आसान नहीं होता लड़की होना

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परदादी जिनकी खुशियों में उनसे मतभेद रखने वाली महिलाएं जली-भुनी जाती थीं वे एकत्र होकर कसीदे पढ़ने लगीं थीं। मेरे गाँव के घर में मातम सा था। परदादी दादी को पुत्री पैदा करने के लिए ताने सुनातीं। मगर इन सभी दर्द को नजरअंदाज कर मेरी दादी नन्हीं सी बुआ के लिए लोरियाँ गाती रहतीं। दूसरी बुआ के पश्चात् पुत्र कामना में दो बुआ और आ धमकीं। अब तो परदादी से लेकर खानदान के सभी सदस्य मेरी दादी से पुत्र होने की इच्छा को होम कर चुके थे। सीधी-सादी दादी न जाने कितने तानों और व्यंग्य के दंश झेलती रहीं

सन् १९९० में पुत्र कामना की एक और चेष्टा सफल हुई। मेरे पिता जी का जन्म हुआ। दादा-दादी के खुशियों का ठिकाना न रहा। इस बार गाँव में पुनः पर्व का माहौल बना। इस बार सबकुछ सत्य था। मेरी दादी पुत्र जन्म से शायद उतनी खुश नहीं होंगी जितना कि उनके कोख पर उठते प्रश्नचिह्न बदलकर हुई होंगी। अब जब मै जन्म लेने वाली हूँ तो बुजुर्गों में परदादी जीवित हैं। मेरे दादा-दादी, चारो बुआ और मेरे पिता जी कभी चर्चा तक नहीं किए कि मै पुत्र रहूँ या पुत्री। हलाँकि मेरी परदादी सदा अपनी कामना जाहिर करती रहती हैं कि उन्हें बस प्रपौत्र ही चाहिए। गाँव से लेकर तमाम रिश्तेदारों के जितने भी फोन आते हैं सभी ने एक पुत्र होने की इच्छा जताई है बल्कि कुछेक ने दावा भी कर दिया है।

माँ के गर्भ में आए मुझे नौ महीने बीत चुके हैं। परदादी को और उनलोगों को जो पुत्र होने की भविष्यवाणी कर रहे उन्हें कैसे समझाऊँ कि मेरा निर्माण एक पुत्री के रूप में हो चुका है। लड़की बनकर जन्म लेने में कितना भय हो रहा मुझे। अपनी पीड़ा कैसे उजागर करूं। एक लड़की बनकर जन्म लेना ही नहीं अपितु गर्भ में आना ही कितना दुःखद है।

गर्भ के पाँचवे से आठवें महीने के मध्य बहुत दुख झेली लेकिन मेरे पिता दिन-रात एक करके मेरी माँ का ख्याल रखते हैं। मेरे दादा-दादी बिना किसी स्वार्थ के बस मुझे स्वस्थ्य जन्म लेते देखने के लिए उतावले हैं। इन सबके कारण मेरा हौसला बढ़ा है। मुझे परदादी के लिए चिन्ता है किन्तु बाकी सभी की अंक में किलकारी भरने को उतावली हूँ। मै भाग्यशाली हूँ मेरे माता-पिता नेक ख्याल के हैं। मेरे पिता तो मेरे जन्म लेने से पूर्व ही मेरी माँ से वायदा कर चुके हैं कि यदि पुत्री हुई तो मेरी शान होगी और विधाता का स्वांग देखिए मेरा जन्म मेरे पिता के जन्मदिन के दिन सुनिश्चित हुआ है।

आज बाइस नवम्बर २०१९ है। दिन के साढ़े दस बजे मेरा जन्म हो चुका। मै दर्द से चीख रही हूँ। मुझे उल्टा लटकाकर पीटा जा रहा किन्तु यह मेरे भले के लिए है इसलिए बहुत डरी नहीं हूँ। एक भय जो महसूस कर रही हूँ वह मेरी माँ के भीतर चल रहा। वे प्रायः मेरे पिता के पुत्री की चाह पर भरोसा नहीं कर पा रहीं। डाॅक्टर ने मुझे उठाकर मेरी माँ से बड़ा कठिन प्रश्न किया है शायद- ”बताओ क्या हुआ है” मेरी माँ मेरे जननांग देख अश्रुपूर्ण नजरों से हु्हकारी भरती हैं। उन्हें भय मेरे पिता से है और अब मै भी शंका में हूँ। प्रश्न पुनः दुहराया जा रहा और मै पुनः कह रही कि लड़की बनकर जन्म लेना कितना कठिन है। मुझे साफ-सुथरा करके एक बेंच पर रखा गया है। मेरे पिता को भीतर बुलाया जा रहा है और जैसे-जैसे उनके कदम मेरे नजदीक हो रहे मै थरथर काँप रही हूँ! मुझे अभी बोलने की आजादी नहीं बस रोने की कला मात्र है और मै जी जान से रो रही हूँ। क्या मेरे पिता मेरे रूदन से पिघलेंगे? और बस चन्द ही पल बीते कि मै जैसे किसी सिंहासन पर बैठी हुई महसूस करने लगी हूँ। डाक्टरों ने मेरे पिता से भी वही प्रश्न किया है कि देखकर बताओ लड़का है या लड़की लेकिन मेरे पिता मेरी माँ से बहुत सरल दिखे। वे जननांग देखे बिना ही मुझे पहचान गये। जब से गोंद में हूँ उनका ओष्ठ मेरा मस्तक सटे हुए हैं। मेरे पिता के इस भावना पर मेरी माँ भी हँस पड़ी है। मेरा भय समाप्त हो गया।

एक लड़की मेरी परदादी हैं जिनकी तीन बहनें थीं, तीन पुत्रियाँ हुईं किन्तु मेरी दादी के चार पुत्री होने पर वही सबसे अधिक ताने सुनाती थीं। परदादी को पौत्र न होने पर उनके साथ व्यंग्य गढ़ने वाली महिलाएं भी तो लड़की थीं। विडम्बना है कि पुत्र जन्म पर हम लड़कियां थाली पीटें और सोहर भी गाएं किन्तु लड़की के जन्म पर वही लड़कियां मौन रह जाती हैं। यह दोहरा बर्ताव खत्म होना चाहिए। आज की पीढी में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, आशा है लड़कियों का भविष्य उज्ज्वल और सुखद होने वाला है।

मेरा नाम ‘माही’ रखा गया है अपने पिता की शान हूँ, अपनी माँ की जान हूँ। लड़की बनना कितना कठिन है, कितना आसान यह लड़की से अधिक उसके परिवार की संकीर्ण अथवा सकारात्मक सोच पर निर्भर करता है।

मै एक लड़की तो नहीं किन्तु अपनी पुत्री जैसा बन, कल्पना से यथार्थ कुरेदने का प्रयास किया हूँ। त्रुटिओं के लिए क्षमा चाहूंगा।

(विवेक त्रिपाठी)

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