#मीटू में ऐसा क्या है? – ये है काला हिट

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मीटू में ऐसा क्या है? -ये है काला हिट..कोने कोने से निकाल कर मारता है.. अब कहीं छिप नहीं पायेंगे मोटे मोटे मच्छर..ये है मीटू याने मोस्किटो टॉर्चर.. ये है नया काला हिट..मच्छरों को ढूंढ निकालता है छिपने वाली जगहों से.. और चुन चुन कर मारता है..अब एक भी मच्छर नहीं बचेगा..इसलिये अब मत पूछना कि मीटू में ऐसा क्या है? 

#मीटू में सब कुछ है. #मीटू में मसाला है तो #मीटू में घोटाला भी है. #मीटू में जहां दिलचस्पी का एलिमेंट है वहीं इसमें सनसनी का पेमेन्ट भी है.. इसमें अगर बैटल है तो इसीमें स्कोर सेटल है.. इसमें कोशिश है तो इसी में उम्मीद की किरण भी है. #मीटू में जहां हार्ट अटैक की गुंजाइश हैं तो वहीं स्व-निर्मित हीरोइज़्म की ख्वाहिश भी है. और मज़े की बात #मीटू में जहां अन्याय के विरुद्ध युद्ध है तो वहीं साथ ही ब्लैकमेल भी है, डील भी है, और फिर शायद जेल भी है!

 #मीटू एक घटना से एक आंदोलन बन गया. और अमेरिका से होते होते भारत आ गया. यौनशोषण के इस अभियान को सफलता इस लिए मिल गई क्योंकि यह एक जन-आंदोलन बन गया. और यदि यह घटना या ऐसी घटनाएं आज से बीस साल पहले हुई होतीं तो बस अखबारों की कुछ पंक्तियों में कैद हो कर ही दम तोड़ देतीं. लेकिन भला हो इक्कीसवीं सदी का कि तकनीक का यह कमाल घर-घर पहुँच गया और सोशल मीडिया बन कर उसने जन-मन को एक मंच दे दिया. और यह मंच बड़ा ही शक्तिशाली हो कर उभरा. शक्तिशाली विशेषकर उनके लिए जो जन-जन के नायक हैं या जन-मन के खलनायक. सरकारों को समझ आने लगा है कि सरकार-मेकर्स भी ताकत रखते हैं और यह ताकत पिछले दरवाजे से नहीं सामने के खुले कपाटों से खुल कर आती है. सोशल मीडिया है सोसाइटी की अंडरस्टैन्डिंग और #मीटू है आज इसकी पहली पसंद. #मीटू पहले कैम्पेन था अब मूवमेन्ट बन गया है और वह कृतज्ञ है सोशल मीडिया का जिसने उसे अपने एक मंच ट्विटर से अपने परम मंच व्हाट्सएप तक पहुंचाया है. इसके बाद तो आधी दुनिया ने सरआंखों पर उठा लिया है इसे आज.  

आधी दुनिया याने महिलाओं को मिला है यह ब्रम्हास्त्र. और अब वे गिन-गिन कर अपने जीवन के दशाननों को धराशायी कर रही हैं. ये सिलसिला तो अभी शुरू हुआ है लेकिन इसके खात्मे की भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता. मीडिया को चाहिये टीआरपी और #मीटू से बढ़िया टीआरपी और कहां मिल सकती है.

कोई शक नहीं कि जिस तरह से हर हथियार का बेजा या बुरा इस्तेमाल होता है, #मीटू का भी हो सकता है. महिलायें अपने प्रबलतम शत्रुओं पर यह प्रबलतम प्रहार करके उनको धूल चटा सकती हैं. अब वो पुराने ज़माने वाला ज़माना तो रहा नहीं, जब बलात्कार शब्द भी सभ्य ड्राइंगरूम्स में नहीं बोला जाता था. आज तो नारियां भी इस शब्द का सुबह शाम ऐसे उच्चारण करती हैं जैसे सब्जी भाजी का दाम. इसलिये अब बहुत सारे मीटू के केसेज दब जायेंगे और नोटों के ढेर में छुप जायेंगे..अब कई लोग तो बहुमूल्य उपहार भेज रहे होंगे, कई लोग एडवान्स पेमेन्ट कर रहे होंगे ताकि वो कल के अखबार की हेडलाइन्स न बन सकें. बुरा उसमें भी नहीं है. स्कोर तो सेटल वैसे भी होता है. ईगो को लेकर कितने दिन पेट भर सकता है कोई, पैसा ईगो से अक्सर बड़ा होता है.

इसलिये #मीटू के इस दौर में पुराने फिल्मी रंजीत टाइप के ‘मर्द’ जो कि अन्यायपूर्ण व्यभिचार के उपरांत मूंछे उमेठ कर शर्ट पैन्ट के भीतर खोंसते हुए बेल्ट पहनते हैं, अब भीगी बिल्ली बन कर कहीं दुबक जाने की जगह ढूंढ रहे हैं. और आने वाले दिनों में मजा तो तब आयेगा जब #मीटू मूवमेन्ट हॉलीवुड, बॉलीवुड और रॉलीवुड (राजनीति की नौटंकी दुनिया) से होती हुई मोहल्ला-वुड और फैमिली-वुड तक पहुंचने वाली है जिसमें मोहल्ले में होने वाले लीगल और गैरलीगल एफेयर्स से लेकर कामवाली बाइयों के कोठी वाले साहबों के साथ चल रहे अंतरंग संबंध सामने आयेंगे. और ठीक ऐसे ही मेमसाहबों का अपने नौकरों, ड्राइवरों के संग चलने वाला प्रेमपूर्ण रंग, इत्यादि..इतना कुछ है आगे इसमें कि 13 या 52 एपीसोड्स नहीं बल्कि तेरह हजार या बावन हजार एपीसोड्स भी आराम से बन जायेंगे.

 कोई कहे कि यह बड़ी बुरी बात है कि #मीटू को लेकर हंसी ठठ्ठा या जोक्स बनाये जा रहे हैं. ऐसे लोगों की ऐसी बातों का यही जवाब दिया जा सकता है कि इन्सानी ज़िन्दगी की यही तो खूबी है, वह अपने हर रंग पर हंसना जानती है. और हां, हंसने वालों पर रोने वालों, ये भी जान लो कि कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आप भी #मीटू में शामिल हैं..अगर इस तरफ नहीं तो उस तरफ..अगर आज नहीं तो कल..वरना ये मान कर प्रसन्न हो जाइये कि आप तो पुरुष ही नहीं हैं, आप महापुरुष हैं.  

मीडिया #मीटू को बेच-बेच कर बड़े मज़े ले रहा है. बड़े मज़े की बात ये है कि बड़ी जल्दी ही मीडिया में भी #मीटू मूवमेन्ट बाकायदा शुरू होने वाला है. सुन्दर एंकरों की ग्लैमरस दुनिया में घुसने या वहां जगह बनाने या कामयाबी के साथ घुसे रहने की कीमत चुकानी पड़ती है सुन्दरियों को. सुन्दर न भी हों तो भी कीमत तो कीमत ही है. इस मारामारी में पर्दे के पीछे के शिकार भी पब्लिक हो जायेंगे बहुत जल्दी. तब ये देखना दिलचस्प होगा कि इस मसाले को बुद्धू बक्से के समाचारों में उस समय कितनी जगह मिल पायेगी. ज़ाहिर है, बात निकली है तो दूर तलक जायेगी..

(पारिजात त्रिपाठी)

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