मस्तानी और रंग

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बाजीराव मस्तानी फिल्म का सर्वााधिक तालियां बटोरने वाला एक दृश्य सदा अविस्मरणीय रहेगा..

आज शनिवारवाड़ा बिल्कुल किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ है , अट्टालिकाएं असंख्य दीपों और पुष्पों से सुसज्जित होकर इठला रही हैं , चारों ओर से आती मंगलगान की लहरी
‘गोविंद ध्या बाई गोपाल ध्या -गोविंद ध्या बाई गोपाल ध्या !’ तालियों और हंसी ठिठोली के स्वर में घुलमिल कर कानों में घुंघरू की तरह बज रही हैं!

और हो भी क्या न ? आखिर आज पेशवा बाजीराव बल्लाड़ और काशीबाई के पुत्र का नामकरण संस्कार जो है!

काशीबाई चेहरे पर एक गर्वीली मुस्कान लिए फूलों से सुसज्जित पालने में लेटे नवजात को बड़े ही प्यार से निहारते हुए झूला झुला रही है !

तभी अंबाजी पंत आकर समारोह को शुरू करने के लिए पुकारते हैं !
अंबाजी पंत – “मुहूर्त निकला जा रहा है , भिऊबाई नाम रखना तो बुआ का अधिकार है , और कितना इंतज़ार कराओगी?”
काशीबाई खिलखिलाते हुए -“अच्छा , बता दो नाम!”

उल्लासमय माहौल के बीच काशीबाई, भिऊबाई को बच्चे के कान में नाम फुसफुसाते हुए पीठ पर हल्की हल्की धौल जमाने की रस्म अदायगी करते हुए मुंह से हुर्र -हुर्र की आवाज़ निकाल कर मीठी चुहल करती है !

अंबाजी पंत -“हां तो बताइए क्या नाम रखा आपने ?”
भिऊबाई – “रघुनाथ !
अंबाजी पंत -वाह ! रघुनाथ !”
चारों ओर रघुनाथ-रघुनाथ का नाम गूंज उठता है!
भिऊबाई ,”राव होते तो नाम सुनकर खुश हो जाते!”

काशीबाई ममताभरी दृष्टि बच्चे पर डालते हुए उसे कलेजे से लगा कर कहती है “मेरा रघुबा!”

कृष्णाजी भट्ट -“अच्छा नाम रखा है मां साब!”

तभी किसी के आने की आहट से शनिवारवाड़ा में सन्नाटा छा जाता है , हंसी खुशी का वो माहौल अचानक शांत हो जाता है.
सभी की नज़रें सामने से आती मस्तानी बाई पर पड़ती हैं जो हाथ में सौगात का थाल लेकर बड़ी ही प्रसन्नता से शनिवारवाड़ा में पधार रही हैं !

चीमाजी-“आइए- आइए सही मौका ढूंढ कर आई हैं | आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई!”
कृष्णाजी भट्ट हिकारत भरी नज़रों से मस्तानी बाई को देखते हुए कटाक्ष करते हुए कहते हैं “मां साब कोई इंसान इतना नीचे कैसे गिर सकता है कि बार- बार अपना अपमान कराने चौखट पर आ जाए ?”

मस्तानी बाई कनखियों से थोड़ी सख्त नजरों से कृष्णाजी भट्ट और चीमाजी को देखते हुए कहती हैं कि ,”चौखट भी अपनी और लोग भी अपने और अपनों से अपमान का कैसा डर ? हम तो राव की गैर-मौजूदगी में राव के बेटे को आशीर्वाद देने आए हैं !”

जवाब सुनकर चीमाजी और कृष्णाजी भट्ट तिलमिला जाते हैं!
मां साब भी थोड़ा असहज हो जाती हैं .
काशीबाई के चेहरे से उल्लास की जगह अचानक अनचाहे भय ने ली है.

चीमाजी -“आशीर्वाद देने आई हो या रिश्तों की भीख मांगने आई हो ?”

इतना सब सुनने के बाद भी मस्तानी की आंखों में अत्यंत उल्लास और गर्व के भाव हैं , मानो कहना चाह रही हों कि मैं अपना फर्ज़ निभाने आई हूं , बाजीराव जो मेरे प्राणप्रिय हैं मैं उनके पुत्र के प्रति भी वैसा ही निश्छल प्रेम रखती हूं जितना अपने पुत्र के लिए ..और खुशी से चहकती हुई कहती हैं ,”राव की गैर-मौजूदगी में हम बच्चे के लिए सौगात लेकर आए हैं!”

चीमाजी मस्तानी की इस जुर्रत पर तिलमिला कर कहते हैं कि ,”खुशामद करके पेशवा परिवार में शामिल होना ही था तो केसरिया रंग के कपड़े ले आती , सौगात में ये हरे रंग का विष लाने की क्या ज़रूरत थी ?”

