(राष्ट्रनायक) भारत-विजय

इस देश में सिर्फ एक ही व्यक्तित्व ऐसा है जिसे हम राष्ट्रनायक की गौरवशाली संज्ञा दे सकते हैं और वे हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

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नमस्कार. मैं हूँ पारिजात त्रिपाठी और आप पढ़ रहे हैं हमारा विशेष  साप्ताहिक कार्यक्रम राष्ट्रनायक. इस देश में सिर्फ एक ही व्यक्तित्व ऐसा है जिसे हम राष्ट्रनायक की गौरवशाली संज्ञा दे सकते हैं और वे हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. देश में ही नहीं, दुनिया में भी मोदी लहर चल रही है. देश का परचम दुनिया में लहरा रहा है और भारत फिर से एक बार विश्वगुरु बनने की राह पर चल पड़ा है. इस अभूतपूर्व राष्ट्रीय उपलब्धि के रचयिता हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. नव-भारत के निर्माता मोदी को हमने नाम दिया है राष्ट्रनायक. आज के प्रथम प्रकरण में हम अपने इस राष्ट्रनायक की राष्ट्र-विजय का संक्षिप्त शब्द-चित्रांकन प्रस्तुत करेंगे.

आज इतिहास ने भारतीय राजनीति के पटल पर एक नाम लिख दिया है – नरेंद्र दामोदर दास मोदी. आज आधुनिक राजनीति के महाभारत में अर्जुन हैं नरेंद्र मोदी और उनका गांडीव है राष्ट्रवाद, साथ में उनके सारथी हैं अमित भाई शाह. इक्कीसवीं सदी के इस राजनैतिक धर्मयुद्ध में पार्थ मोदी ने विजय का शंखनाद किया और भारतवर्ष की सोलहवीं और सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों में विपक्ष की तथाकथित एकजुटता को नेस्तोनाबूद कर डाला.

आइये शुरुआत करते हैं शुरू से कि किस तरह प्रधानमंत्री पद की सर्वोच्च योग्यता की प्रजातान्त्रिक परीक्षा में शिखर पर रहे नरेंद्र मोदी. मोदी की भाजपा के लिये 2014 के चुनावों की तसवीर से  2019 के चुनावों की तसवीर दुगुनी चमकदार थी. सत्रहवीं लोकसभा चुनावों के परिणाम के दो दिन पहले ही 21 मई 2019 को सामने आये कुल 13 एक्ज़िट पोल्स के नतीजों ने ज़ाहिर कर दिया था कि मोदी का सामना कर पाने में विपक्ष बुरी तरह से नाकाम रहा है और हद से हद 122 के आंकड़े को ही मोदी का विपक्षी गठबन्धन छू पायेगा.

मोदी के विपक्षी बौखलाए हुए थे. एक तरफ तो उन्होंने एक्ज़िट पोल्स पर फ़र्ज़ी होने का आरोप लगाया, वहीं दूसरी तरफ वे ये मान कर भी चलने को भी मजबूर थे कि मोदी ही जीत रहे हैं और अगले प्रधानमंत्री के राजसिंहासन पर फिर से मोदी ही विराजने वाले हैं. इसी डर से प्रेरित हो कर विपक्ष ने एक स्वर में ईवीएम का अरण्यरोदन भी शुरू कर दिया.

चुनाव आयोग के सामने मोदी के विरोधी अपने भय को शिकायत का मुलम्मा चढ़ा कर पेश करने लगे. लेकिन सब जानते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते. इसलिए बैक टू स्क्वेयर वन.  कोई फर्क नहीं पड़ा. फर्क तो तब पड़ता जब कहीं कोई मुद्दा होता. आप जीतें तो आपका कमाल, मोदी जीतें तो ईवीएम की धांधली!

मोदी से आतंकित विपक्ष के डर ने एक नये राजनैतिक जुमले को जन्म दिया – डर के आगे हार है!  लेकिन विपक्षियों ने इस हकीकत से समझौता फिर भी नहीं किया कि मोदी को आने से कोई नहीं रोक सकता.  वैसे भी मोदी नहीं जीतते तो भी विपक्ष हार ही जाता क्योंकि इस तरफ तो एक ही प्रधानमंत्री थे, विपक्ष में तो सभी प्रधानमंत्री थे. प्रधानमंत्रियों से भरपूर विपक्ष ध्वस्त हो गया और अकेले एक मोदी ने सबको परास्त कर डाला.

