सावधान : कहीं आप भी तो इस बीमारी के शिकार नहीं?

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आपका फ़ोन आपका सहयोगी है, उसे अपना साथी न बनाएं..

आजकल एक अजीब सी बीमारी देखने में आ रही है. और यह बीमारी किसी क्षेत्र या प्रदेश विशेष में नहीं सारे भारत में फ़ैल चुकी है. और हैरानी की बात तो ये है कि कई लोगों को पता ही नहीं कि वे इसके शिकार हो चुके हैं.

जी हाँ, ये बीमारी सबको नज़र आ रही है पर लोगों को पता नहीं चल रहा. न लोगों को ये पता चल रहा है कि वे भी इसकी चपेट में आ चुके हैं न ही लोगों को ये पता चल पाया है कि ये एक बीमारी है और इसके कई बुरे परिणाम सामने आ सकते हैं.

ये सच है, आजकल आप कहीं भी जाएँ आपको इस बीमारी के शिकार लोग नज़र आ जाएंगे. आप मेट्रो में चढ़ें या बस में, ट्रेन में या वेटिंग रूम में, किसी ऑफिस की बालकनी में पड़े सोफे पर या किसी शॉप या सर्विस सेंटर पर पड़ी हुई बेंचों पर – हर तरफ लोग आपको थोड़ा आगे को झुके हुए और अपने उठे हुए हांथों पर सर की दिशा बना कर अपने मोबाइल पर एकटक देखते नज़र आएंगे.

एक-आध आदमी ऐसा कर रहा हो तो चलो ठीक भी है, अब तो हर कोई हर तरफ ऐसा करता नज़र आ रहा है. जिसको ज़रा सा भी टाइम मिले, वो लग जाता है मोबाइल पर. हद तो ये है कि अब तो कार में भी लोग मैसेज पढ़ते और ज्यादा बुरा तब है जब मैसेज लिखते हुए भी मिल जाते हैं. कार में मतलब कार चलाते हुए जो कि जितना खतरनाक कार चलाने वाले के लिये है या कार में बैठे लोगों के लिये, उससे अधिक खतरनाक उस सड़क पर चल रहे बाकी लोगों के लिये. चाहे वो टैक्सी हो औटोरिक्शा हो या आपकी अपनी प्राइवेट कार, हो सकता है आप भी ड्राइव करते समय ऐसी ही गैर-ज़िम्मेदाराना हरकत करते हुए देखे जाते हों अक्सर.इस बात पर गुस्सा होने से ज्यादा जरूरी है इस बात को समझना कि आपकी ज़िन्दगी आपके मोबाइल फोन से ज्यादा जरूरी वस्तु है.

आपका मोबाइल फ़ोन बीमारियों को बढ़ाता है. कूबड़, इन्सोम्निया (नींद न आने की बीमारी), अवसाद, चिचिड़ापन, कॉन्स्टिपेशन, बीपी, नेत्र-रोग, आदि ऐसे न जाने कितने विकार हैं जो हम  मोबाइल फ़ोन से अर्जित करते हैं. पर हम ध्यान नहीं देते क्योंकि अपने लिए सबसे अधिक जालिम हम खुद ही होते हैं.

आँखों को ही नहीं, आपका मोबाइल फ़ोन आपके कानों को भी हानि पहुंचाता है. इसके अधिक इस्तेमाल से आप बहरे भी हो सकते हैं. आपकी कमर पर इससे नुकसान पहुंचता है और आपकी रीढ़ की हड्डी पर इसका स्थायी नुकसान भी दर्ज हो सकता है, इसलिए इसे आप अपने-आप से थोड़ा दूर कर लें तो ही बेहतर है.

आज का ज़माना सौंदर्य-प्रिय हो गया है. अब न केवल महिलायें बल्कि पुरुष भी पार्लर जाते हैं और अपने सौंदर्य-वर्धन की दिशा में प्रयास करते नज़र आते हैं. इसलिए इन दोनों ही वर्गों को सचेत हो जाना चाहिए और मोबाइल से अपनी दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि आपका मोबाइल आपकी त्वचा के लिए भी नुक्सानदेह है, यह आपके शरीर में त्वचा-रोगों को जन्म दे सकता है. न वि्श्वास हो  तो किसी स्किन के डॉक्टर से कंसल्ट कर सकते हैं.

