधी से मोहभंग हो गया और वे उनके मुखर विरोधी बन गए. 

महात्मा गाँधी द्वारा गाँधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की फांसी को माफ़ी करने की बात जोड़ने से इंकार करने पर देश के तमाम नौजवानों की भाँति देशभक्त नाथूराम गोडसे को भी अपार दुःख पहुंचा था. और यह बात वे अपने जीवन में कभी भुला नहीं सके.

इरविन के साथ गांघी जी की मुलाक़ात के विषय में बिड़ला द्वारा पूछे जाने पर 18 फरवरी, 1931 को गांधी ने कहा था- ‘मैंने उनसे भगत सिंह की बात की. …मैंने भगत सिंह के बारे में कहा, वह बहादुर तो है ही पर उसका दिमाग ठिकाने नहीं है, इतना जरूर कहूंगा. फिर भी मृत्युदंड बुरी चीज है. क्योंकि वह ऐसे व्यक्ति को सुधरने का अवसर नहीं देती. मैं तो मानवीय दृष्टिकोण से यह बात आपके सामने रख रहा हूं और देश में नाहक तूफान न उठ खड़ा हो, इसलिए सजा मुल्तवी कर देने का इच्छुक हूं. मैं तो उसे छोड़ दूं, लेकिन कोई सरकार उसे छोड़ देगी ऐसी आशा मुझे नहीं है.’

इस बात के खुलासे ने भगत सिंह और भारतवर्ष को प्यार करने वाले देश भर के तमाम नौजवानों में गाँधी के प्रति बची-खुची भ्रांतियां भी समाप्त कर दीं थीं. यहां से नाथूराम गोडसे का मोहनदास करमचंद गांधी के प्रति पूरी तरह से मोहभंग हो गया.

फिर आया वर्ष 1940. यह वह समय था जब हैदराबाद के तत्कालीन शासक निजाम ने हिन्दुओं की प्रताड़ना शुरू की. उसने अपने राज्य में रहने वाले हिन्दुओं पर बलात जजिया कर लगा दिया. यह बात हिन्दू महासभा को नागवार गुजरी. उन्होंने इसका विरोध करने का निर्णय लिया. हिन्दू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर के आदेश पर हिन्दू महासभा का विरोध-प्रदर्शन-मंडल हैदराबाद पहुंचा. महासभा के इस जत्थे का प्रतिनिधित्व नाथूराम गोडसे कर रहे थे. हैदराबाद के निजाम ने जत्थे के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया और उनको अपने कारावास में कठोर दण्ड दिये. किन्तु बाद में राजनीतिक दबाव के चलते उसको अपना फैसला वापस लेना पड़ा.

तदनन्तर वर्ष 1947 में भारत ने स्वतंत्रता के सूर्य का प्रथम प्रकाश देखा. लेकिन यह सुनहरा प्रभात भारत-भूमि पर आकर रक्तिम हो गया और विभाजन के समय हुई साम्प्रदायिक रक्तपात ने देश में रोष एवं शोक का वातावरण बना दिया. दंगाग्रस्त भारत ने नाथूराम के हृदय को अत्यंत उद्वेलित किया. नाथूराम परम हिंदूवादी विचारधारा के व्यक्ति थे. उन्होंने गंभीरता से परिस्थितियों का आकलन किया और तात्कालीन हिन्दू-मुस्लिम टकराव को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में पाया और इसके पीछे मोहनदास करमचंद गान्धी को ही सर्वाधिक उत्तरदायी माना.

मोहनदास करमचंद गाँधी की सहमति से भारत ने विभाजन के समय पकिस्तान को 75 करोड़ रुपये देने का वादा किया था. इनमें से 20 करोड़ पेशगी दिए जा चुके थे. भारतीयों को हैरानी तब हुई जब इसी दौरान पाकिस्तान ने भारत के कश्मीर प्रान्त पर हमला कर दिया.

