क्या गांधी खलनायक भी थे?

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सबसे पहले तो ये बात साफ़ करनी होगी कि जैसा कांग्रेस ने प्रचारित किया है कि आज़ादी के पहले सारा देश गाँधी के पीछे खड़ा था, सही नहीं है. और ऐसा क्यों इसके कारण जगजाहिर हैं. सिर्फ अहिंसा का अंध-आदर्शवाद ही इसकी वजह नहीं है बल्कि अपने-आप को देश का इकलौता नेता बनाये रखने के लिए किये गए उनके कुछ काम भी उनकी छवि को दाग-दार बनाते हैं. सेक्स को लेकर किये गए उनके प्रयोग और उससे जुड़े हुए विवाद भी उनको कांग्रेस द्वारा प्रदान किये गए ‘महात्मा’ के उपनाम पर बट्टा लगाते हैं.

किन्तु इस देश की जनता ने न तब न अब गांधी के एक कृत्य को स्वीकृति प्रदान की और उस कारण ही  उनकी स्वार्थी ‘नैतिकता’ का पर्दाफ़ाश हो गया. यदि सिर्फ नेहरू के प्रति अंध-प्रेम होता तो भी चल जाता, नेहरू भी तो उनसे अपना मतलब साध रहे थे. दोनों एक दुसरे को समर्थन देकर देश के सबसे बड़े तथाकथित नेतृत्व बन बैठे थे. नेहरू की राजनीतिक महात्वाकांक्षा ने तो साड़ी हदें पार कर दी थीं वहीं दूसरी तरफ उनको समर्थन देने वाले गांधी ने भी नैतिकता को भी तथाकथित नैतिकता में परिवर्तित कर डाला था. बात देश के बंटवारे की भी होती जिसके लिए गांधी सीधे सीधे ज़िम्मेदार थे तो वह भी चल जाती क्योंकि पिछले सत्तर सालों में कांग्रेस ने देश की जनता का ध्यान गांधी के इस ऐतिहासिक ‘अपराध’ से हटा कर उनके नाम के गुणगान की तरफ इतना ज्यादा कर दिया था कि महंगाई और समस्याओं की मारी भारत की जनता कभी ध्यान से इस बात पर ध्यान देने का समय ही नहीं निकाल पाई. सारे देश में इतना गाँधी-गाँधी कर दिया मानो देश की मिटटी के कण-कण में गांधी बेस हुए हैं. अगर देश की मिटटी के कण कण में गांधी थे, तो सुभाष बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, जैसे महान क्रान्ति-नायक कहाँ थे? वैसे जिन्हें नहीं पता उनको बताना ज़रूरी है कि पिछले सत्तर सालों में भारत में राज करने वाली कांग्रेस ने गांधी का जबरदस्त माहौल बना कर क्रांतिकारियों को इतना किनारे कर दिया कि यदि आज हम सुभाष, आज़ाद, भगत को याद करते हैं तो ये समझ लीजिये कि ये हमारे राष्टवादी संस्कार ही हैं, ये हमारा देशप्रेम ही है और ये हमारा उत्तम भारत नागरिक होने का प्रमाण भी है.

तो हम बात कर रहे थे कि कौन सा वह बड़ा कारण था जिसके लिए भारत के देशप्रेमी कभी गांधी को क्षमा नहीं कर सकते. आप समझ गए वह कारण. और आप सही समझे. गांधी ने क्रन्तिवीर भगत सिंह की फ़ासी नहीं रुकवाई जिसके लिए सारे देश के क्रांतिकारियों ने उनसे प्रार्थना की थी. उन्होंने गांधी से कहा था कि अंग्रेज़ों से साफ़ कह दीजिये, माफ़ी नहीं तो गांधी-इरविन समझौता भी नहीं. लेकिन गांधी ने शहीदे आज़म भगत सिंह के लिए फांसी रोकने की मांग नहीं की. उन्होंने कहा कि मैं किसी के भी द्वारा किसी भी रूप में की गई हिंसा को समर्थन नहीं दे सकता.  

23 मार्च को भगत सिंह को फांसी दे दी गई. और बड़ी बेशर्मी के साथ तीन दिन बाद ही कांग्रेस ने अपना महाअधिवेश आयोजित किया. कराची में आयोजित इस महाअधिवेश में जनता के क्रोध को भाँप कर गाँधी एक दिन पहले ही चुपचाप पहुंच गये. किन्तु बात फैलते देर न लगी और एक बड़ी भीड़ ने उनके तंबू को आ घेरा. लोगों की गुस्सैली भीड़ नारे लगा रही थी – खूनी कहाँ है..खूनी को बाहर निकालो !!
बड़ी मुश्किल से गाँधी को वहां से बचा कर निकाला गया. लेकिन उनके विरोध की लहर सारे देश में फैल चुकी थी. सिर्फ एक ही यह उदाहरण काफी है यह बताने के लिये कि गाँधी की एक आवाज़ पर सारा देश खड़ा हो जाता था, यह सच नहीं, एक सोचा-समझा रणनीतिक प्रचार था जो 2014 के पहले तक चलता आया था. यह उदाहरण इस बात का भी गवाह है कि जिस भारत के लाल भगत सिंह को सारा देश प्यार करता था, उससे ऊपर निकल जाने और उससे बड़ी छवि बनाने की क्षुद्र स्वार्थी महात्वाकांक्षा गाँधी को न महात्मा का संबोधन देने की अनुमति देता है न ही राष्ट्रपिता कहलाने का. 


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