मस्तानी बेहद सख्ती से ऐतराज जताते हुए चीमाजी की आंखों में आंखे डालकर कहती है “ये सच है कि हर धर्म ने एक रंग को चुन लिया है लेकिन रंग का तो कोई धर्म नहीं होता |हां कभी-कभी इंसान का मन काला ज़रूर हो जाता है जो उसे रंग में भी धर्म दिखाई देता है|”

उधर कृष्णाजी भट्ट जो कि खुद को धर्म के सबसे बड़े प्रकांड पंडित और जानकार मानते हैं , मस्तानी के इस जवाब से तिलमिला जाते हैं और कहते हैं “राहा दे, चीमाजी ये किसके मुंह लग रहे हो ?ये दुर्गा और दरगाह के बीच का फर्क ही भूल गई है|”

मस्तानी यहां भूल जाती है कि वो भारत के प्रकांड पंडित कृष्णा जी भट्ट , जिसके सामने देश के बड़े-बड़े राजा-महाराजा झुकते है , की आंखों में आंखे डाले बहस कर रही है .
इस दृश्य में एक बड़ी बात गौर करने वाली यह भी रही कि सदियों से ही धर्म के बड़े-बड़े प्रकांड पंडित, मौलवी-मुल्ला केवल अपनी दुकानें चलाकर किसी न किसी धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं .

इनके तर्कों को यदि हमने शुरुआत से ही अपने तर्कों की कसौटियों पर जांच-परख कर जीवन में उतारा होता तो आज यह धर्म,कर्म,जात-पात, रंग-भेद की राजनीति हमारे देश को दीमक की तरह यूं खोखला न कर रही होती !

जैसा कि मस्तानी ने किया और रंगों पर सियासत करने वालों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए आगे कहा, “और आप शायद ये भूल गए हैं कि दुर्गा की मूर्ती को सजाते वक्त हरे रंग का चूड़ा, हरे रंग का शाल और हरे रंग की चोली पहनाते हैं | दरगाह में बड़े बड़े पीर-फकीरों की मज़ार पर केसरिया रंग की चादर चढ़ाते हैं, तब तो रंग का ख्याल नहीं आता!”

और बस फिर क्या था , काशीबाई उर्फ दीपिका पादुकोण के इस डायलाग के साथ ही दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट जो शुरू होती है तो फिर थमने का नाम नहीं लेती !

हां , लेकिन फिल्म थी , देख आए, डायलाग बढ़िया लगे , फिर भूल गए !

और साथ ही यह भी भूल गए कि फिल्में हमारे ही जीवन का आईना होती हैं लेकिन हम उस आइने में झांक कर देखना और समझना नहीं चाहते !

बाजीराव मस्तानी के इस दृश्य में हमारे देश की राजनीति को भी एक प्रकार से आइना दिखाया गया जो रंगों की सियासत में उलझी हुई है! जिसका ताज़ा उदाहरण है भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी का भगवा रंग !

यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है जो आज भी ये इंद्रधनुष के खूबसूरत रंग सफेद,भगवा, नीला, हरा और लाल रंग केवल सियासत का चेहरा-मोहरा भर बन कर रह गए हैं!

रंगो की सियासत इस कदर उफान पर है कि यहां जो भी सरकार सत्ता में आती है वह सबसे पहले अपनी विचारधारा या पार्टी के रंग में हर सरकारी संपत्ति को रंग देती है.

और तो और गले में भगवा, लाल और नीले पटकों और कपड़ों के रंगों से लोग आसानी से यह समझ जाते हैं कि अमुक व्यक्ति किस दल या विचारधारा का समर्थक है !
शायद यही राजनीति की वह कलर थैरेपी है जो जनता की नब्ज़ पकड़ कर किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने का दमखम रखती है !
ये तो सब जानते हैं कि रंग चाहे कोई भी हो वह हमारे जीवन का एक खूबसूरत और महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं !सोचिए यदि कोई भी एक रंग यदि हमारे जीवन में न रहे तो जीवन कितना बेरंग हो जाएगा न!
और यदि हम किसी एक ही रंग को अपने जीवन का हिस्सा बना लेंगे तो भी जीवन बदरंग हो जाएगा.
हर रंग अपने आप में किसी न किसी भाव को समेटे होता है
कोई एक रंग जहां खुशियों का प्रतीक होता है, वहीं दूसरा कोई रंग शांति का प्रतीक होता है .कोई रंग त्याग का प्रतीक होता है तो कोई रंग शौर्य का प्रतीक होता है. 
लेकिन बहुत दुख की बात है कि आज हमारे देश में इन रंगों के पीछे छिपे भावों को नज़रअंदाज़ कर केवल धार्मिक उन्माद भड़काकर राजनैतिक हित साधने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है!
मैं बस एक बात जानती हूं कि अगर ईश्वर की मंशा रत्ती भर भी हमें अलग अलग रंगों में बांटने की होती तो वह हम सबके लहू का रंग लाल न रखकर अलग-अलग रखता !
रंगों की महिमा के संदर्भ में मस्तानी बाई का कहा गया हर शब्द यदि तालियां बजाते समय अपने दिलों की गहराई में भी उतार लें तो भारतीय राजनीति और धर्म के ठेकेदारों की मनमर्जी को काफी हद तक रोका जा सकता है !
क्योंकि हरे और भगवे की रस्साकशी के बीच यही सच है कि-
“माना कि हर धर्म ने एक रंग को चुन लिया है 
लेकिन रंग का तो कोई धर्म नहीं होता !”
और हां , 
“वैसे मुझे न तो भगवा पसंद है न हरा !
मेरी पसंद तो है काला , श्याम सलोना!”

(सुजाता गुप्ता ‘सुज्ञाता’)

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