मुझे आडवाणी बना दिया कांग्रेस ने !

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लेखक को स्वप्न में दर्शन देकर बताई दिग्गी ने अपनी पीड़ा..

दिस इज़ क्लेमर, नॉट ए डिस्क्लेमर! हम यह क्लेम करते हैं कि इस लेख का संबंध किसी जीवित या मृत या जीवित ही मृत किसी व्यक्ति से बिलकुल नहीं है.

तीनों राज्यों में जोरदार चुनावी घमासान शांत हो गया है. अब ग्यारह तारीख को चुनाव परिणाम आएंगे उसके बाद जीतने वालों का शोर कुछ दिन सुनाई देगा फिर उधर भी शांति छा जायेगी. आप सोचेंगे कि उसके बाद देश में शान्ति का राज होगा, ऐसा नहीं है. इसके उपरान्त लोगों की तकलीफों का शोर सुनाई देगा, लोगों के राजनैतिक प्रतिनिधियों के खुर्राटों के साथ. लोग शब्द से मेरा तात्पर्य चुनाव के बाद अर्थहीन हो गए उन लोगों से है जिन्हें चुनाव के पहले वोटर या मतदाता नामों से पुकारा जाता है.

लेकिन यह कथा आम लोगों की नहीं है. यह कथा तो मध्यप्रदेश की राजनीति के अमिताभ बच्चन की है जिन्हें लोग दिग्गी राजा के नाम से भी जानते हैं. यद्यपि अब दिग्गी भी भूल गए हैं कि सास भी कभी बहू थी, आई मीन, वे भी कभी राजा थे. और वैसे भी आज उनकी जो गत बना दी गई है, उसके बाद तो वे सब कुछ भूल जाना चाहते हैं.

मध्यप्रदेश की फुलवारी को बड़े जंगल में बदल कर देश की केंद्रीय राजनीति में कदम रखने वाले दिग्गी राजा को राजनीति का ऐसा सिला मिलेगा, इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. उनसे पूर्व दो और महापुरुषों के साथ इस कोटि का अन्याय हुआ था, जिनमें से एक थे अताउल्ला खां और दुसरे लालकृष्ण आडवाणी. अताउल्ला ने गा-गा कर अपना दर्द ब्यान कर दिया, आडवाणी ने रो-रो कर अपनी पीड़ा जाहिर कर दी, किन्तु दिग्गी से ये दोनों काम न हो सके क्यूंकि उन पर तो बोलने की भी इमर्जेन्सी लगी हुई है. 

ख़ामोशी की चदरिया में न ख़ुशी सोती है न ग़म. इसलिए दिग्गी ने कई बार कोशिश की कि अपनी ख़ामोशी की चदरिया को खींच कर फेंक दें. लेकिन उनसे हो नहीं पाया. उन्होंने जब भी मुँह खोला उनको ‘स्टेचू’ कर दिया गया. वे वैसे के वैसे वहीं रह गए, जहां थे.

पुरानी यादों के सहारे जीवन के अंतिम गैर-राजनीतिक दिन  काट रहे दिग्गी जाएँ तो जाएँ कहाँ. हैरानी की बात तो ये है कि लोग उनको समझ ही नहीं पाते. उनकी अपनी पार्टी के लोग उनको समझ नहीं पाए तो बाकियों को तो छोड़ दीजिये. भाजपा के लिए या कई दूसरों के लिए भी सौ टका खरा उनका टंच वक्तव्य लोग समझ ही नहीं पाते हैं. पराये तो छोड़ दीजिये अपने लोग भी उनके बोलने के बाद उनसे कन्नी काटने लगते थे. एक ज़माना था कि देश में बोलने वाले तमाम लोगों के बीच में बस दो ही लोगों की आवाज़ें सुनाई देती थीं – लालू यादव की और दिग्विजय सिंह की.