कई समझदार लोग तो सोते समय भी मोबाइल देख कर या   उसको पढ़ कर लिख कर सोते हैं. और तो और तकिये के नीचे रख कर सो जाते हैं जो कि सबसे बुरा है. इससे होने वाला रेडिएशन आपके मस्तिष्क के लिए घातक सिद्ध हो सकताहै. कहा तो ये भी गया है कि रात को सोते समय आपका फ़ोन आपके बैडरूम में नहीं होना चाहिए, इस तरह आप अपने लम्बे समय के स्थायी स्वास्थ्य को सुनिश्चित कर सकते हैं.

आप खुद तो इसका इस्तेमाल करके खुद को नुकसान पहुंचा रहे ही हैं, साथ ही साथ अपने बच्चों को भी इस फ़ोन की आदत डाल कर उनके जीवन को बर्बाद कर रहे हैं. जो समय खेल-कूद कर स्वास्थ्य बनाने में और पढ़-लिख कर योग्यता बनाने में लगना चाइये – बच्चों का मोबाइल उनका वह समय खा जाता है. और हर तरह की बुरी आदतें और बुरे ज्ञान उनको मोबाइल फ़ोन पर रेडीमेड मिल जाते हैं और वे कुछ मामलों में तो आपसे भी अधिक ग्यानी हो जाते हैं. कहिये क्या जवाब है आपका?

अब ये आलम है कि अक्सर लोगों के ड्राइंग रूम में आपको शान्ति नज़र आएगी. आप सोचेंगे कि घर में तो मेहमान आये हैं फिर भी इतनी शान्ति कैसे? जी हाँ, सबने अपना मोबाइल खोल लिया है और सब के सब लगे हुए हैं. . और तो और अब डाइनिंग टेबिल्स पर भी पहले की तरह हंसी-ठहाके लगाते हुए लोग खाना खाते नज़र नहीं आाते, अब लोग टेबिल पर ही थाली के साथ मोबाइल भी धर लेते हैं और खाना कम काते हैं, मोबाइल ज्यादा खाते हैं.

हाल ही में हुए शोध के मुताबिक दिन भर मोबाइल पर चिपके रहने वाले लोगों में ब्रेन ट्यूमर का खतरा हो सकता है. अब ये सोचिये कि आप के लिए तो ठीक है, आप अपनी ज़िंदगी जी लिए, किन्तु क्या यह आपके बच्चों के लिए उचित होगा? आपका कर्तव्य है कि आप अपने बच्चों को मोबाइल से होने वाले हर नुकसान की साफ़-साफ़ और पूरी जानकारी दें. कंप्‍यूटर से निकलने वाला रेडियेशन बच्‍चों के दिमाग पर आप के मस्तिष्क पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से कहीं अधिक दुष्प्रभाव डालता है, ये जानकारी भी उनके दिमाग में डाल दें.

आप की जानकारी के लिये हमारा यह बताना हमारा कर्तव्य बनता है कि आप अपने बच्चों को उनकी छोटी उमर में मोबाइल और लैपटॉप जैसी बीमारियों से दूर रख कर अपनी पैरेन्टिंग का सर्वोत्तम कर्तव्य निभा सकते हैं. 

अगर आपका ध्यान अब तक इस एक और अहम तथ्य की तरफ न गया हो तो आज ज़रूर गौर फरमाइए इस पर – कुछ सामान्य कामों को छोड़ दें तो हम के 15-18 घंटे स्मार्टफोन अपने पास ही रखते हैं. और हममे से कुछ लोग तो इससे भी ज्यादा समय तक स्मार्टफोन पास रखते हैं. क्यों भाई? क्या इसके बिना काम नहीं चलता? फ़ोन मूल रूप से फ़ोन कॉल और जरूरत पड़ने पर सन्देश भेजने के लिए ही है, शादी करके जीवनसाथी बना लेने के लिए नहीं!!

आप यदि अदालत के आंकड़े देखें तो डाइवोर्स के कई केसेज़ में एक्सट्रामैरिटल एफेयर्स  इन संबन्ध विच्छेदों का कारण बने मिलेंगे और उनकी कहानियों मे मोबाइल नामक प्रमुख अभियुक्त खलनायक के रूप में अंकित दिखाई देगा. और यह सिलसिला अब बढ़ेगा, और इसके आंकड़े भी बढ़ते जाएंगे..क्योंकि लोग अब मोबाइल की मदद से अपराध भी कर रहे हैं और मोबाइल को जीवनसाथी बना कर उसके साथ जीवन भी जी रहे हैं..जो कि किसी भी समाज के स्वस्थ अस्तित्व के लिए संकट हो सकता है.

(पारिजात त्रिपाठी)

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