मधुबन खुशबू देता है!

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येसुदास जिन्हें बप्पी लहरी ने ‘संगीत के लिए जीने वाला योगी ‘ कह कर पुकारा था !
संगीत के इस योगी ने हिंदी, मलयालम, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं के अलावा रूसी, लैटिन और अरबी भाषाओं में भी लगभग एक लाख से अधिक गाने और भजन गाए !
फलस्वरूप इस महायोगी की झोली हमेशा ही सम्मानों से भरी रही.
येसुदास को 7 नेशनल और 23 स्टेट अवार्ड मिले.
इनके गीतों को हमेशा ही विभिन्न मंचों से सराहना मिली .

साल 1997 में पद्म श्री, 2002 में पद्म भूषण और 2017 में पद्म विभूषण से नवाजे गए के.जे. येसुदास का जन्म 10 जनवरी, 1940 को कोच्चि में हुआ था. उनके पिता ऑगस्टाइन जोसेफ भी एक प्रसिद्ध थियेटर कलाकार और गायक थे. ऑगस्टाइन की ही दिली इच्छा थी कि उनका सबसे बड़ा बेटा पार्श्वगायक बने और यह सपना पूरा भी हुआ !

उनके गायन के लिए अवार्ड मिलने का सिलसिला कुछ यूं निकल पड़ा कि 1987 में येसुदास को यह आग्रह करना पड़ा कि अब उन्हें और कोई अवार्ड न दिया जाए !

येसुदास के गाए किसी भी गीत को सुनना मानो , सुनते -सुनते गुलाब, मोगरे, धूप-दीप, नैवेद्य की खुशबू कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर आत्मा को महकाना!
अक्सर यह कहा जाता है कि अमुक गायक की आवाज़ इतनी मीठी है कि जिसे सुनकर कानों में शहद और मिश्री सी घुल जाती है !
लेकिन येसुदासजी की आवाज़ के विषय में मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि मिठास के साथ-साथ उनकी आवाज़ में एक सुगंध भी है !
और मुझे यकीन भी है कि मेरी इस राय से कई लोग इत्तेफाक रखते होंगे !

हिंदी फिल्मों में येसुदासजी का सबसे पहला गीत 1971 में आई फिल्म ‘छोटी सी बात ‘ का ‘जानेमन जानेमन तेरे दो नयन’ था !
इसके अलावा उनके और भी कई गीत प्रसिद्ध हुए जैसे ‘गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा ‘, आज से पहले आज से ज्यादा ‘, ‘जब दीप जले आना’, ‘सुरमई अँखियों में ‘, चाँद जैसे मुखड़े पे ‘ और सर्वाधिक प्रसिद्ध गीत ‘मधुबन खुशबू देता है’आदि !

संगीत के इस योगी द्वारा गाया गीत ‘मधुबन खुशबू देता है ‘ अपने बोलों की ही तरह कुछ ऐसा है कि जिसे सुनने वाला इसकी सुंगंध से भीतर तक महक जाता है!

यह गीत 1978 में आई फिल्म ‘साजन बिना सुहागन ‘का है. इस गीत का संगीत उषा खन्ना का है, गीतकार अमित खन्ना हैं .
इस गीत को सुनते-सुनते न जाने क्यों हम एक ऐसी दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हर छल, ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार,स्वार्थ आदि से परे है!
कुछ तो इसके बोल और ऊपर से येसुदास की समूचे ब्रहमांड को गूंजायमान करती एक बेहद ठहरी हुई संजीदा गायकी , जो हमें महज़ 5 मिनट में ही जीवन में निस्वार्थ सेवा एवं परोपकार की भावनाओं से ओत-प्रोत कर देती है!
वो भावनाएं जिन्हें घंटों के लंबे सैशन्स के बाद भी बड़े-बड़़े योगी,महात्मा हमें समझाने में विफल रहते हैं !
कि ~
‘मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है!

सूरज न बन पाए तो, बनके दीपक जलता चल
फूल मिलें या अँगारे, सच की राहों पे चलता चल
प्यार दिलों को देता है, अश्कों को दामन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है !
मधुबन …!
चलती है लहराके पवन, के साँस सभी की चलती रहे
लोगों ने त्याग दिये जीवन, के प्रीत दिलों में पलती रहे
दिल वो दिल है जो औरों को, अपनी धड़कन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है
मधुबन …!’

