बिहार का सबसे दिलचस्प लोकसभा चुनाव क्षेत्र – बेगूसराय : कन्हैया कुमार बनाम गिर्राज सिंह

मेनस्ट्रीम मीडिया के इस स-उद्देश्य कवरेज का प्रयोजन केवल कन्हैया की छवि का नाजायज निर्माण ही नहीं है बल्कि उसे जिताने की सम्पूर्ण भूमिका बनाने का प्रयास भी है..

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लोकसभा चुनावों की बात की जाए तो बिहार भारत का वह प्रभावशाली राज्य है जो आर्थिक रूप से तो पिछड़ा है किन्तु राजनीतिक रूप से सशक्त है.

पिछड़े होने के पश्चात भी बिहार के नेताओं ने राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका निभाई है और राष्ट्र के निर्माण में भी बराबर से योगदान दिया है, चाहे वो बाबू राजेन्द्र प्रसाद हों या लोकनायक जयप्रकाश नारायण.

किन्तु आज के दौर की राजनीति में देश गौण हो गया है और प्रदेश के मुद्दे अहम हो गये हैं. बिहार की राजनीति भी इसका अपवाद नहीं है. जब देशद्रोह के आरोपियों को यहाँ पार्टियाँ अपने सांसद के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतारें तो आप क्या उम्मीद कर सकते हैं.

बिहार में आज यूं तो कई बड़े नेता चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं चाहे वह रविशंकर प्रसाद या शत्रुघन सिन्हा हों, शरद यादव, उपेन्द्र कुशवाहा, पप्पू यादव, तेजस्वी यादव या मीसा भारती हों, किन्तु असली रण देखा जा रहा है बेगूसराय में जहां जेएनयू के देशद्रोह के आरोप में कुख्यात हुए कन्हैया कुमार कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और उनके खिलाफ हैं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री गिर्राज सिंह.

जातीय समीकरण देख लिये जायें तो भूमिहार वोट बेगूसराय में सबसे अधिक हैं. और इतनी ही अहम बात ये भी है कि कन्हैया कुमार भी भूमिहार है. लेकिन यहाँ महागठबन्धन के उम्मीदवार तनवीर हसन के लिये वोटर संख्या के नजरिये से मुकाबला आसान है क्योंकि जहाँ 19 प्रतिशत भूमिहार वोटर हैं बेगूसराय में वहीं 15 प्रतिशत मुस्लिम वोट भी हैं. जाहिर है, हिन्दू वोट बट सकता है किन्तु मुस्लिम वोट के बंट जाने की संभावना बहुत ही कम है. ये आँकड़ा अलग कहानी कहता है जिसमें गठबंधन के राजद उम्मीदवार की जीत नजर आ रही है.

वजह ये नहीं है कि इस उत्सुकता ने बेगूसराय को मीडिया हाइलाइट का केंद्र बना दिया है कि कौन जीतेगा इन दोनों उम्मीदवारों की जंग में जहां एक तरफ एक वयोवृद्ध सशक्त नेता है जो यहाँ से चुनाव नहीं लड़ना चाहता रहा हो, तो वहीं दूसरी तरफ देशद्रोह के कलंक को अभिमान मान कर बेशर्मी से चुनाव मैदान में उतरा हुआ एक छात्र नेता है.

वजह सिर्फ ये ही है कि किसी अदृश्य योजना के अंतर्गत देश का मीडिया कन्हैया कुमार को हाइलाइट करने में जुटा हुआ है और इस रहस्यमय ‘हिसाब-किताब’ ने न केवल कन्हैया को महारथी बना दिया है बल्कि इस चुनाव क्षेत्र को भी सबसे अधिक दिलचस्प बना दिया है.

ज़ाहिर ही है कि मीडिया के इस स-उद्देश्य कवरेज का प्रयोजन केवल कन्हैया की छवि का नाजायज निर्माण ही नहीं है बल्कि उसे जिताने की सम्पूर्ण भूमिका बनाने का प्रयास भी है. बेचारे कन्हैया कुमार की जम कर मदद हो रही है.

मीडिया स्तर पर ही नहीं, प्रचार स्तर पर भी. जेएनयू के सामान विचारधारा वाले अर्थात कम्युनिस्टिक सोच वाले देश के टुकड़े-टुकड़े करके आज़ादी मांगने की नियत वाले कन्हैया कुमार टाइप के ही बहुत सारे विश्वविद्यालयीन साथी इस समय बेगूसराय पहुँच चुके हैं. ये छात्र छात्राएं जो सीपीआई के पूर्णकालिक प्रचारकों के तौर पर यहां अपनी भूमिका निभा रहे हैं, कन्हैया को जिताने में दिन-रात एक किये हुए हैं.

एक बात साफ़ है. चाहे ये लोग कितना भी प्रयास कर लें, जीतेंगे गिर्राज सिंह ही. सच तो ये है कि कन्हैया के सामने गिर्राज सिंह न भी होते, कोई नया चेहरा या कोई अपरिपक्व नेता उतरा होता तो भी वह जीतता. कारण स्पष्ट है. भारतीय वोटर आलसी, लापरवाह, स्वार्थी और बेईमान भी हो सकता है किन्तु अभी शायद उसके रक्त में देशद्रोह ने घर नहीं किया है.

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