*स्त्री देह इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है।*

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ओशो की लेखनी है ज़िन्दगी का सच..

स्त्री देह भी एक सामान्य देह है, जैसे पुरुष की| न जाने क्यों स्त्रियों की देह को कुछ अजूबा-सा मान लिया गया| जहां पुरुषों को अपनी जैविक संरचना पर गर्व की अनुभूति हुई, वहीं स्त्री को शर्म की|

पुरुष अपने खुद को स्त्री से उच्च मानने लगा| स्त्रियाँ बचपन से ही अपनी देह को छुपाने का उपक्रम करने लगीं, वहीं पुरुष बेहद धृष्टता से उसे उजागर करने का| स्त्री की शर्म और संकोच पर पुरुष ने अपने गर्व का शिकंजा कसा, उसकी शर्म को तार-तार करना सबसे बड़ा un है| पहले उस पर शर्म के, हया के बंधन, फिर शारीरिक अक्षमता का बहाना करके उसकी सुरक्षा का ठेका अपने नाम करने की साजिश|

पिता, भाई, पति, पुत्र सब स्त्रियों के रक्षक बनें| रक्षक भी पुरुष और शिकारी भी पुरुष यानी एक पुरुष दूसरे पुरुष से बचाने के लिए आगे आया, वरना स्त्रियों से तो कोई खतरा था ही नहीं| वह खतरा बाद में पैदा हुआ जिसे पितृसत्ता ने ही पैदा किया,फिर एक पुरुष को जब दूसरे पुरुष से बदला लेना हुआ, आक्रोश व्यक्त करना हुआ तो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनीं वो स्त्रियाँ जो उस पुरुष के अधीन थीं| यहां भी स्त्री देह ही निशाने पर थी|

स्त्री देह तो इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है| ऐसा लगता है कि यह न हो तो कोई दिक्कत ही न हो| सारे फरमान उसकी देह को लेकर जारी किए जाते हैं, सारे नियम उसकी देह के लिए बनते हैं, सारी नैतिकताएं, संस्कृतियाँ, सभ्यताएं वह अपनी देह के भीतर पाल रही है, बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस स्त्री की देह को लेकर इतनी साजिशें चल रही हैं, उसी देह में रहने वाले दिमाग को एकदम नकार दिया गया| उसे पनपने ही नहीं दिया गया| उसका दिमाग चला तो उसे चाँद-तारों की शायरी में उलझाया गया| उसके होंठ, उसकी आँखें, उसकी चाल, उसका रंग, उसके बाल-इन चीजं पर इतना फोकस किया गया कि वह बस पावं में पाजेब और आँखों में काजल लगाने में ही मशगूल रही है।

लड़कियों का अच्छा या बुरा होना उनकी सुंदरता और शालीनता (जिसका एक मात्र अर्थ ख़ामोशी से सब कुछ श लेना होता है) पर ही निर्भर करता था और करता है| कोई नहीं कहता कि उसे समझदार बहू चाहिए, कहीं किसी शादी के विज्ञापन में यह नहीं लिखा होता है कि लड़की का गुणवान होना ज़रूरी है| हर जगह सुंदर, शिक्षित, शालीन लड़की ही चाहिए| शिक्षा के दायरे कुछ ऐसे रचे गए कि शिक्षित स्त्रियाँ भी असल में शिक्षित नहीं हो पाई| आज भी अधिकतर जो सोचती हैं, वह वे सोचना नहीं चाहतीं, वैसा उन्हें सोचने को कहा जाता है यानी 
हाइजैक्ड थिंकिंग|

ओशो

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