पीछे की चुनौतियां नए गृहमंत्री के सामने

चुनौतियां चाहे जितनी हों, ये चुनौतियोंं को भी पता है और उनको पैदा करने वालों को भी कि अमित शाह हैं, दास नहीं चुनौतियों के

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मोदी सरकार में अब प्रत्यक्ष रूप से भी अमित भाई शाह की नंबर दो की भूमिका हो गई है..

अमित शाह भी प्रधानंतंत्री मोदी की भाँति ही कर्मयोगी हैं. न वे खाली बैठना जानते हैं, न ही वे खाली बैठने देते हैं. देश को अपने नए गृहमंत्री के आगमन से न केवल प्रसन्नता है बल्कि उनकी उम्मीदें भी कई गुना और बढ़ गई हैं.

ज्योंही अमित शाह गृहमंत्री बने देश भर में उनकी प्राथमिकताओं को लेकर अटकलें लगाईं जाने लगी हैं. यद्यपि चुनौतियों की संख्या भी शाह के सामने कुछ काम नहीं हैं. किन्तु शाह तो शाह हैं. उन्हें समस्याएं अधिक पसंद आती हैं क्योंकि अपने बुद्धि-चातुर्य से वे समस्याओं का हल निकालने के लिए शुरू से ही मशहूर रहे हैं. अब चाहे वो जम्मू कश्मीर में धारा तीन सौ सत्तर हो या आर्टिकल 35 (A) हो.

वास्तव में नए गृहमंत्री के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती तो जम्मू कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव कराने की है. इसी अहम राज्य में धारा तीन सौ सत्तर और आर्टिकल 35 (A) की टेढ़ी खीर शाह की प्रतीक्षा कर रही हैं. वेसे असम में भी एनआरसी की बड़ी चुनौती भी उनसे उम्मीद लगाए बैठी है. 

इसी साल नवंबर में जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. इस तथ्य को दृष्टि में रख कर प्रदेश के इन चुनावों से पहले धारा-370 और आर्टिकल 35A पर गृह मंत्रालय की सोच राज्य की सियासत में फर्क ला सकती है. जैसी उम्मीद की जा रही है, शाह के गृह मंत्रालय सम्हालने के बाद अब धारा 370, 35A जैसे भाजपा एवं आरएसएस के महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार  किसी तरह का नरम रुख न अपनाने के लिए विवश होगी. 

यद्यपि केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर पिछले केंद्रीय कार्यकाल के दौरान सख्त रुख ही दर्शाया है. इसके बाद भी कश्मीर के युवा आतंकी संगठनों के प्रति झुकाव नज़र नहीं आ रहा है. पिछले वर्ष प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश के 191 युवा आतंकी संगठनों से जुड़े हैं. यहीं नहीं भारत पाक  सीमा पर  कड़ी निगरानी के बावजूद पाकिस्तान की ओर से होने वाली घुसपैठ कम नहीं हुई है. लेकिन अमित शाह से इन चुनौतियों के सामने घुटने न टेकने की ही आशा की जा रही है.

भाजपा के चाणक्य अमित शाह सादगी पसंद हैं और शतरंज, क्रिकेट तथा संगीत में गहरी रुचि रखते  हैं. अब उन्हें वास्तविकता के कठोर धरातल पर राम मंदिर और नक्सल समस्या से जूझना होगा. चुनावी रणनीति निर्मित कर उसके कार्यान्वयन के व्यावहारिक विशेषज्ञ अमित शाह अपने प्रशंसकों के बीच लौह पुरुष (सरदार पटेल) के नाम से भी विख्यात हैं. अब देश की जनता भी अपने नए गृहमंत्री से उनके आगामी अहम् निर्णयों पर इस विशेष उपाधि की उपयोगिता वाली अपेक्षा रखती है.

गृहमंत्रालय के भीतर कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल भी एक दिलचस्प जंग साबित होगी. बीजेपी और टीएमसी के टकराव के दरमियान गृह मंत्री के इस प्रदेश की मुख्यमंत्री को लेकर क्या रुख होगा औऱ इस प्रदेश में कानून व्यवस्था जैसे विशेष विषयों पर उनके साथ के आपसी सम्बन्ध क्या-क्या रंग दिखाएंगे, इस पर कुछ भी कहना  जल्दबाज़ी होगी.

पश्चिम बंगाल के हालात सिर्फ चुनावों के दौरान ही नहीं बल्कि बाकी समय भी आमतौर पर शांत नहीं रहते. यहां बीजेपी और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच टकराव आम बात है. इस प्रदेश से राजनीतिक हिंसा के समाचार प्रायः सुर्खियां बनते हैं. स्वयं अमित शाह की बात करें तो उनके खिलाफ भी टीएमसी ने यहां एक मामला दर्ज कराया हुआ है.

समस्त भारत भूमि में वैसे भी आंतरिक सुरक्षा गृहमंत्री के लिए गंभीरतापूर्ण दायित्व बना रहेगा. कश्मीर और कलकत्ता याने पश्चिम बंगाल अतिरिक्त रूप से बड़ी चुनौती सिद्ध हो सकते हैं. इसके साथ ही उन पर नक्सलवाद और माओवाद की समस्या से निबटने का भी दवाब रहेगा.

पूर्वोत्तर के इलाके की उपेक्षा भी करना भी देश के नए गृह मंत्री के लिए समझदारी नहीं होगी क्योंकि अब यहां भी आतंकवाद के कांटे उगने लगे हैं. यद्यपि सरकार की मानें तो पूर्वोत्तर में पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र में होने वाली हिन्सा में भारी कमी देखी गई है. ये बात भी यहां ध्यान देने योग्य है कि हाल में एनएससीएन-आईएम कैडर और सुरक्षा बलों के बीच कई टकराव भी हुए हैं.

ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं, अभी पिछले सप्ताह ही यहां आतंकियों द्वारा नेशनल पीपुल्स पार्टी के एक विधायक की हत्या अखबारों की सुरखी बनी थी. ज़ाहिर ही है कि एनआरसी के मसले पर विवाद की वजह से असम में तनाव बढ़ा है. मोदी सरकार और गृहमंत्रालय को युद्ध स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी भारतीय नागरिक एनआरसी से वंचित न रह जाए.

जिस दौरान लोकसभा चुनाव चल रहे थे तब पश्चिम बंगाल और असम को लेकर अमित शाह ने NRC पर कुछ  बड़े वक्तव्य दिये थे. अब गृह मन्त्री बनने के उपरान्त उन बयानों का कार्यान्वयन करना उनके लिये एक गंभीर विषय होगा.

बरसों से नक्सलवाद या कहें माओवाद देश के अलग-अलग हिस्सों से देश की शांति और सुरक्षा को चुनौती देता आ रहा है. गृहमन्त्री के तौर पर देश की आंतरिक सुरक्षा को प्राथमिकता पर यदि अमित शाह रखते हैं तो इतना तो तय है कि आगामी पांच वर्ष वे माओवादी हिंसा को पूरी तरह से कुचलने के प्रति दृढ़ संकल्पित रहेंगे. वैसे कुल मिला कर नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों पर हाल में हमलों में कमी आई है किन्तु इन हमलों का रूप अब अधिक घातक भी होता जा रहा है, जो गृह मंत्रालय हेतु चिन्तनीय विषय बना रहेगा अपने अंतिम बिन्दु के उपचार तक.

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