लालू ठहरे जनम जनम के कमीडियन. तो लोग उनकी बात सुन कर हंस देते थे. पर दिग्गी की बात तो समझ ही नहीं आती थी किसी को. इसलिए बोलने के बाद दिग्गी खुद ही हंस दिया करते थे. हद तो तब हो गई जब उनके बोलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. वो भी वहां जहां मध्यप्रदेश में एक ज़माने में तूती बोलती थी दिग्गी की. उनसे कहा गया कि आप कुछ नहीं बोलेंगे. उन्होंने कहा – ठीक है राजनीति की फील्ड का कुछ नहीं बोलेंगे. तो ऊपर से फिर निर्देश आया कि न राजनीति का न किसी और बात का, आप कुछ बोलेंगे ही नहीं, आप तो मुँह ही नहीं खोलेंगे !!

दिग्विजय सिंह और कुछ बोलें नहीं? इससे बड़ा अन्याय उनके साथ उनके जीवन में कभी नहीं हुआ था. बोलना तो छोड़िये हम मुँह भी नहीं खोल सकते, ये तो हद है! हमसे हमारा सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक अधिकार ही छीना जा रहा है? कोई सुनता नहीं था इसी मजबूरी में तो हम दूसरी (सुनने वाली) घर ले आये, और अब कहा जा रहा है कि मुँह भी नहीं खोल सकते..ये तो हद है!

जो भी हो, मैं रार भले ही न ठानूंगा मैं हार भी नहीं मानूंगा, दिग्गी राजा ने फैसला कर लिया है. आने दो ग्यारह तारीख के चुनाव परिणाम को. फिर बताता हूँ सबको. मैं बोलूंगा नहीं मुँह खोलूंगा भी नहीं फिर भी अपने दिल की आवाज़ से एक-एक को बता दूंगा कि हारे क्यों? दिग्गी से पूछ लेते, दिग्गी की मदद ले लेते, दिग्गी के ही प्रदेश में दिग्गी की बोलती बंद कर दोगे तो यही होगा. अमिताभ बच्चन के बिना ‘कौन बनेगा प्रदेशपति’ खेलोगे.. तो फास्टेस्ट फिंगर में ही बाहर हो जाओगे..

अगर कांग्रेस मध्यप्रदेश हार गई, जिसकी पूरी संभावना है, तो दिग्गी के चेहरे पर फूटी मुस्कान को भी लोग गलत ही समझेंगे. दिग्गी को पता है कि कांग्रेस यही कहेगी कि दिग्गी खुश है कांग्रेस की हार से. कोई ये नहीं पूछेगा कि इस दिग्गी की मुस्कान में कितनी पीड़ा छुपी हुई है. अपने लिए अपनी पार्टी के लिए और अपने राहुल भैया के लिए भी..

दिग्गी की सबसे बड़ी परेशानी है कि उनको समझा नहीं गया कभी. न पार्टी के अंदर और न बाहर. न उनकी बात को सुना जाता है न उनकी भावना को समझा जाता है. वरना दिग्गी जितनी राजनीतिक समझ इस देश के भीतर सिर्फ सोनिया जी में है, ऐसा दिग्गी राजा का मानना है. पर उनकी ये बात भी किसी ने नहीं सुनी.

दिग्गी बोले – मेरा सबसे बड़ा हथियार मेरी वाणी ही है. अब एक-एक को देख लूँगा बोल बोल कर. याने एक-एक को बोल डालूँगा, दिग्गी ने कसम खा ली है. बस आने दो एमपी का रिज़ल्ट. आज तो  इतनी मजबूरी है कि अपनी बात कहने के लिए भी सपने में आना पड़ रहा है.

