आठ दशक के बाद भी बरकरार है जादू : आकाशवाणी लखनऊ है दिलों की धड़कन

(2 अप्रैल स्थापना दिवस पर विशेष)

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उम्र इक्यासी की और अदा इतनी दिलकश कि पूछिये मत। नीली आभा लिए कभी आसमान सा विस्तृत हृदय लिए कभी कृष्ण सा मोहक ,जिसके भीतर की तमाम राग-रागिनियाँ ,गीत,संगीत,सुर,लय,ताल सम्मोहन करती रहीं और जब संवाद हो तो हर किसी को लगे कि बस उसी से बात हो रही हो ,संवाद अदायगी भी ऐसी कि हर दिल धड़क उठे आवाज़ से ही ,हर दिल मचल उठे सुनने को..

इक्यासी वर्ष के इस आकर्षक दिलचोर ने कभी भेदभाव भी न किया किसी से । न उम्र का बंधन ,न जाति का , न अमीरी – ग़रीबी का भेद ,न ही शहरी और गंवई का भेद किया ,जो भी दिल से जुड़ा सबको अपने प्यार से संवारा , जिसकी जैसी ज़रूरत उससे वैसा ही रिश्ता जोड़ लिया । कभी परिवार ,कभी शिक्षक ,कभी सलाहकार ,तो कभी कलाकार , बनकर जीवन की गुत्थियों को सुलझाता रहा।  सबकी खुशियों में खिलखिलाया भी , गुनगुनाया भी , रोते हुए को भी हंसाने के लिए जाने कितने रूप धरे ।  लोरी से लेकर कहानियों तक बचपन को दुलराया , शिक्षा का महत्व समझाकर पंखों को उड़ना सिखाया , खेतों में बीजों से लेकर फसल तक उन्नत बनाया ,श्रम को सम्मान दिया, मां को मान दिया ,  सबको राह दिखाई ।

साहित्य का उत्थान हुआ हिंदी का मान हुआ ,गज़लों की महफ़िल सजी ,लोकधुनें भी परवान चढ़ीं जिसकी फैली बाहों में गंगाजमुनी संस्कृति भी खूब फूली-फली वो आसमान सा विस्तृत, कृष्ण से मोहक ,बहरूपिया रंगरेज कोई इक्यासी वर्ष का कोई समाजसेवी ख्यातिलब्ध बुजुर्ग नहीं ,वो तो 81 वर्ष का किशोरावस्था की ओर बढ़ता हुआ हमारा आकाश वाणी लखनऊ है दोस्तों । 2 अप्रैल को ही स्थापना हुई थी आकाश वाणी लखनऊ की सभी इमारतों की तरह ये भी महज शहर की एक आम इमारत सा है ,लेकिन इसकी पहचान हल्के नीले रंग से रँगी दीवारों पर आकाशवाणी का प्रतीक चिन्ह और उस पर लिखा ‘आकाशवाणी लखनऊ’ इसे आकर्षण प्रदान करते हैं।

ये  वही केंद्र है जो 18 एबट रोड पर दो मंजिले के किराए के मकान से शुरु हुआ था। सुनने में शायद यह अजीब लगे लेकिन छोटे से सफ़र से हुई शुरुआत आज 81 वर्ष के सुरीले सफ़र में तब्दील हो चुकी है। इमारत की भीतरी सफेद रंग की दीवारों से पटी शहर की मशहूर शख्सियतों की तस्वीरें आकाशवाणी के सफ़र की एक कहानी कहती हैं। लखनऊ शहर की तहज़ीब, नज़ाकत, नफ़ाजत और हिंदी-उर्दू की ज़बान को अपने अंदाज़ में जिंदा रखा और यही अंदाज-ए-जुबां इसे बाकी आकाशवाणी केंद्रों से जुदा करते हैं। और भी ख़ास पहलू और क़िस्से हैं आकाशवाणी लखनऊ के जो आपको याद दिलाएंगे बीते दिनों की…….

2 अप्रैल 1938 को जब नींव रखी गई तो पांच मिनट देर से प्रसारण शुरू हुआ था पहले निदेशक ए.आडवाणी और चीफ इंजिनियर ए.वैंकटेश्वर थे। उस वक्त उत्तर प्रदेश, यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध हुआ करता था और सीएम प्राइम मिनिस्टर हुआ करते थे। पंडित गोविंद वल्लभ पंत यहां के प्राइम मिनिस्टर थे जिन्हें शाम साढ़े छह बजे केंद्र का उद्घाटन करना था।

