एक वाइफ स्वेपिंग की शिकार : छोटी सी आत्मकथा

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वाइफ स्वेपिंग. यह शब्द सुनने में बहुत अजीब है. लेकिन सच्चाई उससे भी अधिक अजीब है.

भारत के छोटे शहरों को नहीं पता कि बड़े शहरों में अब ये भी होने लगा है. मेट्रोपोलिटन कल्चर के नाम पर आजकल ये भी चलने लगा है. एलीट याने आर्थिक रूप से धनाढ्य लोगों का फैशन है ये. इसे वाइफ स्वेपिंग कहते हैं.

आमतौर पर शहरी लोग इस विषय-वस्तु से अपरिचित नहीं. फिर भी ये बताना आवश्यक है कि मूल रूप से वाइफ स्वेपिंग है क्या. वाइफ स्वेपिंग अंध-वासना पूर्ति का नया जरिया है जिसमे आपको कहीं और नहीं जाना बल्कि अपनी मित्र-मण्डली में ही इसकी राह तलाश लेना है. लेकिन स्वेच्छा से हो और अनैतिक न हो ये बात इस प्रक्रिया में जोड़ी नहीं गई है.

एक पंक्ति में इसको ऐसे बताया जा सकता है कि वाइफ स्वेपिंग में कुछ फ्रेंड्स अपनी अपनी वाइफ की एक-दूसरे के साथ अदला-बदली करते हैं. यह अदलाबदली एक रात के लिए ही होती है पर हर बार होती है. हर बार से मतलब है कि जब भी इस तथाकथित मित्र-मंडली की पार्टी होती है, वाइफ स्वेपिंग होती है. इसको आप वाइफ स्वेपिंग पार्टी भी कह सकते हैं.

समाज के ‘उच्चवर्ग’ में अपनी अतिरिक्त  यौन-इच्छाओं की पूर्ति के लिए बड़ी बेशर्मी से इन पार्टियों को अंजाम दिया जाता है. प्रत्येक धनाढ्य व्यक्ति या समाज का उच्च-स्तरीय व्यक्ति इस तरह की गतिविधियों में संलग्न हो ये ज़रूरी नहीं है. किन्तु जो लोग ऐसा करते हैं वे निम्न या माध्यम वर्ग के भारतीय नहीं होते.

मॉर्डन ज़माने का ये मॉर्डन गेम बताता है कि सब बिकता है इस दुनिया में..इज्जत भी और आबरू भी. इस पार्टी का तरीका कुछ इस तरह का होता है. एक नियत दिन या शाम या रात को पार्टी का आयोजन होता है. सभी आमंत्रित मित्र अपनी पत्नियों के साथ यहां पहुँचते हैं. और हाँ यहां ये बताना भी अनिवार्य है कि इस पार्टी में आने की सबसे बड़ी शर्त ये है कि आप जोड़े में ही आ सकते हैं अर्थात आपके साथ आपकी पत्नी होनी ही चाहिए. सही बात है, वरना स्वेपिंग फिर किसकी करेंगे आप.

आने के बाद शुरूआती खाने-पीने के दौर के बाद लोग अपनी वास्तविकता पर उतर आते हैं. लॉटरी के माध्यम से चुनाव होता है ताकि प्रजातांत्रिक पद्धति का सम्मान हो सके और कोई ये न कह सके कि बेईमानी हुई है अर्थात आपने अपनी पसंद के साथी का चुनाव कर लिया है. जो होस्ट है उसकी विशेष भूमिका यहां सामने आती है.

होस्ट लॉटरी के लिए चिट भी डाल सकता है या फिर ज्यादातर कार की चाभियों के माध्यम से लोगों के लिये पार्टनर्स का चुनाव कर सकता है. एक डिब्बे में या तो नाम लिख कर चिटें डाल दी जाती हैं या सभ लोगों की अपनी-अपनी कार की चाभियाँ. अब पत्नियों की भूमिका शुरू होती है. ये पत्नियां बारी-बारी से हाथ डाल कर चाभी या चिट निकालती हैं. जिसके हाथ में जिसके नाम की चिट आ जाती है या जिस मित्र की कार की चाभी जिस महिला के हाथ में आ जाती है वो उसका पार्टनर बन जाता है.

प्रजातांत्रिक तरीके का ये चुनाव यह तय करता है कि कौन किसका पार्टनर होगा एक दिन या एक रात के लिए. इसके आगे कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं. मद्य और मुक्त-यौन संसर्ग की इस महफ़िल को वाइफ स्वेपिंग कहते हैं.