ऐसा लगा कि सत्रहवीं लोकसभा चुनाव परिणामों ने देश को खुश कर दिया और दुनिया को हैरान कर दिया. बीजेपी की 303 सीटों के साथ 353 सीटों वाले एनडीए ने अपने राजनैतिक वर्चस्व का प्रमाणपत्र दे दिया. देश मोदी-मोदी हो गया. जिस भगवा पर उंगलियाँ उठती थीं, देश के लिये घातक,  कट्टर और मुस्लिम विरोधी होने का जिस पर आरोप चस्पा किया जाता था, आज वही भगवा भारतीय राजनीति का केन्द्र है.

कहने की ज़रूरत नहीं. कहने को कुछ छोड़ा ही नहीं मोदी ने. बस, देश में एक सूनामी चली और मोदी नाम की इस सूनामी ने सूखे पत्तों की तरह उड़ा दिया संपूर्ण विपक्ष को. जबर्दस्त बहुमत के साथ मोदी और उनके साथियों का संसद में पदार्पण हुआ. अब विपक्ष में यूनाईटेड वी विन की जगह कहा जा रहा था – यूनाईटेड वी लूज़!!

देश ने राष्ट्रवाद को गले लगाया और विकास के चेहरे मोदी को विजयश्री का वरण कराया. संघ के लाखों-लाखों कार्यकर्ताओं का परिश्रम सार्थक हुआ.

जिन आडवाणी जी के लिए राहुल गाँधी ने शर्मनाक वक्तव्य दिया था कि मोदी ने आडवाणी जी को लात मार कर पार्टी के मंच से नीचे फेंक दिया,  मोदी-शाह की विजेता जोड़ी इस ऐतिहासिक विजय के उपरान्त उन्हीं आडवाणी जी से मिलने और उनका आशीर्वाद लेने उनके घर पहुंची थी.

देश की तरह विदेशों में भी मोदी की जीत का जश्न चला. लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वेयर पर लोगों ने भांगड़ा करके मोदी की जीत की ख़ुशियाँ मनाईं. ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन में भी भारतीयों ने मोदी विजय का जमकर उत्सव मनाया.

उधर दूसरी तरफ सबसे बड़े पराजित खेमे में सन्नाटे का शोर था. देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल कांग्रेस ने कहा कि वह अपनी हार के कारणों का विश्लेषण करेगी. पर विश्लेषण के बाद भी कांग्रेस को हार की वजह समझ नहीं आई. सीडब्ल्यूसी की बैठक में और उससे पहले भी ऐसे संकेत मिले जैसे कि धकेल कर कराई जा रही राजनीति करने की तमन्ना नहीं है राहुल की. मजबूरन सोनिया गाँधी को फिर परदे से बाहर आना पड़ा और वे अध्यक्ष की कुर्सी पर फिर काबिज हो गईं. शायद इतनी बड़ी जिम्मेदारी के लिये फिलहाल प्रियंका वाड्रा की तैयारी पूरी नहीं थी..या शायद राबर्ट वाड्रा की ‘तैयारी’ भी पूरी नहीं थी. 

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पीएम मोदी को बधाई दी. दिन में ही जिस समय भारत में मतगणना चल रही थी, दुनिया के बड़े राष्ट्राध्यक्षों ने मोदी को जीत की बधाइयाँ देनी शुरू कर दी थीं. शुरुआत की थी मोदी के दोस्त इज़राइल के प्रधानमन्त्री नेतान्याहू ने.

ज़ाहिर है, दुनिया में मोदी की जीत का सकारात्मक संदेश गया है. देश में ही नहीं दुनिया में भी मोदी अब आदमकद हो चुके हैं. भारत की ग्लोबल ब्रान्डिंग करने वाले अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ मोदी की चुनावी विजय को दुनिया से समर्थन मिला है.

