प्रतिदिन हम अपने लिए कितना जीते हैं?

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कभी आपने सोचा है इस बारे में?

उत्तर है – जितनी देर हम प्रसन्न रहते हैं.
अर्थात जितनी देर हम प्रसन्नता से जीते हैं 
वही हमारा जीवन होता है 

दिन भर में हम क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, चिंतन-मनन, दौड़-भाग, 
दबाव-तनाव और इस तरह के कई अनावश्यक 
अंतरालों से होकर गुजरते हैं 
किन्तु उनमें प्रसन्नता के क्षण बहुत कम होते हैं

और इस तरह अगर हम गिनें तो अपने औसतन पचासी वर्षों के जीवन में 
हम पंद्रह से बीस वर्ष जीते हैं 
हमारा वास्तिविक जीवन पंद्रह से बीस वर्ष का ही होता है

क्यों न हम इसको बढ़ा लें 
बीस के बजाये चालीस वर्ष 
और चालीस के बजाये अस्सी वर्ष जी लें

तो उसके लिए बस इतना ही करना है
कि हम दिन में अपनी प्रसन्नता के क्षणों को भी उतना ही बढ़ा लें
उदासियों को बस ज़रा सा हिस्सा दें 

अपने आसपास बिखरी खुशियों को गले लगा लें
और खुशियों के साथ सारा दिन डोलें 
हम प्रयास करें कि सौ वर्ष जी लें 

इसलिए मुस्कुराइए 
और हर बात पर मुस्कुराइए
जीवन इतना भी बुरा नहीं है !!!

(पारिजात त्रिपाठी)

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