देखने लायक है मोदी बायोपिक

दिल्ली के कनाटप्लेस स्थित पीवीआर प्लाज़ा में संपन्न हुआ मोदी बायोपिक का प्रीमियर शो..

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आज 20 मई को ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ फिल्म के प्रीमियर शो के साथ सामने आया फिल्म का नया पोस्टर इस ऐलान के साथ – ”आ रहे हैं दोबारा, अब कोई नहीं रोक सकता आने से!”

शुक्र है नये पोस्टर पर लिखो इस द्वि-अर्थी संवाद को लेकर विपक्ष ने कोई आपत्ति नहीं जताई क्योंकि दोनो तरफ से बहुप्रतीक्षित यह फिल्म ‘मोदी बायोपिक’ रिलीज़ हो रही है आने वाले शुक्रवार 24 मई को और देश भर के सिनेमाघर उसे उस समय रिलीज़ कर रहे होंगे जब मोदी देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे होंगे.

वास्तव में इस फिल्म के निर्माताओं के लिए यह रिलीज़ से पहले ही किसी कॉम्पलीमेन्ट से कम नहीं कि उनकी फिल्म की प्रभावशालिता से डर कर मोदी के विपक्षियों ने इसको रिलीज़ डेट पर रिलीज़ नहीं होने दिया. और आज जब इसका प्रीमियर दिल्ली में हुआ तो विपक्षियों के इस डर में सच्चाई नज़र आई. चुनाव के इस दौर में विपक्षियों के लिए इसने एक नया जुमला तैयार किया – डर के पीछे हार है!!

फिल्म के प्रीमियर में आये मीडिया कर्मियों और सेलेब गेस्ट्स ने महसूस किया कि फिल्म में दम है क्योंकि बनाने वालों ने इसे दिल से बनाया है. प्रीमियर में अगर मीडिया को सवाल करने का अवसर निर्माताओं ने दिया होता तो वे ज़रूर पूछते कि कामर्शियल सिनेमा के इस दौर में आपकी फिल्म के सर्वाइवल के कितने चांस हैं? या फिर – एक्सपेरिमेंटेशन की फिल्मों के लिए डिस्ट्रीब्यूटर आप कहाँ से जुटाते हैं ? या फिर – आप ऐसी फिल्म्स बना कर कितनी क्षतिपूर्ति के लिए तैयार रहते हैं?

और अगर ये सवाल होते तो जवाब एक ही होता जो फिल्म देखने के बाद देखने वाले खुद ही दे देते कि फिल्म का कथानक अच्छा हो प्रस्तुति अच्छी हो तो एक्सपेरिमेंटेशन एक सुन्दर व्यावसायिक अवसर में बदल जाता है और उसका परिणाम सकारात्मक ही होता है. फिल्म अच्छी है और सुपरहिट न भी हो तो भी फ्लॉप नहीं होगी, अपना खर्चा निकाल लेगी और शायद मोदी की लहर के इस वातावरण में हिट भी हो जाए!

हीरो तो कमाल का है. हीरो का चयन कैसे किया? कैसे विवेक ओबरॉय का ख़याल आया निर्माताओं को? ये सवाल तो बनते हैं. बड़ी उम्र की सीढ़ियां चढ़ रहे विवेक आज भी देश के सबसे चार्मिंग हीरोज़ में एक हैं. ये बात उन्हें सामने से देख कर भी सौ फीसदी सच नज़र आई. उनके करीने से बिखरे हुए बाल, उनका मुस्कुराना और मीठी आवाज़ में बात करने का अंदाज़ प्रीमियर के समय ही कई महिला दर्शकों का दिल जीत ले गया.

यहां हीरो का कमाल उसका चार्मिंग होना नहीं बल्कि उस रोल को बहुत सहजता से निभाना था जो कि किसी भी चुनौती से कम नहीं था. जो किरदार उन्होंने निभाया, वो इस समय देश का सबसे बड़ा हीरो है. और तीन दिन बाद वह प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर दुबारा विराजमान होने वाला है. उन नरेंद्र दामोदर दास मोदी का मेकअप और उनकी आवाज़ में बात करने का अंदाज़ विवेक ओबरॉय को एक मंजे हुए ऐक्टर होने का प्रमाणपत्र देता है. शायद विवेक इस बात से भी सहमत होंगे कि मोदी बायोपिक उनके जीवन की सबसे सार्थक फिल्म है – न सिर्फ एक जीवित जननायक के चरित्र को परदे पर अभिनीत करने की चुनौती का सामना करने की दृष्टि से बल्कि अपने अभिनय की गहराई मापने की दृष्टि से भी.