सरदार पटेल ने गृहमंत्री के तौर पर यह जिम्मेदारी समझी कि देश-विरोधी किसी भी प्रयास को परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन न मिल सके. उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से बात करके पाकिस्तान को शेष 55 करोड़ रुपये न देने का निर्णय ले लिया. परन्तु भारत सरकार के इस निर्णय का गांधी ने विरोध किया. वे अनशन पर बैठ गए. और पाकिस्तान जैसे शत्रुराष्ट्र को समर्थन देने की यह गाँधी की जिद राष्ट्रप्रेमी नाथूराम गोडसे को अनुचित प्रतीत हुई. गान्धी के इस फैसले से दुखित नाथूराम गोडसे और उनके कुछ साथियों ने महात्मा गांधी का अंत करने का फैसला कर लिया.

गान्धी के अनशन से क्षुब्ध गोडसे तथा उनके कुछ मित्रों ने गान्धी का अंत करने की योजना तैयार की जिसके अनुसार दिल्ली के बिड़ला हाउस पहुँचकर गान्धी की प्रार्थना-सभा में बम फेंकना था और उसके बाद बम विस्फोट से पैदा हुई अफरा-तफरी के समय ही गान्धी को समाप्त करना था. यह जिम्मेदारी मदनलाल पाहवा को दी गई. पाहवा ने 20 जनवरी 1948 को गाँधी की प्रार्थना सभा में बम तो फेंक दिया लेकिन उस समय उनकी पिस्तौल ही जाम हो गई और वे गोली नहीं चला सके. पाहवा को गिरफ्तार कर लिया गया.

अब यह योजना फिर से तैयार की गई और नाथूराम ने स्वयं इसकी जिम्मेदारी ली. गांधी को समाप्त करने हेतु वे पूना से दिल्ली आये और वहां पाकिस्तान से आये हुए हिन्दू तथा सिख शरणार्थियों के शिविरों में रुके. यहां उनकी मुलाक़ात एक ऐसे शरणार्थी से हुई जिसने उनको एक इतालवी पिस्तौल बेचीं.

फिर आया योजना का अंतिम दिन याने कि 30 जनवरी 1948. नाथूराम गोडसे दिल्ली के बिड़ला भवन में दाखिल हुए और सीधे प्रार्थना सभा में पहुँच गए. प्रार्थना में अभी 40 मिनट का समय शेष था. इस दौरान ज्यों ही गान्धी ने प्रार्थना-सभा परिसर में प्रवेश किया, नाथूराम ने पहले उनका हाथ जोड़ कर अभिवादन किया फिर तत्काल ही जेब से पिस्तौल निकाल कर तीन गोलियां चला दीं. गांधी का वहीं प्राणांत हो गया.

गोडसे ने भागने की अपेक्षा आत्मसमर्पण के विकल्प को चुना. उनके अनुसार उन्होंने राष्ट्रहित में यह कदम उठाया है वरना अब तक जो हुआ सो हुआ, आने वाले दिनों में देश को, देश के नागरिकों को तथा हिन्दुओं को गाँधी के कारण अत्यंत दुर्दशा का सामना करना पड़ता.

गोडसे का मानना था कि भारत विभाजन के समय गांधी ने भारतीय और पाकिस्तानीे मुसलमानों के पक्ष का समर्थन किया था और वहीं हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर उन्होंने अपनी आंखें मूंद लीं थीं.

जेल में गोडसे ने एक पुस्तक भी लिखी जिसका शीर्षक था – मैने गाँधी को क्यों मारा? उन्होंने अपने कृत्य का उत्तरदायित्व वहन किया  और अदालत को अपने इस अतिवादी कदम का कारण भी पूर्णतया स्पष्ट किया.

पंजाब उच्च न्यायालय में नाथूराम गोडसे पर मोहनदास करमचन्द गान्धी की हत्या का अभियोग चला. यही नहीं उनके ऊपर कुल 17 अभियोग चलाये गये. साल भर चले इस अभियोग के उपरान्त 8 नवम्बर 1949 को उन्हें मृत्युदंड दिया गया. नाथूराम गोडसे को सह-अभियुक्त नारायण आप्टे के साथ १५ नवम्बर १९४९ को पंजाब की अम्बाला जेल में फाँसी दी गई.

(पारिजात त्रिपाठी)

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