बच्चे मर रहे हैं राजस्थान में और किसान मर रहे हैं महाराष्ट्र में

नवम्बर 2019 में महाराष्ट्र में तीन सौ किसानों ने आत्महत्या की और उस समय यहां के नेता प्रदेश की राजगद्दी पर बैठने की कवायद में लगे हुए थे..

0
199

महाराष्ट्र. इस प्रदेश की सरकार सर्दी के कारण कम्बल तान कर सो रही है और बिलकुल वैसे ही राजस्थान की सरकार भी नींद के मजे ले रही है. गहलोत वाले राजस्थान में बच्चों की मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता तो उधर उद्धव के महाराष्ट्र में किसानो की मौतों से भी किसी को कोई लेना देना नहीं है.

अक्टूबर 2019 के बाद से आत्महत्यायें बढ़ गई हैं
महाराष्ट्र प्रदेश में में नवंबर 2019 तो कुर्सी दौड़ वाला महीना था और उसके पहले अक्टूबर चुनाव की तिकड़मों का महीना था. सियासी मतलबीपन की परेड कर रहे थे महाराष्ट्र के नेता. और ठीक इसी टाइम अक्टूबर के महीने में बेमौसम की बरसात कब हो गई किसी को पता नहीं चला. सिर्फ उन किसानों को पता चला जिनकी खेती इस बारिश ने बर्बाद कर दी. ऐसे में किसान कहते तो किससे कहते. किसानों की मौतें पहले भी होती रही हैं आत्महत्या बन कर. लेकिन पहले भी किसी ने न किसानों का दर्द देखा, न ही उनकी आत्महत्या के बाद उनके परिवार का कर करुण रुदन. इस बार भी यही हुआ. नवंबर में कुर्सी के लिए जी-जान लगा कर लगे हुए राजनेता आत्महत्या करके जान दे रहे इन किसानों की तरफ देखने का वक्त नहीं निकाल पाए..

साल 2016 से अब तक ये सबसे बड़ी संख्या है आत्महत्या की घटनाओं की
बेरहम बेमौसम बरसात हुई थी अक्टूबर 2019 में महाराष्ट्र में जिसने यहां के किसानो की खरीफ की फसल बरबाद कर डाली. आंकड़ों के मुताबिक़ इसी महीने के बाद किसानों की आत्महत्या में तेज़ी देखी गई. और इन्हीं दुर्भाग्यपूर्ण आंकड़ों ने ये भी बताया कि तीस दिन के भीतर ही इस प्रदेश के तीन सौ से ज्यादा अन्नदाताओं ने अपनी बेचारगी के गमछे से अपना मुँह बाँध लिया और फांसी लगा ली.

कब रुकेंगी हमारे अन्नदाताओं की मौतें ?
सिर्फ एक महीने में याने कि नवंबर 2019 में सिर्फ तीस दिनों के भीतर महाराष्‍ट्र के 300 किसानों ने आत्महत्या कर ली और किसी के कान जूं नहीं रेंगी.आंकड़ों कि मानें तो पूर्व 4 वर्षों में किसी एक महीने में किसानों के आत्‍महत्‍या करने की सबसे बड़ी संख्या है ये. हालांकि पांच साल पहले अर्थात 2015 में कई बार ऐसा हुआ कि एक महीने में किसानों की आत्‍महत्‍या का आंकड़ा 300 को पार कर जाता था. किसान कि जान चली जाती थी और उसका उगाया हुआ अन्न खा कर देश के लोग ज़िंदा रहते थे. लेकिन उनके मरने से देश के बेशर्म नेताओं को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here