समय जगा रहा है, वीर अर्जुन! : चुनाव परिणाम का संपादकीय संदर्भ

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चुनाव के नतीजों से अभी हैरान मत होइए, अभी मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा की सरकार बन सकती है..

जनता के पैर ज़मीन पर होते हैं. जनता हेलिकॉप्टर्स और वायुयानों में नहीं चलती. जनता की दूर की नज़र भी ठीक नहीं. उसको पास का ही दिखता है. जनता बुद्धिजीवी नहीं होती, आप उसके साथ आंकड़ों की बाजीगर कर भी लेंगे तो बेकार है. जनता राष्ट्रवादी भी नहीं है, उसको पहले अपना पेट और अपने पैर दीखते हैं. उसके लिए राष्ट्र के हित से भी बड़ा अपना हित है. आप इन तथ्यों को चाहे जैसे समझ लें, ये तथ्य भी जनता की तरह हैं, किसी के कह देने भर से बदल नहीं जाएंगे.

जनता के पास लोकतंत्र तो है पर विकल्प नहीं. बदलाव का विकल्प तो है पर सही या मनचाहे बदलाव का विकल्प तब भी नहीं. आज़ाद आसमान के नीचे यदि उसके हाथ खुले हैं तो पैर बंधे हैं. वो खुद अपनी मर्जी से चल नहीं सकती लेकिन आप भी उसे अपनी मर्जी से हमेशा चलाये हुए नहीं रख सकते.

इन चुनावों ने ये भी तय कर दिया है कि हवा जैसी कोई चीज़ नहीं होती. हवा से बड़ी एक चीज़ होती है जिसे जरूरत कहते हैं. इस जरूरत के आगे बड़ी बड़ी हवाएं फ़ेल हैं. गेमचेंजर मुद्दे नहीं होते, गेमचेंजर वोट होता है.

ये सच है कि देश का चौकीदार चोर नहीं है. और ये भी सच है कि चौकीदार को चोर बताने वालों का इतिहास तो खुद ही चोरी के अध्यायों से भरा पड़ा है. पर जनता को इससे क्या. चोर, चौकीदार, देश सब उसके लिए गौण है.उसके लिए किसानी, बेरोजगारी, पेट्रोल डीजल, ज्यादा महत्वपूर्ण है.

आप अनपढ़ हैं यदि राजनीति की किताब में जन-भाषा को न पढ़ सकें. ये एक कला है आपके आदर्श और आपकी योजनाएं जनता के हित से वस्तुतः कितने जुड़ सकेंगे – इस व्यावहारिक बुद्धिमानी पर आपका और देश का राजनीतिक भविष्य तय होता है. वरना देश का चौकीदार मड़िया के नीचे खटिया में पड़ा रहेगा और देश के चोर दरोगा बन कर दिन दहाड़े चोरी करेंगे और कोई कृष्णावतार आपको तारने नहीं आएंगे.

जब वीर सेनापति चारित्रिक रूप से शुद्ध है तो उसके फौजियों को भी शुद्ध-चरित्र का होना न केवल अपेक्षित होता है बल्कि प्रत्येक युद्ध में विजय की गारंटी भी वही होता है. अब सोचना होगा कि फौजियों की शुद्धता की बात भी की जाये और उस दिशा में कार्य भी किया जाये.

जुबान उनकी फिसलती है जिन्हें जुबान चलानी नहीं आती. जो जुबान चलाने के महारथी हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि उनकी जुबान की कीमत उनकी कीमत से बढ़ कर है सुनने वालों के लिए. जुबान देना याने वायदा करना. और वायदा करना मतलब वायदा निभाना और लोगों के सिर-माथे हो जाना – वरना निगाहों से उतर जाना. ये प्रक्रिया होती है उम्मीदों और सपनों के सच होने या बिखर जाने की.

आम आदमी की याददाश्त कम होती है, कोई शक नहीं. लेकिन दर्द की याददाश्त कभी कम नहीं हो सकती. जब तक दर्द रहेगा दर्द देने वाला भी याद रहेगा और दर्द का इलाज भी. आप दर्द का इलाज बन कर आये हैं तो समझ जाइये आपको भूलना तकलीफ के मारों के लिए आसान कैसे हो सकता है.

खैरात बांटने से वोट नहीं मिलते, दर्द बांटने से मिलते हैं. वरना जाने कितनी सरकारें कितने प्रदेशों और देशों में रबड़ी खा रही होतीं. खैरात कुछ लम्हों की ख़ुशी हो सकती है दर्द से निजात नहीं. इसलिए राजनीति के डॉक्टरों को इस सच का सामना करना ही पड़ेगा कि हर रोग के लिए पैरासिटामोल दे कर टरका नहीं सकते आप जनता को.

समझदार वो हैं जो सबक सीख लें. मोहल्ले की लड़ाइयों के आगे मैदान की लड़ाई बाकी है. न हतप्रभ हो कर शक्तिहीन पार्थ बनना होगा न आज के हालात को विधि का विधान मानना होगा. आगे का इतिहास आपकी प्रतीक्षा में है. वह इस सत्य से अपरिचित नहीं है कि भावी विजय का इतिहास आप ही लिखेंगे..यदि आप वास्तव में योद्धा हैं!

भली है या बुरी है जो शकल आपकी
आईने में देखिये, अपनी नज़र में नहीं!

(पारिजात त्रिपाठी)

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