एच.आर.लूथरा प्रमुख कार्यक्रम अधिकारी थे। इस मौक़े के लिए ख़ासतौर पर लियोनल फील्डन शहर आए थे। प्रोग्राम वक्त से शुरु हो इसलिए बार बार मुख्यमंत्री आवास पर फोन किया जा रहा था, और जवाब कि बस निकल रहे हैं। यहां सिग्नेचर ट्यून बजनी शुरू हो गई लेकिन प्राइम मिनिस्टर का कुछ पता नहीं था। 6:32 मिनट पर प्राइम मिनिस्टर की कार आई। स्टूडियो तक जाने में वक्त लगेगा, सोचकर फील्डन ने लूथरा को आदेश दिया कि वह कंट्रोल रूम में जाकर एक रिकॉर्ड बजा दें।

जो रिकॉर्ड उस वक्त बजा उसके बोल थे ‘प्रभु राखों भक्तों की लाज’। लाज तो प्रभु ने रख ली थी लेकिन मैं देश का ऐसा पहला केंद्र बन गया जो अपने तय समय से पांच मिनट देरी से शुरु हुआ।उस दौर में रमई काका किरदार ने धूम मचा दी थी: चूंकि अकेला रेडियो स्टेशन था, सो ठोक बजा कर उद्घोषक रखे जा रहे थे। उन्नाव जिले के चन्द्रभूषण त्रिवेदी की एक मंडली थी जो गाती- बजाती थी। जिन्हें सुनने के बाद सन 1941 को नौकरी पर रखा गया। उन्हें ‘पंचायत घर’ प्रोग्राम का संचालन सौंपा गया। जिसमें उन्हें काका बनना था। चूंकि वह राम के भक्त थे सो उन्होंने ‘रमई काका’ नाम से प्रोग्राम संचालित किया।

1942 में रमई काका की ‘बौछार’ में प्रकाशित ‘हम कहा बड़ा ध्वाखा हुइगा’ कविता ने खूब चर्चा बटोरी। उसी दौरान रमई काका ने बहरे बाबा नाम से नाटक लिखना शुरू किया जो तकरीबन 41 सालों तक प्रसारित होता रहा। इसके अलावा 1948-49 में बच्चों के लिए बालसंघ प्रोग्राम ने भी खूब तारीफ बटोरी। ग्रामीण महिलाओं के लिए पनघट और शहरी महिलाओं के लिए गृहलक्ष्मी पसंदीदा प्रोग्राम थे।   दूरदर्शन आ चुका था,अब लोगों के पास एक ऐसा साधन था, जिसमें वो तस्वीरें भी देख सकते थे। ऐसे में आकाशवाणी के आकर्षण में फीकापन स्वाभाविक था ,लेकिन जब 1957 में  विविध भारती जुड़ा, तो वक्त जैसे बदल गया। देखते ही देखते विविध भारती के फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम घर-घर में गूंजने लगे।

फिल्मी कलाकारों से मुलाक़ात, फौजी भाइयों के लिए ‘जयमाला’, ‘हवा महल’ के नाटक जैसे कार्यक्रम लोगों के जीवन का हिस्सा बनते गए। 1967 में विविध भारती से प्रायोजित कार्यक्रमों की शुरुआत हुई और लोगों ने फिर दिलों में जगह दे दी ।अमीन सयानी की “बिनाका गीतमाला” आज भी आपकी यादों का हिस्सा है ,भाइयों और बहनों की आवाज़ का जादू जो सर चढ़कर बोला उसका असर आज भी राजनीतिक गलियारों में दिखता है ।संबोधन का अंदाज़ ही निराला था जो उस वक़्त भी और आज भी (माननीय प्रधानमंत्री जी की “मन की बात”में) दिलों पर राज करने में सफल हुआ।अपने नाटकों की वजह से भी चर्चा में रहा ये केंद्र ।

कहा जाता था कि  यहां नाटक करने लोग कोलंबो से आते थे। अपने नाटकों की वजह से लाहौर के बाद सबसे ज्यादा पहचान इसी केंद्र को मिली । यहां अमृतलाल नागर जैसे बड़े साहित्यकारों ने नाटकों का लेखन और संपादन किया। राधे बिहारी लाल श्रीवास्तव,मुख्तार अहमद, पी.एच.श्रीवास्तव, शहला यास्मीन, आसिफा जमानी, प्रमोद बाला और हरिकृष्ण अरोड़ा जैसे नाटक कलाकारों का कोई सानी नहीं हुआ। यहीं से विमल वर्मा, विजय वास्तव, अनिल रस्तोगी, शीमा रिजवी, कुमकुमधर और संध्या रस्तोगी नाटक के दिग्गज कलाकार यहीं पर हुए।