दिग्गी को न पहले समझ आया न आज समझ आया है कि उनकी  खरी-खरी बातों को खोटी क्यों समझ लेते हैं लोग? खरी-खोटी सुनाना तो आता ही नहीं उनको. जब भी बोलते हैं हंस के बोलते हैं. वो तो बोलने के पहले भी हंस लेते हैं और बाद में भी हँसते रहते हैं. लोग इतना जलते हैं कि उनके  बोलते ही ख़ाक हो जाते हैं, तो इसमें भला उनका क्या दोष?

दिग्गी आगे बोले – मेरा नाम दिग्गी राजा ऐसे वैसे नहीं है. आज भी नौजवानों में मेरा क्रेज़ है. मैं अपनी दूसरी शादी की बात नहीं कर रहा, मेरा मतलब है कि और भी कारणों से आज भी नौजवान मुझसे जलते हैं. चलो नौजवानों से या नौजवानों में भी नौजवान राहुल गाँधी से मुझे कोई लेना देना नहीं है. मैं तो सोनिया गाँधी की बात कर रहा हूँ कि वे चाहें तो मुझसे राजनीतिक परामर्श ले सकती हैं. कहीं राहुल भी हाँथ से न निकल जाये अखिलेश या तेजप्रताप की तरह, सोनिया जी का थोड़ा सावधान रहना बनता है. सारा टाइम मनमोहन को सुना के या अहमद की सुन के बिताना काफी नहीं है. थोड़ा बेटे पर भी ध्यान देना चाहिए उनको. 

बेटा इकलौता भी है और कुंवारा भी. काम कुछ है नहीं और ज्ञान भी कुछ है नहीं, पता नहीं उसका ध्यान किधर है जबकि राजनीतिक हलुए की दुकान इधर है. राजनीति के बाज़ार में कांग्रेसी हलुए की दुकान से बड़ी दुकान अभी तक बनी नहीं है. 

जब से बड़े भैया का बेटा निकम्मा हो कर घर बैठ गया है तब से बेटों को लेकर दिल में चिंता बनी रहती है. मैं राहुल की नहीं राहुल सिंह की बात कर रहा हूँ. बड़े भैया याने अर्जुन सिंह. अगर दिग्गी राजा को लोग एमपी के राजनीतिक सिनेमा का अमिताभ बच्चन मानते हैं तो उनको नहीं भूलना चाहिए कि वहाँ  एक दिलीप कुमार भी हुआ करते थे जिन्हें लोग अर्जुन सिंह के नाम से जानते थे. नाकाम रहा तो क्या राहुल गाँधी से तो अधिक लायक था अर्जुन सिंह का बेटा, दिग्गी ऐसा सोचते हैं. राहुल गांधी को तो वे शिवराज के बेटे कार्तिकेय की बराबरी में ही रखते हैं. अभी सीख रहा है, कुछ दिनों में सीख जाएगा, शायद!

मैं तो कह रहा हूँ शादियों का सीजन चल रहा है, सोनिया जी..कोई भले घर की संस्कारी कन्या देख कर हाँथ पीले कर दो जी आप तो चिरंजीव के..इसके पहले कि वे खुद ही युवक कांग्रेस से उठा कर किसी को घर ले आयें, आप तो जल्दी कर लो. जिम्मेदारी आएगी तो दुकानदारी अपने-आप आ जायेगी. फिर हो सकता है नई बहू के भाग्य से छींका टूट जाए, मेरा मतलब है कि कुछ मीठा हो जाए..कुछ ठीक-ठाक हो जाये! देश गया, प्रदेश गए, अब घर तो बच जाए कम से कम!

इतना कह कर अंतर्ध्यान होने के पूर्व दिग्विजय जी बोले – मुझे पता है कि आज भी मेरी इन गंभीर बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा. आप भी नहीं लोगे ये भी पता है मुझे.. खैर, अब तो मैने  भी अपनी बातों को गंभीरता से लेना छोड़ दिया है.. इसलिए आज इतना ही बोलूंगा. आपसे दुबारा मिलूंगा आपके सपने में.. ब्रेक के बाद!

(पारिजात त्रिपाठी)

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