अयोध्या भूमि विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने माना ASI को खुदाई में मिले थे मंदिर के सबूत

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अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से विवादित ज़मीन रामलला विराजमान को सौंप दी है और केंद्र सरकार को मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है. वहीं भूमि-विवाद में मुस्लिम पक्ष के दावे को खारिज करते हुए उसे वैकल्पिक ज़मीन देने का निर्देश दिया है. साथ ही निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज़ कर दिया है. इसी के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जिस रिपोर्ट ने रामलला विराजमान के पक्ष में दावे को मजबूत किया उसे ही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने खारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आर्कियालॉजकिल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट को भी आधार माना और उसके सबूतों को खारिज़ नहीं किया.

कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को वैध माना और कहा कि एएसआई को खुदाई में जो मिला वह इस्लामिक ढांचा नहीं था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एएसआई को विवादित जगह की खुदाई में मंदिर मिलने के सबूत मिले हैं. हालांकि रिपोर्ट मे ये नहीं बताया गया है कि ढांचा तोड़कर मस्जिद बनी. साथ ही कोर्ट ने रिपोर्ट की इस बात को भी वैध माना कि मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनाई गई.

दरअसल, साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद जब ये मामला अदालत की चौखट में गया तो ये दलीलें दी गईं कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई. जिसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ASI  को विवादित स्थल की खुदाई करने का निर्देश दिया. ASI ने साल 2003 में विवादित जगह की खुदाई शुरू की और दो महीने की खुदाई के बाद अपनी रिपोर्ट अगस्त 2003 में हाईकोर्ट को सौंप दी. इस खुदाई में बहुत सारी चीज़ें मिलीं तो बातें भी सामने आईं.

खुदाई में ASI को क्या क्या मिला

ASI ने अपनी रिपोर्ट में खुदाई के दौरान खम्भे मिलने का ज़िक्र किया. इसके अलावा खुदाई में दो कब्रें मिलने की भी बात की. जिस पर मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि कब्र मिलने से इलाके में मुस्लिम आबादी होने के सबूत मिलते हैं. मुस्लिम दावे का विरोध करते हुए हिदू पक्ष ने उन कब्रों को संतों की समाधि बताया और कहा कि कई हिंदू संतों ने ज़मीन के भीतर समाधि ली है और ये कब्र उन्हीं की हैं. इसके अलावा खुदाई के दौरान राम चबूतरे के नीचे दो चबूतरे भी मिले. साथ ही नक्काशी किए हुए पत्थर, मानव और पशु आकृतियों वाले टेराकोटा के तराशे पत्थर, पेड़ और मोर की तस्वीर वाली ताम्बे की मुहरें और कई अंकित पत्थर मिले. एएसआई ने वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर ये दावा किया कि उसे प्रचीन मंदिर के अवशेष मिले.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ASI को खुदाई में मिले सबूतों को खारिज़ नहीं किया जा सकता है.

एएसआई की रिपोर्ट से विहिप और आरएसएस के उन दावों को बल मिला कि अयोध्या में विवादित ज़मीन पर बाबरी मस्जिद से पहले एक बड़ा ढांचा हुआ करता था. हालांकि एएसआई की रिपोर्ट के बाद उस पर सवाल उठाए गए. उस वक्त ये भी कहा गया कि तत्कालीन केंद्र की वाजपेयी सरकार के दबाव में रिपोर्ट इस तरह की बनाई गई. सुन्नी वक्फ बोर्ड ने रिपोर्ट पर विरोधाभासी होने के आरोप लगाए. दरअसल, सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दो स्वतंत्र पुरातत्वविदों को शामिल किया था जिनमें एक सुप्रिया विराम थीं और दूसरी जया मेनन. ये दोनों शोधकर्ता एएसआई के सर्वेक्षण के दौरान मौजूद थीं और उन्होंने एएसआई के सर्वेक्षण पर अलग से एक शोध पत्र जारी कर कई सवाल खड़े किए थे. लेकिन साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ASI की ही रिपोर्ट को आधार बनाते हुए विवादित ज़मीन के हिस्से को रामलला विराज़मान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बराबर बराबर बांट दिया था.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट की वैज्ञानिक प्रमाणिकता पर सवाल उठाए. जिस पर जस्टिस एस ए नजीर ने एएसआई रिपोर्ट की वैधता पर सवाल उठाने पर मुस्लिम पक्षों को फटकारा और कहा कि एएसआई की रिपोर्ट को किसी अन्य राय जैसा नहीं माना जा सकता और कहा कि न्यायाधीशों के निर्देश पर ही विवादित स्थल पर खुदाई की गई. जिस पर मुस्लिम पक्ष की तरफ से पैरवी कर रहे वकील राजीव धवन ने कोर्ट से कहा कि वो ASI की रिपोर्ट पर सवाल उठाना नहीं चाहते.

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष ने ASI रिपोर्ट पर दलील पेश करते हुए कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में पुराने ढांचे को विध्वंस करने की बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने भी ये माना कि ASI की रिपोर्ट ये साबित नहीं कर पाई है कि ढांचा तोड़कर मस्जिद बनी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इतिहास जरूरी है लेकिन कानून सबसे ऊपर है. संविधान की नजर में सभी आस्‍थाएं समान हैं और कोर्ट आस्‍था नहीं सबूतों पर फैसला देती है. आस्‍था पर जमीन के मालिकाना हक का फैसला नहीं होता है. सीजेआई रंजन गोगोई ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि सभी धर्मों को समान नजर से देखना सरकार का काम है. अदालत आस्था से ऊपर एक धर्म निरपेक्ष संस्था हैं.

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