सुप्रीम कोर्ट के 5 जज शहरी नक्सल मामले से हटे

ऐसी क्या बात हो सकती है जो गौतम नवलखा, शहरी नक्सल केस से हमारे 5 न्यायमूर्ति हट गए ? ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है..

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शहरी नक्सल गौतम नवलखा के खिलाफ कोरेगांव भीमा हिंसा में दर्ज केस को बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द करने से मना कर दिया था जिसके खिलाफ नवलखा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है —

लेकिन एक के बाद एक सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया — सबसे पहले 30 सितम्बर को जस्टिस गोगोई ने अपने को अलग किया और उसके बाद 1 अक्टूबर को जस्टिस एनवी रमना, आर सुभाष रेड्डी और बीआर गवई ने खुद को अलग किया –इसके बाद कल जस्टिस एस रविंद्र भट्ट ने भी खुद को सुनवाई से अलग कर लिया — अभी बेंच में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस विनीत सरन मौजूद हैं.

कोई जज अपने को तब ही किसी आरोपी के खिलाफ सुनवाई खुद को अलग करता है –जब या तो 1) जज के आरोपी से कोई औपचारिक या अनोपचारिक सम्बन्ध रहे हों; 2) जज ने किसी केस में उसकी पैरवी की हो; 3) आरोपी के हित और जज के हित आपस में मेल खाते हों; 4) आरोपी में किसी तरह जज का कोई निजी हित हो -जिससे जज का निर्णय निष्पक्ष होने की या तो सम्भावना ना हो या उस पर प्रश्नचिन्ह लगने की सम्भावना हो.

गौतम नवलखा कोई नया पैदा हुआ शहरी नक्सली तो है नहीं, पुराना खिलाडी है और इसलिए इन सभी जजों को बताना चाहिए कि विगत में उनके नवलखा से क्या सम्बन्ध रहे थे – नवलखा के साथ तो और भी कई लोग पकडे गए थे; अतः उन सबके साथ भी जजों को बताना चाहिए कि क्या कोई
सम्बन्ध रहे थे –

अगर शहरी नक्सलों के साथ जजों के सम्बन्ध रहे हैं तब तो उनकी नियुक्ति पर भी सवालिया निशान लग सकता है और क्या कॉलेजियम को उनके नाम की संतुति करने से पहले इन बातों की जानकारी थी कि नहीं –अगर थी तो फिर कैसे नियुक्ति की सिफारिश हुई –

ये किसी तरह अदालत का अपमान करने की द्रष्टि से नहीं लिखा मैंने बल्कि एक जिज्ञासा वश लिखा है कि आखिर इसके पीछे सच क्या है –कोई कानून का जानकार इस पर प्रकाश डाले — और मेरे प्रशनों का निराकरण करे .

(सुभाष चन्द्र)

(ये ओपीनियन लेख रूप में लेखक का ही है, न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल का नहीं)

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