मुझे भारत के एक महानगर की रहने वाली एक लड़की मिली और उसने अपनी जो कहानी सुनाई, उस कहानी ने मुझे हैरान कर दिया. सड़क पर ही मेरी मुलाकात हुई थी उससे. वो लड़की अपने लिए किसी ऑटोरिक्शा का इंतज़ार कर रही थी.

 खूबसूरत नैन-नक्श और लम्बे बालों वाली इस लड़की ने बालो में सफेद गजरा लगा रखा था. उसके माथे पर सिंदूर की एक छोटी सी बिंदी भी मुस्कुरा रही थी लेकिन उसके होंठों पर मुस्कान नहीं थी.

मैंने हंस कर उसे हेलो कहा. उसने बड़े ही संजीदे स्वर में जवाब दिया. मेरे पूछने उसने अपना नाम नीलिमा बताया.
मैं इस शहर में नयी हूँ, और आप ?
मैंने कहा मैं यहाँ जॉब करती हूँ.
उसने कहा मुझे हिंदी कम आती है और यहां मेरी कोई दोस्त भी नहीं है.

और इस तरह से हमारी दोस्ती हो गई. अब हम रोज़ उस चौराहे पर मिलते थे. कुछ महीनो की दोस्ती के बाद उसने मुझे अपने घर खाने पर इन्वाइट किया.

हमने खाना कम खाया बातें ज्यादा कीं. बहुत गुबार था उसके मन में जाने कब से. उसका पति उस शहर के एक पांच सितारा होटल में बहुत बड़ी पोस्ट पर था. उस होटल में रोज़ पार्टियां होती थीं. नीलिमा का पति उसे भी वहां ले जाता था. रोज़ वहां उसकी मुलाक़ात नए-नए लोगों से होती थी. पांच सितारा होटल की संस्कृति का हिस्सा बने हुए लोगों की ज़िंदगी में वहां बस दो ही चीज़ें होती थीं – लड़की और शराब.

उस अति-आधुनिक माहौल में नीलिमा का पति भूल चुका था कि उसकी पत्नी आधुनिका नहीं थी, वह शुद्ध भारतीय थी और एक संस्कारित हिन्दू परिवार से संबंध रखती थी. शिक्षा में एमएससी किया था नीलिमा ने. वह अनपढ़ भी नहीं थी. पर दक्षिण भारतीय नीलिमा अब तक इस तरह की आधुनिका नहीं बन सकी थी.

उसके पति के लिए पांच सितारा होटल और वहां की नैतिक-अनैतिक गतिविधियां उसके लिए प्रेस्टीज इशू बन चुकीं थीं. और वह इससे बाहर आना भी नहीं चाहता था. फिर वही हुआ जिसका नीलिमा को डर था. वहां एक रात एक पार्टी में उसने नीलिमा को भी कर दिया अपने एक दोस्त के हवाले.

इससे पहले कि नीलिमा कुछ समझ पाती,  मामला दूसरे चरण पर जा पहुंचा था. शराब में मदहोश झूमते लोगों में उसका पति भी था. वो किस से क्या कहती. उसके सारे संस्कार धरे के धरे रह गए. लेकिन उसने आत्मसमर्पण नहीं किया. विरोध किया और जैसे तैसे उस होटल से भाग निकलने में कामयाब हो गई.

अगली सुबह जब उसके पति को पता चला तो उसने उसे बहुत पीटा. उसके पति ने कई दिनों तक उसे एक कमरे में बंद रखा और उसका खाना-पानी भी बंद कर दिया. नीलिमा को उसने एक ही शर्त पर माफ़ किया कि अगर मेरे साथ रहना है तो मेरे तौर-तरीकों से रहना होगा. मेरी तरह रहना सीखो और ऐश की ज़िंदगी जियो, जैसी मैं जी रहा हूँ – साफ़ कह दिया उसके पति ने!

नीलिमा ने बताया कि जिस कॉलोनी में वो रहती है वहां सबको पता है इस बारे में. उनके लिए ये आम बात है. वहां के लोग भी शायद इसके समर्थक हैं या कहें अभ्यस्त हैं. वहां वाइफ स्वेपिंग की बात पर कोई हैरान नहीं होता न ही ऐसी किसी वाइफ से किसी को कोई सहानुभूति है जो कि मजबूरी में इस दलदल में फंसी हुई है.

और हाँ, नीलिमा अब अपने पति के साथ नहीं रहती. उसने अपने पति से समझौता नहीं किया और न ही अपनी ज़िंदगी से..क्योंकि उसने अब अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर दी है. अब वह नौकरी करती है और अपने अलग घर में रहती है जहाँ उसका पति नहीं है और वाइफ वाइफ स्वेपिंग भी नहीं है.

(रजनी साहनी)

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