परोपकार एक ऐसी भावना है जिसे जीवन में अपनाकर ही कोई व्यक्ति महान बन सकता है.
परोपकार का अर्थ है बिना किसी स्वार्थ के औरों का उपकार. यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि ईश्वर द्वारा बनाई गई इस सृष्टि का कण-कण परोपकार की भावना से भरा हुआ है !
जैसे कि कहा भी गया है कि –
‘तरुवर फल नहीं खात है, नदी न संचै नीर।
परमारथ के करने, साधु न धरा शरीर।।’
अर्थात् कोई भी वृक्ष कभी अपना फल नहीं खाता. सभी नदियां, मनुष्य, पशु -पक्षी, एवं पेड़ पौधों को जीवन देने के लिए नि:स्वार्थ बहती रहती हैं.
सूर्य भी प्रतिदिन निस्वार्थ भाव से सभी को ऊर्जा प्रदान करने के लिए उदित होता है।
हवा, प्राण, वायु बनकर हम सभी को नवजीवन प्रदान करने को सदैव तत्पर रहती है.
रात के अंधकार में चन्द्रमा अपनी रौशनी से पूरे जग को रौशन कर शीतलता प्रदान करता है .
इस गीत का यही मर्म है कि केवल अपने विषय में न सोचकर हमें सदैव दूसरों के भले के लिए कार्य करने को तत्पर रहना चाहिए.

आज जब अपने चारों ओर नज़र दौड़ाते हैं तो पाते हे़ैे कि सांस्कृतिक मूल्य निरंतर गिर रहे हैं .पुराने संस्कार अब कहीं नज़र नहीं आते.असहिष्णुता पूरे समाज को खोखला कर रही है.
हमें याद रखना ताहिए कि हमारी संस्कृति हमेशा से ही परोपकार, पवित्रता एवं उदारता आदि मूल्यों से संपन्न रही है. हमें इन मूल्यों को अपने जीवन में उतारना होगा.
परोपकार करने के लिए ज़रूरी नहीं कि हमें कुछ बड़ा करने की आवश्यक्ता है . हमारे पास चाहे जो भी , जैसे भी, जितने भी सीमित साधन हों ,हम उनसे ही परोपकार कर सकते हैं.
‘सूरज न बन पाए तो, बनके दीपक जलता चल!’
येसुदास के इस गीत का संदेश बस यही है कि केवल परोपकार द्वारा ही हम एक स्वस्थ समाज का विकास कर सकते है। परोपकार की भावना ही हमारे जीवन को महान बनाती है।

न जाने क्यों जब इस गीत की चर्चा यहां कर रही हूं तो इस फिल्म और कलाकारों के विषय में बात नहीं कर पा रही हूं क्योंकि मेरा यह मानना है कि इस गीत में येसुदास की आवाज़ ने इस गीत से जुड़े बाकी सभी पहलुओं को काफी पीछे छोड़ दिया है.

किसी भी गीत के लिए इससे बड़े सम्मान की और कोई बात हो ही नहीं सकती कि कोई गायक उस गीत को यूं जी कर, अपने स्वर में कुछ इस प्रकार कैद कर ले कि कोई और फिर छुड़ा न पाए !

संगीत के योगी वैसे तो धर्म से इसाई हैं ,लेकिन यह वाकई रोचक तथ्य है कि आज भी उनके द्वारा गाए ‘हरिवर्षनम’ की धुन पर हर शाम सबरीमाला मंदिर के पट बंद होते हैं.
लगभग पाँच दशकों तक हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख और इसाईयों के लिए लाखों गीत और भजन गाकर ,इतने अवार्ड और सम्मान पाने वाले येसुदास की एक इच्छा आज भी अधूरी है और वो है गुरुवयूर श्री कृष्ण मंदिर में भजन गाने की, क्योंकि वहां गैर हिंदुओं का जाना मना है !
ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी यह इच्छा पूरी करने का कोई न कोई जतन अवश्य करें और गीतों भरे मधुबन में संगीत के योगी येसुदास यूंही अपने स्वर की सुगंधी चहुंओर बिखेरते रहें !

(सुज्ञाता)

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