इस फिल्म को एक दर्शक की भांति ही देखिएगा. यदि उससे भी थोड़ा आगे जाकर एक संवेदनशील दर्शक के रूप में आप इसे देखेंगे तो पूरी फिल्म में दो चार बार आपको रोमान्च अर्थात गूज़ बम्प अवश्य होंगे. दो चार जगह तो आप भूल ही जाएंगे कि आप एक फिल्म देख रहे हैं – और यहीं फिल्म की प्रस्तुति की विजय होती है.

कुछ संवाद फिल्म के अविस्मरणीय रहेंगे, यथा – ”जिस देश की महिलायें मजबूर रहेंगी वो देश कैसे मजबूत हो सकता है?” या फिर ये – ”चुनाव वोटों से नहीं लोगों से जीते जाते हैं” या फिर ये – काम कीजिये वोट पीछे चले आएंगे !!” शायद मोदी की ये फिल्म लोगों को इतना पसंद आने वाली है कि मोदी बायोपिक का सीक्वल भी बन जाए तो वे देखने ज़रूर आएंगे और अपने आसपास लोगों को भी देखने के लिए कहेंगे – वजह बहुत साफ़ है – एक आम इंसान कामयाबी की सबसे ऊंचे पायदान तक कैसे पहुँच सकता है – मोदी इसकी ज़िंदा मिसाल हैं !!

तारीफ़ की जानी चाहिए संदीप कुमार की जिन्होंने ये फिल्म बहुत चाहत के साथ प्रोड्यूस की और तारीफ़ उमंग कुमार की भी करनी होगी कि उन्होंने भी विवेक ओबरॉय की तरह ही संदीप पर और उनके विषय पर विश्वास किया.

38 दिनों में बनी इस फिल्म में मोदी के उल्लेखनीय साहस, बुद्धिमत्ता, धैर्य, समाज के लोगों के प्रति समर्पण एवं एक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में उनके कौशल को दिखाया गया है, उनके नेतृत्व ने गुजरात और बाद में भारत में सैकड़ों सामाजिक परिवर्तनों को प्रेरित किया. यह 1950 के दशक में उनके बचपन से लेकर राजनीति के गलियारों में उनके उल्‍लेखनीय उदय तथा चार-बार सेवारत मुख्‍यमंत्री रूप में मोदी के सफल आयाम का सरल और संक्षिप्त चित्रण है. यह फिल्म विश्व राजनीति के सबसे आकर्षक और सफल चुनाव अभियानों में से एक का भी चित्रात्मक प्रदर्शन करती है जब 2013-14 में मोदी ने सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त करते हुए भारत के प्रधानमंत्री पद पर पहुंच कर राष्ट्रवाद का गौरव बढ़ाया.

फिल्म के निर्माता के रूप में जहां संदीप कुमार हैं वहीं निर्देशन उमंग कुमार का है, फिल्म के प्रमुख चरित्रों में बोम्मन इरानी एवं जरीना वहाब हैं तो पटकथा और संवाद का काम संदीप और विवेक दोनो ने मिल कर सम्हाला है. पांच अप्रेल को रिलीज़ न हो सकी यह फिल्म आने वाले शुक्रवार याने 24 मई को बायोपिक भी सफल फिल्म बन सकती है – का मजबूत उदाहरण सिद्ध होगी.

बात सही है जो कि फिल्म निर्माताओं ने प्रीमियर के इंटरवल पर कही कि मोदी का चरित्र और उनके जीवन का कथानक इतना विशाल है कि सबको एक दो घंटे की फिल्म में समग्रता के साथ सहेजना लगभग नामुमिकन सा है. ये बात स्वयं मोदी जी से या मुझसे बेहतर कौन जान सकता है क्योंकि मैंने भी उनके के जीवन पर एक पुस्तक लिखी है – मैं नरेंद्र मोदी बोल रहा हूँ!!

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