बेगम अख्तर, तलत महमूद, बिस्मिल्लाह खां, उस्ताद अली अकबर, मदन मोहन, सुशीला मिश्र, विनोद कुमार चटर्जी, विद्यानाथ सेठ, इकबाल अहमद सिद्दीकी, आलोक गांगुली, मोहम्मद यरकूब, सर्वेशवर दयाल सक्सेना, गरिजा कुमार माथुर, भगवती चरण वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, रमानाथ अवस्थी, पंडित मदन मोहन मालवीय, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, जोश मलिहाबादी, जिगर मुरादाबादी, असर लखनवी, मजाज और शकील बदायूंनी जैसे कलाकार यहां से जुड़े रहे।शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां प्रोग्राम करने कहीं भी जा रहे हों वह अपना सफर रोक कर मुख्य द्वार पर सजदा करते हुए और आकाशवाणी परिसर में किशन द्ददा से मिले बगैर कहीं नहीं जाते थे। उनके दिल में यह बात थी कि उन्हें बनाने में आकाशवाणी लखनऊ ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

20 अगस्त 2000 से 100.7 मेगाहर्ट्ज पर जब एफएम का प्रसारण हुआ तो इसे रेडियो के पुनर्जन्म का नाम दिया गया। यह पूरी तरह से इंटरटेनमेंट चैनल हुआ करता था। इनमें से हैलो एफएम लाइव फोन इन प्रोग्राम काफी पॉपुलर हुआ। आप यूं समझिए कि आधे घंटे के प्रोग्राम के दौरान कैसरबाग फोन एक्सचेंज ब्लॉक हो जाया करता था ऐसा अधिकारीगण बताते हैं।

आकाशवाणी लखनऊ साहित्य और कला का पर्याय रहा। यहां की खासियत रही कि इसने कला के पारखियों को तलाशा और उन्हें खुद से जोड़ा। इस तलाश में डिग्रियों की कभी कोई जगह नहीं रही। जिसकी वजह से हमारे साथ वो लोग भी जुड़े जो कभी स्कूल तक नहीं गए। इनमें ढोलक वादक बफाती भाई जैसे कई नाम शामिल है। दूसरा यहां के प्रोग्राम के किरदार बहुत पॉपुलर हुए। जैसे पंचायत घर के रमईकाका, पलटू/ झपेटे, बालसंघ के रज्जन लाल उर्फ भैय्या और दीदी के किरदार। प्रोग्राम की बात करें तो पत्र के लिए धन्यवाद और प्रसारित नाटकों को श्रोताओं का खूब प्यार मिला।

बेगम अख़्तर का सांसों का रिश्ता रहा यहां से ।ग़ज़ल गायिका अख़्तरी बाई फैज़ाबादी ने 1945 में बैरिस्टर इश्ताक अहमद अब्बासी से निकाह किया। जब दोनों के बीच शादी की बात हुई तो शर्त रखी गई कि वह संगीत से रिश्ता तोड़ लेंगी। जिस पर बेगम अख़्तर राजी हो गईं, लेकिन 5 साल तक आवाज की दुनिया से दूर रहने का सदमा वह बर्दाश्त न कर सकीं और बीमार रहने लगीं। हकीम और डॉक्टर की दवा ने भी कोई असर न किया, नतीजन उनकी तबियत बिगड़ने लगी। हालात को देखकर पति और घर वालों ने आकाशवाणी में गाने की इजाज़त दे दी। पहला प्रोग्राम ठीक से न गा सकने की वजह से अख़बार में उनकी क़ाबिलियत पर उंगली उठाई गई। लेकिन उसके बाद आकाशवाणी की वजह से उन्होंने अपनी खोई पहचान वापस पा ली थी और ग़ज़ल के साथ अपनी ज़िंदगी जी ली थी।

आकाशवाणी का अब तक का सफर बहुत शानदार रहा है। आज भी अपनी पुरानी शैली पर काम करते हुए भाषायी शालीनता का प्रयोग लखनऊ केंद्र को ख़ास बनाने हुए है । आज भी  भाषा, संस्कार, तमीज़ ,तहज़ीब ,और बोलने की अदा के लिए जाना जाने वाला आकाशवाणी लखनऊ शान से सर उठाये हर दिल की धड़कनों में अपनी मखमली आवाज़ों के जादू से हलचल पैदा करने में अव्वल है। आज भी युवा दिलों की धड़कन है ,आज भी महिलाओं की सखी है, आज भी कल्पतरु की छाया है ,आज भी किसानों की उन्नत फसल का कृषि सलाहकार है , आज भी बचपन के गलियारों में बालजगत का संसार है और आज भी यहां बजते हुए नग़मे सदाबहार हैं ।क्योंकि आज भी हम जैसों को आकाशवाणी से बेहद प्यार है

“सदियों तलक महकती रहे, नज़ाक़त, अदब और अदा के घूंघट में नशीली शाम सी… आकाशवाणी बसी रहे बनकर दिलों में धड़कन सुबह-ओ-शाम सी”

(शालिनी सिंह)

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