जीरो हो गई ‘जीरो’ : नहीं रहे शाहरुख़ अब किंग खान!

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जब कोई फिल्म देखते समय आपको लगे कि ये फिल्म ज़रा लम्बी है  या बार बार आपका ध्यान घड़ी देखने पर जाए, तो समझ लीजिये वो फिल्म फ्लॉप है. 


अब किसी फ्लॉप फिल्म की तारीफ़ में क्या कहा जाए! धुल गई शाहरुख़ खान की नई मूवी – ज़ीरो. नाम ही ऐसा था कि फिल्म को ज़ीरो होना ही था. नहीं ये सच नहीं. नाम बेचारा क्या करे, सच तो ये है कि फिल्म में वो आकर्षण ही नहीं था कि देखने वाले मुँह खोल कर पूरी फिल्म देख जाते और पता भी नहीं चलता.

अनुष्का शर्मा और कैटरीना कैफ का अभिनय शायद शाहरुख़ खान से बेहतर था लेकिन ओवरआल फिल्म ने उनका भी साथ नहीं दिया. दर्शक पूरी फिल्म में कन्फ्यूज़ रहे. वे समझ नहीं सके कि फिल्म देखते समय दिल का इस्तेमाल करें या दिमाग का!

कुछ लोगों ने फिल्म के सुपरहिट होने की पूरी आस लगा रखी थी. उन लोगों में शाहरुख़ खान और डायरेक्टर और आनंद एल. राय भी थे. एक दिन में ही फिल्म इतनी नाउम्मीद कर देगी इसकी उम्मीद तो इन दोनों की जोड़ी को बिलकुल नहीं थी. हालांकि डायरेक्टर आनन्द एल राय की उम्मीद अभी भी कायम है.

बउआ बने हुए शाहरुख़ अजीबोगरीब टाइप की कॉमेडी करते रहे और बीच-बीच में लोगों को इमोशनल ब्लैकमेल करने की कोशिश भी की. पर दोनों ही चीजों का दर्शकों पर कुछ असर नहीं हुआ. कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, दर्शक कुछ अच्छा होने की उम्मीद लगाए रहे. पर निराशा तब खत्म हुई जब फिल्म खत्म हुई. 

बबिता कुमारी के रोल में कैटरीना बउआ से ज्यादा ठीक लगीं. स्पेस साइंटिस्ट आफिया याने अनुष्का अभिनय के मामले में इन दोनों पर भारी पड़ीं. बड़े सितारों की कोई कमी नहीं है फिल्म में लेकिन कमी फिल्म में पकड़ फिर भी नहीं है.  

कुछ नयेपन की तलाश में रहने वाले फिल्म क्रिटिक्स को भी दुखी किया है इस फिल्म ने. पूरी फिल्म देख गए पर वे नया कुछ भी ढूंढ न सके. फिल्म में न बउआ सिंह मंगल ग्रह जा सका न फिल्म हिट हो सकी और न शाहरुख़ खान का कोई नया अवतार देखने को मिला. किरदार का अजीब होना ही सब कुछ नहीं होता, किरदार का अच्छा होना ज़्यादा ज़रूरी होता है.

‘जीरो’ का वास्तु अच्छा था या बुरा – ये शाहरुख के फैन्स से न पूछिए. उन्हें तो शाहरुख की ये फिल्म भी पसंद आ सकती है. पर यही सवाल अगर बॉक्स ऑफिस से किया जाए तो सकारात्मक उत्तर आने की सम्भावना बहुत कम है.

फिल्म में ड्रामा है तो सस्पेंस गायब. सस्पेंस नहीं तो कोई बात नहीं, एक्शन बिलकुल ही गायब है. चलो कोई बात नहीं. भारतीय दर्शक जिन्हें सिनेमाघर से बाहर आ कर बात-बात में फिल्म के डायलॉग दुहराने की आदत है, वो भी खाली हाथ बाहर आये और उन्होंने पलट कर पीछे नहीं देखा.

सवाल ये है कि यदि दर्शक बेवकूफ बनते हैं तो उन्हें ये समझ नहीं आता कि उनका पैसा बर्बाद हुआ है या वक्त. फिर वे ये कसम भी खाते हैं अगली बार ऐसी गलती नहीं होगी. लेकिन यदि उनसे गलती अगली बार भी हो जाती है तो समझ लीजिये कि अब गलती फिल्म निर्माता या निर्देशक या मुख्य अभिनेता या कहानी से हो रही है. यह बात शाहरुख़ खान से बेहतर कौन समझ सकता है.

कहानी कुछ खास नहीं फिर भी बताना हमारा फ़र्ज़ है. मेरठ के बउआ सिंह याने कि शाहरुख़ खान को अड़तीस साल की उम्र में अचानक प्यार की तलाश करने का ख़याल आता है. बस बउआ निकल निकल पड़ता है. उसकी मुलाक़ात होती है सेरिब्रल पाल्सी से जूझ रही स्पेस साइंटिस्ट आफिया (अनुष्का शर्मा) से. डायलॉग मार-मार कर आखिर जीत ही लेता है बउआ आफ़िया का दिल. लेकिन बउआ जब अपने दिल में झांकता है तो उसे मशहूर एक्ट्रेस बबिता कुमारी का चेहरा नज़र आता है. वह अपने दिल की सुनता है और बबिता को ही अपनी मंज़िल मान कर आफ़िया को छोड़ के भाग निकलता है. आफ़िया को छोड़ता भी है तो शादी वाले दिन. उसे पूरी उम्मीद होती है कि  बबिता कुमारी (कैटरीना कैफ) से उसकी कम से कम एक बार तो मुलाक़ात ज़रूर होगी.

लेकिन फिल्म में वो नहीं होता जो दर्शक सोचने लग जाते हैं कि आगे होगा. नाटकीयता भरपूर है मगर कमज़ोर है. श्रीदेवी आखिरी बार इसमें दिखेंगी आपको. दीपिका पादुकोण, जूही, आलिया भट्ट, काजोल, रानी मुखर्जी और तिग्मांशु धुलिया भी नज़र आएंगे आपको इस फिल्म में. फिर भी आप खुशी-खुशी बाहर नहीं आ पायेंगे.

समझदार सलाह दर्शकों के लिए बस यही है कि अगर कोई काम नहीं हो घर पर, बोर हो रहे हों तो चले जाएँ जीरो देख आएं लेकिन ध्यान रहे, घड़ी न ले जाएँ अपने साथ. यदि सिनेमा हॉल में टाइम न कटे तो व्हाट्सप या मोबाइल गेम भी खेल सकते हैं शांति के साथ. किसी को पता नहीं चलेगा!


(इन्द्रनील त्रिपाठी)

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