जानते हो बलात्कार की शुरूआत कहाँ से होती है?

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#मेरे_मन_की_बात …..आज के परिप्रेक्ष्य में

जानते हो बलात्कार की शुरूआत कहाँ से होती है
बलात्कार तो सबसे आखिरी कुकर्म बनता है उस पुरूष का
पर शुरूआत होती है इसकी वहाँ से जिसे हर स्त्री हर बच्ची अपने बचपन से ही नज़रअंदाज़ करती है
और हाँ , आप भी , जो ऐसी कई घटनाओं को देखकर कतरा कर निकल लेते हैं
हाँ, सही सोंच रहे हैं आप
वह पहली बार स्कूल जाते समय उसका आपको घूरा जाना ,
बाजार जाते समय अनचाहे स्पर्श से गुजरना
जानें कितनी फब्तियाँ व अंगों के आकारों के बारे में गंदी बातें सुनना,
अश्लील गानों का गाड़ियों में सरेआम बजना,
पराये तो पराये ,अपने नज़दीकी रिश्तेदारों तक की हरकतों को बस झेलना
और भी जाने कितनी ही वारदातें
जिनका थोड़ा थोड़ा होता जाना पुरूष को निर्भीक बनाता है और वह बन जाता है एक बलात्कारी ….
अनकही सी, अनसुनी सी
जो मन की कितनी गहरी परतों के गर्त में दफन हैं
पर हम वही के वही

चुप ……#मौन व #शर्मिंदगीजो बुरा ना मानो तो इक बात कहूँ तुम सब से,

तुम स्त्रियाँ स्वयं जिम्मेदार हो अपने इन हालातों की
जरा सोंचों,
प्रकृति नें तुम्हे शक्ति का स्वरूप बनाया है सृजन करती हो तुम
तो तुमको ही विनाश लाने वाली प्रलयंकारी माँ काली का स्वरूप भी माना है
ममता दया करूणा से ओत प्रोत तुम्हारा ह्रदय गलत व असंगत पर हुँकार क्यों नहीं भरता
क्यों नहीं तुम काली बन विनाश लाती हो
क्यों नहीं इस धरा को राक्षसों व आततायियों से मुक्त करती हो
बोलो , क्यों नहीं तुम्हें अपनी शक्ति का है आभास
जो वो पहली बार तुम्हे घूरा था तो आँखें निकाल लेनी चाहिये थी
जो पहली बार तुम्हारे दुपट्टे को भरे बाजार हटाया था तब उसकी दोनों हाथे तोड़ देनी थी
उस जंबान को खींच कर बाहर कर देना चाहिए था जिसने तुम्हारे बारे में गंदी बात कही थी
हर वह कुकर्म जो तुम्हारी अस्मत पर आंच आती दिखी थी तो उसका अंत वहीं व उसी समय कर देना था , बिना समय गँवाए,

किसने तुम्हे अबला नारी बना दिया और तुम मान गई
किसने तुम्हे छुईमुई सी बनाना चाहा और तुम बन गई
आखिर किसने तुम्हे गूँगी तक बना दिया …
कहती क्यूँ नहीं …
कुछ कहो !!! …..आह ….पीड़ा तेरी

हाँ, समझ रही हूँ
आधार ही कोमलता पर रखी गई है सो तुम ना बोल पाओगी
पर क्या यह सब तुम्हे पसंद है
नहीं ना,
इस धरा पर तुम्हारा भी जीने का उतना ही हक है जितना पुरूष का
फिर घुटन व लोकलाज की चादर तेरे जिम्मे ही क्यों आई ….
सोंचों , समझो …..कुछ करो, बदलाव लाओ अपनी अस्मिता का ….

तुम्हारी चुप्पी ही पुरूष के अहं का कारण है , क्या घर क्या बाहर, हर जगह बस तुम्हारा मौन ही तुम्हे ले डूबता हैं, जो दूसरों पर आँच आती देखती हो तो आँखें बंद कर निकल जाती हो, क्यों नहीं तुम खुद ढाल बन जाती हो हर दुसरी स्त्री का , क्यों नहीं उसकी अस्मत अपनी अस्मत समझती हो ,
उसके दुख को अपना दुख समझती हो
संस्कारी होने का ठेका तुमने ही क्यों ले रखा है ….

आखिर दुर्गा को भी महिषासुरमर्दिनी बनना पड़ा था जब बात स्वयं उसकी अस्मिता पर आ पहुँची थी,
तो आज तुम क्यों नहीं बन पा रही हो दुर्गा का रूप
कोमलांगी कहलाने के भार से मुक्त हो , शस्त्र उठाओ ….
स्वयं काली बनो व अपनी बच्चियों को भी काली बनना सिखाओ
अब इस धरा का पुरूष तुम्हारे सौम्य रूप का अधिकारी नहीं, सो रौद्ररूप धरो, अपनी अस्मत बचाओ
तुम्हारी मौन स्वीकृति ही बलात्कार की हर घटना की जड़ है, तुम भी हो बराबर की भागीदार,

जो गर तुम ना कर पाओगी तो फिर आदिशक्ति का पुनः अवतरण होगा
वह देख रही है सब खामोशी से , वह सुन रही है हर चित्कार को ,
जो गर आज भी यह असंतुलन जारी रहेगा ,
तो प्रकृति को लेने होंगे कुछ कड़े निर्णय
कुछ ऐसा जो प्रलय ला देगी, कुछ ऐसा जो विनाश ला देगी
उस समय वह किसी एक का नहीं सोंचेंगी
प्रलयंकारी रूप प्रकृति का बहोत ही विभत्स होता है
वह रूप जो इस सृष्टि का समूल नाश कर देगा वह महामाया महालक्ष्मी महासरस्वती का रूप है
तो वहीं महाकाली व महामारी बन कर खुद की सृजित पृथ्वी को स्वयं उजाड़ देगी , सब नाश कर देगी …..
पुनः इक नई सृष्टि के सृजन हेतु ….
जो जीने लायक हो …..
और प्रकृति के कटघरे में स्वयं तुम खुद को पाओगी ,
इन बदलते हालातों की जिम्मेदार
हाँ तुम स्वयं ……

(श्वेता चंचल)

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