इन आम चुनावों ने मोदी मैजिक की मेहरबानी से कुछ बड़े उलटफेर दिखाए. राजे-रजवाड़ों के दिन लद गए, ऐसा लगता है. युवराज राहुल हारे अमेठी से, दिग्गी राजा हारे भोपाल से और ज्योतिरादित्य सिंधिया हारे गुना से. देशद्रोह के अभियुक्त कन्हैया कुमार को सवा चार लाख से पीटा बेगूसराय की जनता ने. और देश में सीपीआई का भी सूपड़ा साफ हो गया है जैसे बिहार में लालू की राजद ज़ीरो हो गई है.

प्रतिक्रियावादी मतदान से हटकर पश्चिम बंगाल में भी कमल खिल गया. जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा की सरकार बनने की तैयारी थी, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड और गुजरात में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया. कई नेताओं का अभिमान टूटा, और सबसे बड़ी बात जो हुई वो ये थी कि गांधी-नामधारी राहुल अमेठी से हारे और उनकी वहां सदा विजय होगी – ये मिथ भी टूट गया.

अमेठी में सेनापति मोदी की क्षत्रप स्मृति इरानी ने राहुल गाँधी को धोबी-पाट का स्वाद चखाया. मगर वायनाड ने साथ निभाया और इज्जत रख ली गांधी राजवंश के चश्मोचिराग की.

देश का हर वोट मोदी को गया. अब बीजेपी को अपने पक्ष में किसी धर्म या जाति के वोटों के ध्रुवीकरण की आवश्यकता नहीं थी. मोदी को देश के नागरिकों ने दोनों हाथों से वोट दिए थे. अच्छी बात है कि कट्टर धार्मिक औऱ जातिगत राजनीति को इस बार मोदी की उपस्थिति ने नकार दिया था. ये हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है!

केजरीवाल के तीन नेताओं की ज़मानत जब्त हो गई. प्रकाशराज भी खेत रहे. मुलायम-पुत्र अखिलेश बेजुबान हो गये, मायावती मोदी की जीत से जल-भुन गईं और कहते नहीं थक रही थीं कि ईवीएम की धाँधली से जीते हैं मोदी. ममता के गुस्से की तपिश बंगाल से बाहर तक आ रही थी और मेहबूबा को तो चुनावी रिज़ल्ट्स ने खामोश ही कर दिया था.

कुल मिला कर सार यही है कि 2014 के बाद 2019 में भी वही पिछले वाले चुनाव परिणाम रिपीट हुए लेकिन इस बार वे और भी पर्वताकार हो कर सामने आये. सारा देश मोदी-मोदी हो गया. भाजपा थ्री नॉट थ्री हो गई और अकेले तीन सौ तीन सीटें जीतने वाली भाजपा के गठबंधन ने संसद की 353 सीटों पर अपना नाम लिख दिया. इसका कारण ये भी था कि चुनावी तराजू का एक बांट तो बहुत भारी था मगर दूसरा बाँट हल्के से हल्का होता चला गया.

एक तरफ तो भारी-भरकम मोदी थे तो दूसरी तरफ सारे घाघ खिलाड़ी जो अनाड़ी साबित हुए. जंग शायद बराबर की नहीं थी. इसलिये भी मोदी को वाकओवर का मिलना तय था. और एक बात और भी समझ आई कि जब तक मोदी के सामने कोई मोदी जैसा न आ जाये, मोदी की पराजय संभव नहीं है.

मोदी के सारथी अमित शाह श्रीकृष्ण नहीं हैं, चाणक्य हैं. अमित शाह गीता का ज्ञान नहीं देते, राजनीति के रण में विजय की नीति देते हैं. वे दार्शनिक नहीं हैं, शुद्ध व्यावहारिक हैं.  राजनीति के व्यवहार में वे शुद्ध व्यवसायी हैं जिन्हें नुकसान कमाना नहीं आता.

मोदी-शाह की ऐतिहासिक जोड़ी संपूर्ण विपक्ष पर भारी पड़ी है. वो भी तब जब घाट-घाट का पानी पिये विपक्ष के सभी छितराये हुए नेता एक ही छतरी के नीचे आ गये. भाजपा नामक मोदी का रथ निरंतर प्रगतिमान है. कहा तो ये जा रहा था कि अब की बार मोदी सरकार..पर जो हालात हैं उससे तो ये लग रहा है कि बार बार हर बार – मोदी सरकार,  मोदी सरकार!!

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