संविधान के अनुच्छेद 32 पर अपील का अधिकार घुसपैठियों का नहीं!

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संविधान के अनुच्छेद 32 – के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अपील करने का अधिकार सिर्फ नागरिकों को है, अवैध आप्रवासियों को नहीं!

शरणार्थियों से सम्बंधित सयुंक्त राष्ट्र की 1951 की जिस संधि और 1967 के जिस प्रोटोकॉल का याचिका में जिक्र किया गया है, भारत ने उन पर हस्ताक्षर ही नहीं किये हैं!

ये दलील भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रोहिंग्यायियों के पक्ष में डाली गयी याचिकाओं के उत्तर में दी है!

क्या इस याचिका को स्वीकार करने वाले जजों को त्वरित प्रभाव से बर्खास्त नहीं कर देना चाहिए एवं उन पर देशद्रोह का मुकद्दमा नहीं चलना चाहिए? फैसला क्या देंगे, बाद की बात है! किसी कोर्ट, किसी जज को हक़ नहीं है देश की सुरक्षा से खिलवाड़ का!

रोहिंग्या मुसलमानों के मानव अधिकार हैं तो क्या देशवासियों के कोई अधिकार नहीं हैं अपने देश के संसाधन पर? कल अराजकता फैलाने पर सरकार को लताड़ कर अपने फ़र्ज़ की इतिश्री समझ लें!

रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में यही वकील सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं–

1. फली एस नरीमन
2.कपिल सिब्बल
3.राजीव धवन
4.अश्विनी कुमार
5.प्रशांत भूषण
6.कॉलिन गोजवेल्स
7- सलमान खुर्शीद

ये ऐसे नामी गिरामी और महंगे वकील हैं, जिन तक पहुँचने में भी आपकी एडियाँ घिस जाएगी। फिर भागे हुए कंगाल रोहिंग्या मुसलमानों पर ये अपना समय क्यों नष्ट कर रहे हैं ?

दो कारण हो सकते हैं किसी भी वकील के पास केस लेकर उसकी पैरवी करने के लिए –

अगर रोहिंग्यों से पैसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की जा रही है तो प्रश्न है वो पैसे कौन दे रहा है जबकि उनके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं, तो इतने महंगे वकील उन्होंने कैसे किये? और अगर ये वकील मानवाधिकार के चलते इनकी पैरवी कर रहे हैं तो वो मानवाधिकार कश्मीरी पंडितों के समय कहाँ गए थे?

असल में यह सब जितना दिखता है उससे बहुत बड़ा खेल लगता है और इसके पीछे बहुत सारी और बड़ी बड़ी विदेशी ताकते काम कर रहीं हैं और इन्हीं ताकतों के हाथों जाने अनजाने कुछ हिंदुस्तानी भी लगता है देश द्रोह कर रहे हैं! इनकी विस्तार से जांच होनी आवश्यक है!
(त्रिपत सिंह)

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