मुहब्बतनामा बनाम आई लव यू

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मोहब्बतनामा उनके लिए जो ऑफिस निकलते हुए अपने महबूब को ‘आई लव यू’ कहकर नहीं आए..

आज सुबह-सुबह पड़ोस की आंटी जो ज़रा उम्रदराज़ हैं, उन्होंने अंकल को कोहनी मारी। फ़िर बोलीं- आज तो कहीं घुमा लाते। अंकल जी ज़रा खीजे कि तुम्हें घूमने की क्या सूझी अचानक। ठंड में चैन से न बैठा जाता?

आंटी ने कहा- टीवी में दिखा रहे थे आज रोज़ डे है। सब गिफ़्ट दे रहे हैं अपनी लुगाई को, प्रेमिका को, मंगेतर को। शादी के इतने साल तो कुछ दिया नहीं तुमने। चलो देना न सही, घुमा ही लाओ बाज़ार। चप्पल ही ख़रीद लूँगी।

अंकल ने जवाब दिया : जैसे-जैसे बुढापा आ रहा है, ये डे-वे पर बड़ा ध्यान देने लगी हो तुम। ठीक है चप्पल दिला लाएँगे तुम्हें वरना उम्रभर सुनाओगी। … पर ये न कहो कि कभी कुछ दिलाया नहीं तुम्हें। हमारे टाइम पर ये सब नहीं था, उसके बाद भी शादी से पहले कैसे-कैसे मिलने आता था तुमसे। वो कुछ याद नहीं तुम्हें। माँ-बाबूजी से छिपकर चीज़ें दिलाता था तुम्हें। भूल गई कैसे शाम को ही छिपकर अखरोट फोड़कर फलियाँ रख लेता था तुम्हारे लिए। ताकि रात को बिना आवाज़ किए खा सको तुम। दोनों के पास काम ही इतना था कि रात से पहले तुम्हें कुछ देने की फ़ुर्सत भी नहीं मिलती थी।

आंटी हँसने लगी। इसके बाद तो दोनों बड़ी देर पहले के दिन याद करते हुए ठहाके लगा रहे थे। मैं दोनों के पास ही बैठा था तो सोचने लगा; पश्चिम वालों ने पूरा वेलेंटाइन वीक बनाकर बड़ा सही काम किया है। इसी बहाने अंकल-आंटी बाज़ार के साथ उन यादों से होकर भी आ गए होंगे ; जिनकी वजह से आज साथ हैं।

माना प्यार का कोई दिन नहीं होता लेकिन ख़ुद से पूछिए- आख़िरी बार आपने कब प्रेम का इज़हार किया था। आख़िरी बार कब अपनी प्रेयसी के बाल सहलाते हुए उसकी तारीफ़ की थी। या अपने प्रेमी को कहा था- ये परफ्यूम बहुत अच्छा है।

शादीशुदा तो शायद इस सवाल का जवाब भी ढूंढ रहे होंगे- शादी के बाद प्रेम कहाँ चला जाता है ? आपको हर वक़्त एहसास तो होता है कि आपको एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत है, लेकिन विडंबना यह है कि आपके पास इसे जताने का वक़्त ही नहीं। धीरे-धीरे खाई बढ़ती जाती है और ऐसा लगता है जैसे दोनों में जंग छिड़ गई हो। कभी आप इस बार में सोचें भी तो लगता है- ये सब फ़ालतू की बातें हैं। ….लेकिन धीरे-धीरे सब ख़त्म होने का एहसास मजबूत हो जाता है और आप अलग होने का फैसला कर लेते हैं।

फ़िर किसी और से मोहब्बत होती है। आपको लगता है आप एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। सब नया-नया सा जान पड़ता है। आप मान लेते हैं कि इससे पहले के रिश्ते में ही कुछ कमी थी, लेकिन यहाँ भी कुछ वक़्त बाद हालात जस के तस हो जाते हैं।

कभी इस पर ग़ौर नहीं किया ना? दरअसल, प्रेम की आकांक्षा की जड़ हमारी मनोवैज्ञानिक संरचना में होती है। हमें ख़ुद को भी और महबूब को भी बार-बार याद दिलाना होता है कि हम प्रेम में हैं। इसलिए मोहब्बत के दिनों को संस्कारों का हवाला देकर ख़ारिज न करें, क्योंकि प्रेम ही संस्कार है। आपको नहीं पता, कभी-कभी प्यार से कहा एक शब्द किसी के लिए कितना कुछ बदल सकता है।

इसलिए महबूब के करीब आने के बहाने तलाशें। रोज़ डे या वेलेंटाइन डे के बहाने। दिन से क्या फ़र्क पड़ता है। सारा फ़र्क बस मोहब्बत का है। बाक़ी हिंदी कविता परिवार तो आपके साथ है ही। पूरा हफ़्ता मिलकर प्रेममय करेंगे।

(साभार)

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